बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी सरकार के प्रति बदला कॉर्पोरेट जगत का नजरिया
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मोदी सरकार के प्रति बदला कॉर्पोरेट जगत का नजरिया

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  April 01, 2018

हम लगातार कहते आए हैं कि दिल्ली और मुंबई दो संप्रभु गणराज्यों की तरह हैं जिन्हें अभी भी एक दूसरे के साथ कूटनयिक संबंध कायम करना शेष है। हालात अभी भी कुछ ज्यादा नहीं बदले हैं। दोनों की शक्तियां अलग-अलग हैं लेकिन उनकी निर्भरता का कारक एक ही है। वह यह कि दिल्ली की सत्ता पर कौन काबिज है। स्पष्ट कहें तो ये दोनों शहर सत्ता प्रतिष्ठान के लिए रूपक हैं। इनमें से एक राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है तो दूसरा पुरानी भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्यमिता का। हमारा वित्तीय जगत अभी भी काफी हद तक  मित्रों और परिवारों से बने एक समूह में ही संचालित होता है जो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह जुड़ाव वैवाहिक, जातीय और उपजातीय संपर्कों के साथ-साथ एलओयू यानी लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग की बदौलत भी होता है। यह देश के स्थायी पूंजीवादी और वित्तीय प्रतिष्ठान की तरह है जो बदलता नहीं है।

 
अगर हम सन 1989 को कटऑफ मानें (उस वर्ष केंद्र में एक दल के बहुमत का अंत हुआ था) तो दिल्ली में तब से अब तक आठ प्रधानमंत्री रह चुके हैं। सत्ताधारी दलों या गठबंधन की बात करें तो वे गहन धर्मनिरपेक्ष वाम से धुर दक्षिणपंथी भाजपा तक झूलता रहा। देवेगौड़ा के मंत्रिमंडल में भाकपा के दो मंत्रियों के पास गृह मंत्रालय और कृषि मंत्रालय जैसे अहम पद थे तो भाजपा को बहुमत मिला लेकिन उसका एक भी सांसद मुस्लिम या ईसाई नहीं था। मुंबई की बात करें तो वह किसी भी राजनीतिक प्रतिष्ठान के आसपास अपनी जगह बना ही लेती है। उसके इसके तौर तरीके बेहतर पता हैं। इसमें धैर्य भी है। ऐसे में कहा जा सकता है कि वह दिल्ली के आंतरिक मामलों में बहुत अधिक दखलंदाजी नहीं करता।
 
एक बड़ा बदलाव 2011 में आया। कारोबारी जगत ने तय किया कि अब सत्ता में परिवर्तन का वक्त आ गया है। उन्हें यह पता था कि वे ऐसा करने में सक्षम हैं। इस संबंध में तीन ताकतें थीं। पहली बात, कुछ बेहतर उद्यमी नीतिगत पंगुता के कारण आजिज आ चुके थे। वे पर्यावरण मंजूरियों के नकारे जाने अथवा ईंधन लिंकेज की कमी से परेशान थे क्योंकि उन पर अरबों का कर्ज था और वे तमाम संयंत्र स्थापित कर चुके थे। वे एक सक्रिय, कारोबार समर्थक सरकार चाहते थे। दूसरा, एक ऐसी भावना थी कि ऐसी सरकार आए जो कारोबार समर्थक हो और मुस्लिमों को उनकी जगह दिखा सके। तीसरी और सबसे अहम बात यह थी कि इसका विकल्प भी मौजूद था। कॉर्पोरेट जगत मिशन मोदी में लग गया। यह राष्ट्रीय राजनीति में उसका गंभीर दखल था। मुंबई को लगा कि दिल्ली में उसे अपना आदमी मिल गया। उसे लगा कि उसे सफलता मिल गई है और इसका जश्न भी मनाया जाने लगा। लेकिन यह जश्न जल्दी काफूर हो गया। चार साल बाद अब यह भय और आशंका की जद में है। आखिरकार मुंबई के मन में दिल्ली का गहरा भय बैठ गया है। 
 
पुराने लोग कहते हैं कि यह डर वैसा ही है जैसा विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में था। सच तो यही है कि अब तक किसी के  यहां कोई छापा नहीं पड़ा है। तो सवाल यह है कि वे शिकायत किस बात की कर रहे हैं? एक स्तर पर यह ठुकराए हुए प्रेमी जैसी हताशा है। यह वह सरकार नहीं है जिसका नरेंद्र मोदी ने वादा किया था। यह वह नरेंद्र  मोदी भी नहीं हैं जिन्हें गुजरात ने वोट दिया और मजबूत बनाया। मोदी सरकार से जुड़ा एक अहम और सकारात्मक कारक यह है कि अब दिल्ली में लॉबीइंग काम नहीं करती। उनकी सरकार ऐसी है जो किसी तरह का दबाव नहीं महसूस करती। बड़े कारोबारी घरानों को यह पसंद नहीं आता। वे चाहते हैं कि मोदी वैसा ही व्यवहार करें जैसा वे गुजरात में करते थे। यानी खुले दिल और दरवाजे के साथ स्वागत। परंतु सत्ता में आने के बाद मोदी ने अपनी राजनीति को उस ओर केंद्रित कर दिया है जहां से उन्हें वोट मिला था। कारोबारियों पर उनका ध्यान नहीं है। कड़वा तथ्य यह है कि देश के आर्थिक इतिहास में, कम से कम 1991 के बाद से बड़े कारोबारियों ने कभी खुद को इतना असहाय महसूस नहीं किया था। 
 
इसका एक जटिल पहलू भी है। मोदी ने अपनी राजनीति को नए ढंग से प्रस्तुत किया। वह गरीबों के मसीहा तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ योद्धा के रूप में सामने आए और कर अधिकारियों को असीमित अधिकार दिए। जिन कारोबारियों ने मोदी के चुनाव अभियान में जमकर योगदान दिया था और आज भी चुनावी बॉन्ड में पैसा लगा रहे हैं, उन्हीं का कहना है कि आज कर आतंक पहले से अधिक है। कर विभागों को लक्ष्य सौंपे जा रहे हैं और उनके पास पहले से अधिक अधिकार हैं। लगभग हर किसी के पास बताने को एक भयावह किस्सा है। औद्योगिक संगठनों और चैंबरों के पास प्रभावित करने की बहुत कम शक्ति बची है।
 
कारोबारी जगत की प्रकृति ऐसी नहीं है कि वह किसी सरकार की तारीफ के अलावा कोई बात करे। कुछ कारोबारियों ने दबी जुबान में नोटबंदी की आलोचना भले ही की हो लेकिन दिल्ली से आई एक मित्रवत फोन कॉल ने उनकी जुबान बंद कर दी। फिलहाल देश के कारोबारी जगत की सबसे बड़ी चुनौती है ठहरी हुई ऋण व्यवस्था। हालांकि इस बात के लिए पूरी तरह मौजूदा सरकार को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। अधिकांश फंसा हुआ कर्ज संप्रग के दौर का है। खासतौर पर सन 2009-12 के बीच का। 
 
व्यवस्था की इस सडऩ के बारे में करीब तीन साल से जानकारी सामने थी लेकिन इसे हल करना संभव नहीं रह गया था। कुछ ऐसी बातें हुईं जो समय पर समस्या के हल के आड़े आ गईं। पहली बात तो आरबीआई में शीर्ष स्तर पर हुआ बदलाव और उसके बाद नए गवर्नर के ठीक से पदभार संभालने के भी पहले नोटबंदी का झटका। इन झटकों से निपटे भी नहीं थे कि वस्तु एवं सेवा कर ने नई मुसीबत खड़ी कर दी। हमारी व्यवस्था इन बदलावों के लिए तैयार नहीं थी। आज जो तनाव और समस्या नजर आ रही है वह कुछ कारकों का मिलाजुला नतीजा है। जिस राजनीतिक प्रतिष्ठान को कारोबारियों ने अपना समझा उसने उन्हें छोड़ दिया है। कर आतंक और ठिठके हुए ऋण ने अलग समस्या खड़ी कर रखी है। उद्यमियों के बीच भय और नैतिकता के हास की समस्या प्रबल है। लेकिन इसका समय उचित नहीं क्योंकि बेहतर उद्यमी इस समय मुनाफा और मांग में बढ़ोतरी चाहते हैं। इस्पात और सीमेंट का उत्पादन तेजी पर है। दिवालिया प्रक्रिया ठीक से चल रही है और इस्पात कंपनियों से बैंकों को अच्छी राशि वापस मिलनी है। वहीं 21 में से 12 सरकारी बैंकों की हालत खस्ता है और आरबीआई उनके ऋण पर करीब निगाह रख रहा है। आईडीबीआई की हालत निहायत खस्ता है और अन्य बैंक ऋण देने में घबरा रहे हैं। अधिकारी डर रहे हैं कि कहीं सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें सीबीआई या प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों का सामना न करना पड़े। 
 
इस माहौल में हर कोई संभलकर चल रहा है। ताजा उदाहरण है केंद्रीय बैंक द्वारा फरवरी में जारी किया गया सर्कुलर जिसने कहा कि तय समय में दिवालिया प्रक्रिया के अलावा किसी तरह का निस्तारण न किया जाए। आरबीआई के नए गवर्नर ने खामोशी ही बेहतर समझी और कभी अपने पद जैसा कद नहीं दिखाया। सरकार अब इस सर्कुलर को खत्म करना चाहती है। बड़े और अमीर लोगों को दिवालिया होने का डर नहीं सताता।  वे पुलिस से ज्यादा डरते हैं। जैसा कि हमने इस आलेख में पहले भी ध्यान दिया। कभी किसी बड़े उद्यमी पर न तो छापा पड़ा, न ही उन पर आपराधिक मामला तय हुआ है। पहले विजय माल्या और अब नीरव मोदी और मेहुल चोकसी की जोड़ी ने कारोबारी भारत को आर्थिक अपराधों के अपराधीकरण का स्वाद चखाया है। भय का जन्म हकीकत से नहीं बल्कि भ्रम से होता है। इन दिनों सबसे लोकप्रिय भ्रम यह है कि सरकारी बैंकों की हालत खस्ता है। मोदी सरकार को भी चुनाव से पहले निजी क्षेत्र से कुछ ऐसी तारीफ चाहिए जो भ्रष्टाचार विरोधी छवि को मजबूत करे।  सवाल यह है कि अब किसके गले पर तलवार चलेगी? उस लिहाज से देखें तो आईसीआईसीआई बैंक और वीडियोकॉन से जुड़ा मामला विरेचक का काम करेगा। 
 
व्हिसल ब्लोअर का पत्र वर्ष 2016 से ही व्हाट्स ऐप पर चल रहा है। कई लोगों को राहत मिली होगी कि अब सबकुछ सामने है और हर कोई अपनी बात रख सकता है। जैसा कि हमने कहा, भय और आशंका हमेशा हकीकत से जुड़े नहीं होते लेकिन यह हकीकत हो भी सकता है जैसा कि इस मामले में है।
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