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वर्ष 2019 में जीत की होड़ में कहीं हार न जाए अपना देश

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  April 02, 2018

गत बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मित्रवत धड़ों में एक चिंता व्यापक तौर पर देखने को मिल रही थी। वह यह थी कि अगर लालू प्रसाद के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनता दल (राजद) राज्य में सत्ता में आया तो वहां जंगल राज की वापसी हो जाएगी। माना यह जा रहा था कि अगर राज्य में गठबंधन सरकार आती है तो भी कानून व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित रखने वाले नीतीश कुमार राजद को रोक नहीं पाएंगे। बहरहाल, राजद इस समय सत्ता से बाहर है, लालू प्रसाद जेल में हैं और राज्य में अब भाजपा और जदयू की गठबंधन सरकार है। इसके बावजूद बिहार आग में जल रहा है। विदेशी पत्रकार समस्तीपुर और औरंगाबाद से परेशान करने वाले वीडियो और ब्योरे जारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह सब हिंदुत्व के नाम पर किया जा रहा है। भीड़ मुस्लिम बहुल इलाकों में घूमती है, मुस्लिमों के मालिकाना हक वाले कारोबार और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है, मस्जिदों को आग के हवाले करने और उनके ऊपर भगवा ध्वज फहराने का प्रयास किया गया। एक वीडियो ऐसा भी सामने आया है जिसमें वर्दीधारी पुलिसकर्मी भीड़ में शामिल थे और नारेबाजी कर रहे थे। कुछ वजहों से इसे जंगल राज नहीं माना जा रहा। 

 
इस बीच उत्तर प्रदेश में करीब दो दशक के अंतराल के बाद भाजपा सत्ता में वापस आ चुकी है। भाजपा की सरकार वापसी को सुशासन और विकास केंद्रित सरकार की वापसी माना गया। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की सरकार की ख्याति कुछ अलग ही वजहों से हो रही है। उनकी सरकार लव जिहाद, आंबेडकर के नाम में 'रामजी' जोडऩे, बूचडख़ाने बंद करने और न्यायेतर हत्याओं के लिए सुर्खियों में है, जिन्हें मीडिया मुठभेड़ कहता है।  जैसा कि हर्ष मंदर कहते हैं, एक ऐसे मीडिया के लिए इसमें कुछ भी विचित्र नहीं है जो नियम से ऐसी घटनाओं की स्टोरी प्रकाशित करता है जिनमें मारे जाने वाले लोग ज्यादातर मुस्लिम ही होते हैं। कानून व्यवस्था के प्रति मुख्यमंत्री की प्रतिबद्घता का एक और उदाहरण यह है कि उन्होंने अतीत में हुए दंगों के आरोपियों के खिलाफ मामले खुशी-खुशी बंद कर दिए गए। उत्तर प्रदेश में भी मुस्लिम बहुल इलाकों से गुजरने वाले जुलूसों के कारण सांप्रदायिक हिंसा फैली है। कासगंज इसका उदाहरण है।
 
पश्चिम बंगाल में तो हालात और भी विचित्र हैं। बंगाली परंपरा में राम नवमी का संबंध कभी तलवारें और त्रिशूल लहराते, भगवाधारी युवाओं से कभी नहीं रहा। ये युवा बंगाल की सड़कों पर तलवारें लहराते हुए शक्ति प्रदर्शन करते रहे। दरअसल यह भाजपा की कोशिश थी कि वह एक अपरिचित माहौल वाले प्रदेश में हिंदुत्व के बीज बो सके। तमाम जगहों पर दीवारों पर हिंदी में नारे लिखे हुए हैं। इससे पता चलता है कि यहां लोगों को भड़काने वाले तत्त्व बाहरी हैं।  परंतु यहां बिहार और उत्तर प्रदेश की घटनाओं से थोड़ा अंतर है। आसनसोल में जब हिंसा भड़की तो राष्ट्रीय मीडिया ने इसे बड़े पैमाने पर कवर किया। इसके बाद केंद्र सरकार ने राज्य से जवाबतलब किया। आश्चर्य यह है कि आखिर तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाला बंगाल उत्तर प्रदेश और बिहार से अलग कैसे है। 
 
तेलंगाना में जहां सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति अपने इस रिकॉर्ड पर गर्व करती है कि उसने तीन साल पहले सत्ता में आने के बाद से कभी कहीं कोई सांप्रदायिक झड़प नहीं होने दी है। उटनूर जैसी छिटपुट घटनाओं के अलावा स्थानीय पुलिस सूत्रों के मुताबिक निर्मल जिले में रामनवमी के जुलूस के दौरान गुलजार मस्जिद पर पथराव हुआ। इस घटना के बाद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने वीर हनुमान विजय यात्रा का आयोजन किया। इन सारी घटनाओं में एक खास रुझान नजर आ रहा है जिसकी अनदेखी करना मुश्किल है। इस रुख का एक और संकेतक है- स्थानीय मीडिया द्वारा कई मामलों में घटनाओं को बढ़ाचढ़ाकर प्रस्तुत करना। इसके पीछे का मंतव्य भी किसी से छिपा नहीं है। हमने कोबरापोस्ट के खुलासों में देखा कि कैसे सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाली खबरों को आसानी से टेलीविजन और प्रिंट मीडिया में जगह दी जा सकती है। मुख्य धारा का अंग्रेजीभाषी मीडिया एकदम खामोश है लेकिन इसे आसानी से समझा जा सकता है। 
 
ऐसे में वर्ष 2019 में होने वाले आम चुनाव को लेकर भारतीय राजनीति की स्थिति को सकारात्मक अंदाज में देखना मुश्किल है। इस मोड़ पर बहुत सपाटबयानी से एक बात कही जा सकती है।  अब भाजपा के सुशासन की बात करने का कोई मतलब नहीं है। हमें विपक्षी दलों को लेकर फैलाए जा रहे डर से भी घबराने की जरूरत नहीं है। भाजपा नेतृत्व के लिए देश भर में पार्टी का विस्तार और उसका अपना अस्तित्व बचाए रखना ही शीर्ष वरीयता है। इसके लिए वह उन इलाकों में सांप्रदायिक तनाव का हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है जहां अब तक उसका प्रदर्शन सीमित रहा है। यह व्यवस्था एकदम सीधी सपाट है। त्रिशूलधारी युवाओं को मुस्लिम इलाकों में बुलाना और भड़काऊ नारे लगवाना, पुलिस से प्रतिक्रिया दिलवाना या स्थानीय लोगों से कुछ हरकत करवाना और फिर उस प्रतिक्रिया को बढ़ाचढ़ाकर पेश करना। उसके बाद इसे हिंदुओं पर अत्याचार के रूप में इसे व्हाट्स ऐप तथा सरकारी मीडिया के जरिए प्रसारित किया जाता है। इस नीति के हिसाब से देखा जाए तो मुझे आशंका है कि तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य वे राज्य हैं जहां भाजपा मजबूत उपराष्ट्रीय पहचान वाले दलों को सत्ता से बेदखल करना चाहती है। ध्यान रहे कि इन राज्यों में मुस्लिम आबादी भी बहुत बड़ी तादाद में है। हालांकि भाजपा अल्पसंख्यक तुष्टïीकरण को ओडिशा में भी एक मुद्दा बनाने में सक्षम है जहां केवल दो फीसदी आबादी ही मुस्लिम है। तुष्टïीकरण, जुलूस, हिंसा, मीडिया रिपोर्ट, व्हाट्स ऐप, भड़काऊ चुनावी भाषण, जीत आदि माध्यमों पर कहानियों के प्रचार का जमकर इस्तेेमाल हो रहा है। देश जले तो जले, 2019 की जीत कहीं अधिक मानीखेज है।
Keyword: BJP, NDA, RJD, lalu prasad,,
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