बिजनेस स्टैंडर्ड - निर्णायक जवाबदेही से बन सकती है बात
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निर्णायक जवाबदेही से बन सकती है बात

जैमिनी भगवती /  April 03, 2018

सरकारी बैंकों के निजीकरण के बजाय उनमें सुरक्षा के उपाय करना अधिक बेहतर होगा ताकि पीएनबी जैसे घोटाले न हों। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं जैमिनी भगवती

 
सन 1945 से 1953 तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे हैरी एस ट्रूमैन की मेज पर रखी पट्टिïका पर लिखा था, 'द बक स्टॉप्स हियर।' इसका अर्थ है कि मैं ही सर्वाधिक जवाबदेह व्यक्ति हूं। अन्य लोग मुझ पर जिम्मेदारी डाल सकते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता। पिछले दिनों पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में सामने आए घोटाले के बाद केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक एक दूसरे पर दोषारोपण करते नजर आए। नीरव मोदी मामले में पीएनबी से कई चूक और गलतियां हुईं। उनका नतीजा बैंक को 14,000 करोड़ रुपये गंवा कर करना पड़ा। अब तक केवल पीएनबी के छोटे अधिकारियों को ही धोखाधड़ी करने वालों से मिले होने वाला बताया गया है। सरकारी बैंकों में नियमित अंतराल पर पूंजी डाली जाती है और यह करदाताओं का पैसा होता है। ऐसे में लोगों की यह नाराजगी जाहिर है कि बिना अंकेक्षकों और वरिष्ठ प्रबंधन की जानकारी या मिलीभगत के यह सिलसिला सात साल से कैसे चल रहा था। यह उनकी अक्षमता को दर्शाता है।
 
पीएनबी के इस मामले में ताजा स्थिति यह है कि सरकार ने इसके जवाबदेह लोगों को खोजने और उनको अभियोजित करने का निर्णय ले लिया है। आशा यही की जानी चाहिए कि जो भी सजा मिलेगी वह भविष्य में ऐसी गतिविधियां रोकने में मददगार साबित होगी। परंतु जैसा कि हम अतीत में देखते आए हैं, इस बात की संभावना ज्यादा है कि जांच की प्रक्रिया अधर में लटक जाएगी और हम करदाताओं के पास सबकुछ भूलकर आगे बढ़ जाने के अलावा कोई विकल्प न होगा। ऐसे मामलों के तमाम आरोपित देश छोड़कर बाहर जा चुके हैं। ललित मोदी और विजय माल्या के उदाहरण बताते हैं कि विदेशी अदालत में नीरव मोदी को दोषी साबित करना और वापस भारत लाना कतई आसान नहीं होगा।
 
पीएनबी घोटाला सामने आने के बाद से अब तक जो थोड़ा समय बीता है उसमें पहले ही पूरी बहस इस विशिष्ट मामले से हटकर सरकारी बैंक बनाम निजी बैंक में तब्दील हो चुकी है। दलील यह है कि सरकार में बैठे कुछ लोग सरकारी बैंकों के धोखाधड़ी में शामिल कर्मचारियों को बहकाते और कई मामलों में माफी दिलाते हैं। इसलिए अगर सभी बैंकों का निजीकरण हो जाएगा तो बैंकिंग क्षेत्र में धोखाधड़ी बंद हो जाएगी या कम से कम इसकी आशंका बहुत कम हो जाएगी। इसके अलावा निजी बैंकों के हिमायती यह सुझाव भी देते हैं कि एक बार सरकारी बैंकों का निजीकरण होने के बाद भविष्य में करदाताओं के पैसे से बैंकों को उबारने की कोई मांग नहीं होगी। प्रायोगिक तौर पर एक अत्यंत दुर्लभ आशंका वाली स्थिति की कल्पना करते हैं कि एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक दिवालिया हो गए हैं और इन दोनों बैंकों में पैसा जमा करने वाले लोगों के बीच अफरातफरी का माहौल है। डिपॉजिट क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन एक लाख रुपये तक के जमा का ही बीमा करता है। ऐसे में अगर इन दो बैंकों के भारी भरकम धनराशि जमा करने वाले देसी ग्राहक या विदेशी अंशधारक मदद के लिए सरकार का रुख करेंगे तो क्या वह उनकी मदद करने से इनकार करने की स्थिति में होगी? जब तक इस संबंध में एक स्पष्ट कानून नहीं बन जाता है, संभावना यही है कि सरकार निजी बैंकों के मामले में भी दबाव में आकर मदद पहुंचाएगी।
 
अमेरिका, ब्रिटेन, इटली और ग्रीस में हम देख चुके हैं कि कैसे जरूरत पडऩे पर निजी बैंकों को करदाताओं के पैसे से मदद पहुंचाई गई। यह धारणा बार-बार गलत साबित हो चुकी है कि निजी बैंक अपनी स्थिति खुद सुधार सकते हैं। लब्बोलुआब यह है कि मामूली दबाव बनने पर भी सरकारें निजी संस्थानों को फंडिंग सहायता देने पर मजबूर हो जाती हैं क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो वित्तीय क्षेत्र को लेकर भरोसा टूट जाएगा।  सरकारी बैंकों में सभी वरिष्ठï प्रबंधन और बोर्ड सदस्यों की नियुक्तियां और अगर आवश्यक हो तो उनके हटाए जाने का फैसला भी कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा किया जाता है। इसमें वित्त मंत्री प्रस्तावक की भूमिका में होते हैं और अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री का होता है। क्या सरकारी बैंकों की इन नियुक्तियों और निकासी पर यह सरकारी नियंत्रण आरबीआई के नियामकीय निगरानी के अधिकार से अधिक मायने रखता है? सरकारी बैंकों के बोर्ड वित्त मंत्रालय और आरबीआई अधिकारियों के अधीन रहते हैं। हालांकि बोर्ड सदस्यों की ये श्रेणियां कह सकती हैं कि सरकारी बैंकों के प्रबंधन को लिखना बेमानी है लेकिन यह भी सच है कि संवेदनशील मुद्दों पर उनके लिखने की संभावना कम ही रहती है। ऐसे मामलों में सरकार भी शायद सरकारी बैंकों के प्रबंधन को अपनी राय खामोशी से बता देती है। आरबीआई समय-समय पर सरकारी बैंकों समेत सभी बैंकों की निगरानी करता है और यह ऐसी किसी भी गतिविधि को रोक सकता है जो बाजार की दृष्टिï से अनुचित हो या परिचालन के जोखिम वाले हों। 
 
कुछ अन्य सरकारी बैंकों के बोर्ड सदस्य पेशेवर हैं। वे प्राय: वित्त, कानून या अंकेक्षण के क्षेत्र से आते हैं और प्रबंधन को तकनीकी प्रतिपुष्टिï दे सकते हैं। शेष बोर्ड सदस्यों की गिनती नहीं होती है क्योंकि वे दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठïान के करीबी होते हैं।  अगर बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी घटती है तो क्या सरकारी बैंकों के प्रमुखों और बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति के मानकों में कुछ बदलाव आएगा? बहुलांश हिस्सेदारी रखने वाली सरकार शायद नियुक्ति के मामले में मौजूदा एसीसी व्यवस्था को ही कायम रखेगी। सरकारी बैंकों के वरिष्ठï प्रबंधकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में तब सुधार आ सकता है जबकि सरकार की भूमिका को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल के नाम सुझाने तक सीमित कर दिया जाए। ये वे विशेषज्ञ हों जिन्होंने कभी सरकार या आरबीआई के साथ काम न किया हो। अगर सरकार सुझाए गए नामों से संतुष्टï नहीं हो तो वह पैनल से यह कह सकती है कि नए नाम मंगा सकती है। 
 
सरकारी बैंकों के निजीकरण की मांग के दौरान निजी क्षेत्र के भारी डिफॉल्ट का जिक्र नहीं किया जाता। बैंक डिफॉल्ट के मुद्दे का दूसरा पहलू यह है कि बड़े कारोबारी घराने अपनी देनदारी जानबूझकर चूकते हैं। अगर स्वामित्व में बदलाव ही हल है तो सरकार को निजी क्षेत्र की देनदारी चूकने वाली फर्मों का राष्टï्रीयकरण कर देना चाहिए? सरकारी बैंकों की सेहत के आंकड़े तो सार्वजनिक हैं लेकिन कर्जदारों के डिफॉल्ट से संबंधित जानकारी सार्वजनिक नहीं होती। आरबीआई की दलील है कि बैंकिंग नियमन अधिनियम ऐसी जानकारी देने से रोकता है परंतु यह दलील विश्वसनीय नहीं है क्योंकि 16 दिसंबर, 2015 को सर्वोच्च न्यायालय का एक फैसला इसके विपरीत जाता है।  लब्बोलुआब यह कि सरकार को बेहतर प्रदर्शन करने वाले सरकारी बैंकों मसलन स्टेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा को बरकरार रखना चाहिए। शेष सरकारी बैंकों को मौजूदा बाजार मूल्य पर इन दो बैंकों को बेच देना चाहिए। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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