बिजनेस स्टैंडर्ड - मेट्रो के किराये में रियायत नहीं पारदर्शी सब्सिडी से बनेगी बात
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मेट्रो के किराये में रियायत नहीं पारदर्शी सब्सिडी से बनेगी बात

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  April 01, 2018

करीब आधी सदी पहले राजधानी दिल्ली में सभी मार्गों के लिए रियायती बस पास 12.50 रुपये में आता था। उन दिनों बस चलाने का काम दिल्ली ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग (डीटीयू) करती थी जिसका स्वामित्व दिल्ली नगर निगम के पास था। सन 1971 में केंद्र सरकार ने इसका अधिग्रहण करके इसका नाम दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) कर दिया। सन 1996 में यह दिल्ली सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में आ गया।  दिल्ली सरकार की वेबसाइट के मुताबिक आज भी डीटीसी की बस में हर मार्ग पर चलने वाला रियायती टिकट छात्रों को केवल 13 रुपये में मिलता है। एक अन्य वेबसाइट पर छात्रों के लिए 100 रुपये के पास का जिक्र है लेकिन वह रियायती है या नहीं यह नहीं लिखा है। 

 
चाहे जो भी हो डीटीसी की बसों में छात्रों के रियायती टिकट का दाम इतनी धीमी गति से बढऩा देश में सब्सिडी वाली सेवाओं की दिक्कत के बारे में बताता है। छात्रों के पास की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी इस पूरी अवधि की मुद्रास्फीति से भी कम है। बस सेवाओं की कुल लागत की तो बात ही छोड़ दें। डीटीसी की मौजूदा गड़बड़ी के लिए कई वजह हैं। परंतु प्रबंधन समय-समय पर किराये की समीक्षा करने में नाकाम रहा। इसमें रियायती पास भी शामिल हैं। निगम की वित्तीय चिंताओं की यह बड़ी वजह है। ऐसा लगता है कि दिल्ली मेट्रो चलाने वालों ने उससे कोई सबक नहीं लिया। 
 
खबरों के मुताबिक मोदी सरकार को अचानक दिल्ली मेट्रो का इस्तेमाल करने वाले छात्रों और बुजुर्गों के लिए रियायती किराये की बात सूझी है। यह अचानक हुआ है क्योंकि कुछ महीने पहले तक मोदी सरकार दो चरणों में किराया बढ़ाने के प्रस्ताव को बढ़ावा दे रही थी।  दिल्ली मेट्रो चलाने वाली कंपनी में दिल्ली सरकार की 50 फीसदी हिस्सेदारी है और वह किराया बढ़ाने को लेकर उत्सुक नहीं थी लेकिन शेष हिस्सेदारी रखने वाली मोदी सरकार ने आगे बढऩे का निश्चय किया। आठ साल बाद किराये में भारी बढ़ोतरी की गई। लागत बढऩे के साथ दिल्ली मेट्रो की वित्तीय स्थिति बिगडऩे लगी थी। ऐसे में अगर सेवा की गुणवत्ता बरकरार रखना और नेटवर्क का विस्तार करना था तो किराया बढ़ाना जरूरी था। सन 2017 में किराया बढऩे के बाद कुछ विरोध प्रदर्शन हुए और दिल्ली मेट्रो के इस्तेमाल में कुछ कमी भी आई। धीरे-धीरे लोगों को नए किराये की आदत हो गई और परिवहन फिर से बढऩे लगा। 
 
ऐसे में शहरी मामलों के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने अनावश्यक रूप से यह घोषणा कर दी कि सरकार छात्रों और वरिष्ठï नागरिकों को किराये में रियायत देने पर विचार कर रही है। कहा जा सकता है कि आम चुनाव नजदीक हैं और यह मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को प्रसन्न करने की कोशिश है। दूसरी वजह छात्रों और वरिष्ठï नागरिकों जैसे बिना वेतन वाले लोगों की पहुंच सार्वजनिक परिवहन तक आसान करना भी हो सकती है।  सार्वजनिक परिवहन में रियायत देने में कुछ भी गलत नहीं है। सार्वजनिक परिवहन को केवल मुनाफे के सिद्घांत पर चलाया भी नहीं जाना चाहिए। किराया ऐसा होना चाहिए जो उचित और यात्रियों की जेब के अनुरूप हो। ऐसा करके ही सार्वजनिक परिवहन को निजी परिवहन से सस्ता रखा जा सकेगा। इससे प्रदूषण रोकने में भी मदद मिलेगी और सड़कों पर भी बोझ कम होगा। परंतु साथ ही कोशिश यह भी होनी चाहिए कि किराया इतना तो रहे कि परिचालन करने वाली कंपनी की न केवल लागत निकले बल्कि उसे एक स्तर पर न्यूनतम मुनाफा भी हो। ऐसा करने से वह अपनी आय को दोबारा निवेश कर सकेगी और अपने सेवा नेटवर्क का विस्तार कर सकेगी। 
 
अगर छात्रों और वरिष्ठï नागरिकों को रियायत देनी ही थी तो इसकी एक पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें दिल्ली मेट्रो को इस रियायत से होने वाले नुकसान की भरपाई सरकार द्वारा सीधे बैंक के जरिये की जाती। इससे दिल्ली मेट्रो को छात्रों और वरिष्ठï नागरिकों के लिए नया रियायती कर ढांचा पेश नहीं करना पड़ता। जब किराया निर्धारित करने वाली समिति किराये की समीक्षा करे तो दिल्ली मेट्रो इसे सभी ग्राहकों पर लागू करे। जिन लोगों को किराये में रियायत दी जाए उनको मूल किराये और रियायती किराये का अंतर भुगतान कर दिया जाए। इससे डीटीसी जैसी हालत नहीं बनेगी जहां राजनीतिक वजहों से रियायती किराये में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हो सकी है। 
 
दिल्ली मेट्रो को इस बात के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वह छात्रों के रियायती किराये की उपलब्धता को ग्राहकों की आय के स्तर से जोड़ दे। छात्रों के मामले में उनके माता-पिता की आय के स्तर पर विचार किया जाना चाहिए। करदाताओं की बढ़ी तादाद और दायरे के बीच बहुत आसानी से इसके आधार पर रियायत का दावा और अंतर का भुगतान खाते में कराने की व्यवस्था की जा सकती है। घरेलू गैस की सब्सिडी का भुगतान भी सरकार इसी मॉडल पर करती है। इस बात में कोई संदेह ही नहीं है कि समाज के जिन तबकों को आवश्यकता हो उन्हें सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में सब्सिडी अवश्य प्रदान की जानी चाहिए। परंतु उस सब्सिडी को लक्षित बनाए रखना अधिक आवश्यक है। यह तय होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति दी जा रही रियायत के लिए एकदम उपयुक्त है। इसके अलावा इस सब्सिडी का पूरा बोझ सरकार को वहन करना चाहिए ताकि सार्वजनिक परिवहन मुहैया कराने वाली फर्म बढिय़ा ढंग से काम करती रहे और गुणवत्ता में किसी प्रकार की कमी न आए। 
 
मूल विचार यह सुनिश्चित करने का है कि दिल्ली मेट्रो कहीं एक और डीटीसी में न बदल जाए। दिल्ली मेट्रो के 252 किलोमीटर के नेटवर्क को इस साल के अंत तक बढ़ाकर 360 किलोमीटर किया जाना है। इस तरह दिल्ली मेट्रो देश की राजधानी की सड़कों पर से काफी दबाव पहले ही कम कर चुकी है। अब अगर इस मोड़ पर दिल्ली मेट्रो के किराये के साथ छेड़छाड़ की गई तो शहर की सार्वजनिक यातायात व्यवस्था में कहीं अधिक बड़ी समस्या पैदा हो जाएगी। 
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