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फर्श से अर्श तक

नीरज भट्ट /  03 01, 2018

बाजार
मंदी की सबसे बड़ी गाज शेयर बाजार पर ही पड़ी थी, लेकिन उसके बाद के दस साल में सेंसेक्स ने ऐसा फर्राटा भरा कि सबको हैरत में डाल दिया और आगे भी खासी उम्मीद है

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बई स्टॉक एक्सचेंज में 11 जनवरी, 2008 को कांसे के बने एक बुल (तेजड़‍ियों का प्रतीक सांड) की प्रतिमा स्थापित की गई। पांच फुट ऊंची इस प्रतिमा का वजन तकरीबन एक टन है। प्रतिमा के लिए वह दिन एकदम मुफीद था क्योंकि बाजार में 2005 में शुरू हुआ तेजी का दौर चरम पर पहुंच चुका था और तीन दिन पहले ही सेंसेक्स उस समय तक के उच्चतम स्तर पर बंद हुआ था। एक दिन पहले ही रतन टाटा की लखटकिया कार 'नैनो' पेश की गई थी और भारत का मान बढ़ा रही थी। हफ्ते भर बाद ही रिलायंस पावर का आईपीओ बाजार में आने वाला था, जो शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ था। आमिर खान की फिल्म 'तारे जमीं पर' सिने जगत में उम्मीद फैला रही थी।

लेकिन चहुंओर उम्मीद का यह माहौल लंबा नहीं चला और दो हफ्ते में ही निवेशकों को शेयर महंगे लगने लगे। इधर भारतीय बाजार टूटना शुरू हो गया था और उधर अमेरिका का सबप्राइम संकट दुनिया भर को अपनी चपेट में ले रहा था। जल्द ही पूरी दुनिया वित्तीय संकट की चपेट में आ गई और फरवरी, 2009 तक सेंसेक्स जनवरी, 2008 के मुकाबले 57 फीसदी ढह गया।

इसके बाद के कुछ साल अर्थव्यवस्था और उद्योग के लिए मुश्किलों भरे रहे और मामला पूरी तरह से पटरी पर अब भी नहीं आ पाया है। सेंसेक्स जनवरी, 2008 के स्तर से केवल 62 फीसदी ऊपर है। पिछले 10 साल में नए सेक्टर भी उभरे हैं और नए कारोबारी भी सामने आए हैं, जबकि पुराने दिग्गज हाशिये पर चले गए हैं। कूलर बनाने वाली नामी कंपनी सिंफनी का उदाहरण ही ले लीजिए। 8 जनवरी 2008 को उसके शेयर का भाव साल भर पहले के मुकाबले तीन गुना हो चुका था क्योंकि कंपनी मुनाफे में आ गई थी। सालाना आधार पर तीन गुनी हो चुकी थी और कंपनी आखिरकार मुनाफे में आ गई।

कंपनी ने कुछ साल पहले गीजर, एसी और वाटर प्यूरीफायर के कारोबार में हाथ डाला था, जहां नाकामी मिलने के कारण उसके ऋण पुनर्गठन की नौबत आ गई थी। तब कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अचल बाकरी ने सभी उत्पादों से हाथ खींचकर केवल एयर कूलर पर ध्यान देने का फैसला किया। वह कहते हैं, 'हमने देश में अपने वितरकों के नेटवर्क का विस्तार किया और देश के बाहर बाजार तलाशना शुरू किया। हमने ठान लिया कि सभी नई पहलें एक ही श्रेणी में की जाएं।'

आज कंपनी के कूलरों में टचस्क्रीन, अल्ट्रासोनिक मच्छर भगाने की तकनीक और पानी शुद्ध करने जैसी तकनीक आ रही हैं। जून, 2008 में कंपनी को कर्ज से मुक्ति मिल चुकी थी और अगले 10 साल में वह शेयर बाजार में सबसे ज्यादा चढ़ने वाली कंपनियों में शुमार हो गई। 2007 से 2010 के बीच सिंफनी का राजस्व करीब 18 गुना बढ़ा, मुनाफे में 77 गुना इजाफा हुआ और कर्ज-इक्विटी अनुपात बहुत कम रह गया। उसके शेयर की कीमत भी 450 गुना बढ़ गई। जिन कंपनियों ने नए या अनूठे उत्पाद और सेवाएं उतारे, नए बाजारों की तलाश की, शेयर बाजारों में उनकी हनक बनी रही और उन्हें बढिय़ा सफलता मिली। कैपलिन पॉइंट का शेयर पिछले 10 साल से 73 फीसदी सालाना चढ़ता जा रहा है क्योंकि इस औषधि कंपनी ने दक्षिण अमेरिका के लगभग अछूते बाजार में सस्ती दवाएं जमकर बेचीं।

आयशर मोटर्स का जिक्र नहीं किया गया तो शेयर बाजार की बात ही अधूरी रह जाएगी। कंपनी के प्रबंध निदेशक और सीईओ सिद्धार्थ लाल ने रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकल ब्रांड का घाटे में चल रहा कारोबार वर्ष 2000 में संभाला और कुछ ही अरसे में उसे एक अलग पहचान दे डाली। इसके लिए उन्होंने डिजाइन, इंजीनियरिंग और मार्केटिंग में कड़ी मेहनत की। बाजार में कंपनी की हैसियत (पूंजीकरण) 2008 में 1,130 करोड़ रुपये थी, जो आज 82,040 करोड़ रुपये हो गई है। इस मामले में उसने पिछले साल कुछ अरसे के लिए दोपहिया दिग्गज बजाज ऑटो तक को पीछे धकेल दिया था, जबकि उसका मुनाफा और बिक्री बजाज ऑटो के मुकाबले एक तिहाई ही थी।

बड़े कारोबारी घरानों की बात करें तो बजाज ने सन 2008 के बाद से सेंसेक्स पर शेयरधारकों को सबसे ज्यादा कीमत दिलाई है। समूह का वित्तीय सेवा कारोबार तेजी से दौड़ रहा है। 2007-08 में बजाज ऑटो में से तीन कंपनियां - बजाज होल्डिंग, बजाज ऑटो और बजाज फिनसर्व बनाई गई थीं। गैर बैंकिंग वित्तीय सेवा (एनबीएफसी) क्षेत्र की बजाज फिनसर्व अलग ही रही। वह उभरते हुए मध्य वर्ग को वाहन और जरूरी सामान खरीदने के लिए कर्ज देती है। बजाज फाइनैंस और उसकी होल्डिंग कंपनी बजाज फिनसर्व के पास जीवन तथा सामान्य बीमा की सहयोगी कंपनियां भी हैं। उनका कुल बाजार पूंजीकरण 1.85 लाख करोड़ रुपये है, जो जनवरी, 2008 में केवल 1,900 करोड़ रुपये (केवल बजाज फाइनैंस का) था।  

इंडसइंड बैंक के शेयर का भाव पिछले एक दशक में सालाना 30 फीसदी चढ़ा। इससे हिंदुजा शेयरधारक मूल्य के लिहाज से दूसरे स्थान पर पहुंच गया। नुस्ली वाडिया के कारोबारी समूह का बाजार पूंजीकरण जनवरी, 2008 में 10,000 करोड़ रुपये था, जो बढ़कर 75,000 करोड़ रुपये हो गया। खाद्य क्षेत्र की उसकी कंपनी ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज 15 गुना बड़ी हो गई। उसकी दूसरी कंपनियों बॉम्बे बर्मा और नैशनल परऑक्साइड का प्रदर्शन भी अच्छा रहा। लेकिन उसकी मुख्य कंपनी बॉम्बे डाइंग सुस्त ही रही और समूह के कुल पूंजीकरण में उसकी हिस्सेदारी केवल 8 फीसदी है।

एचडीएफसी बैंक का शेयर आठ गुना उछला एचडीएफसी समूह उसकी बदौलत बाजार हिस्सेदारी के मामले में दूसरे स्थान पर पहुंच गया। एचडीएफसी स्टैंडर्ड लाइफ इंश्योरेंस हाल ही में सूचीबद्ध हुई है, जिसके कारण मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह से एचडीएफसी और भी आगे निकल गया। रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर केवल 2 फीसदी सालाना की चक्रवृद्धि दर से आगे बढ़ रहा है।

बाजार पूंजीकरण के मामले में अव्वल है टाटा समूह। उसके शेयरधारकों का निवेश भी 10 साल में दोगुना हो गया। टीसीएस ने पांच गुना और टाइटन ने 10 गुना तरक्की की। माहिर निवेशक राकेश झुनझुनवाला के टाइटन में निवेश की कीमत जनवरी, 2008 में 662 करोड़ रुपये थी, जो सितंबर, 2017 तक बढ़कर 6,000 करोड़ रुपये हो गई।

मगर  सब कुछ अच्छा नहीं रहा है। ऐसी कंपनियां भी हैं, जिन पर  बहुत बुरी बीती है। अनिल अंबानी का रिलायंस समूह जनवरी 2008 में 3.4 लाख करोड़ रुपये के बाजार पूंजीकरण के साथ तीसरे स्थान पर था। लेकिन अब उसकी हैसियत केवल 78,630 करोड़ रुपये की रह गई है। दस साल पहले समूह के शेयर दौड़ रहे थे, लेकिन रिलायंस कम्युनिकेशंस की कर्ज की समस्या और जियो के आगमन ने उसके शेयरों को धराशायी कर दिया। अब उनके भाव 2008 के भावों के मुकाबले 95 फीसदी लुढ़क चुके हैं। रिलायंस कैपिटल और रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर की हैसियत भी एक चौथाई ही रह गई हैं। इसी तरह जेपी और नवीन जिंदल के समूह भी कर्ज की मार से जूझ रहे हैं।

जब बाजार में तेजी आती है तो कई बार कंपनियों का प्रबंध तंत्र बहुत महत्त्वाकांक्षी हो जाता है। कंपनी प्रबंधन क्षमता विस्तार, कंपनियों के अधिग्रहण या नए कारोबार में कदम रखने की जुगत भिड़ाने लगता है और उसमें जोखिम उठाने से भी वह परहेज नहीं करता। इस जोखिम के चलते कंपनियां बड़े भरोसे से ऋण लेती हैं, लेकिन वृद्धि सुस्त पड़ते ही उसे चुकाना मुश्किल हो जाता है। हालांकि इस बार मामला मिला-जुला है। 2008 के बाद से कमजोर प्रदर्शन करने वाली कई कंपनियों पर भारी कर्ज है, लेकिन जिन कंपनियों ने अच्छा प्रदर्शन किया है, उन पर कर्ज बहुत कम है।

लंबी अवधि में मूल्यवसंवर्धन पेशेवर फंड प्रबंधकों के लिए भी मुश्किल साबित हो रहा है। 20008 में बाजार पूंजीकरण में जिन कंपनियों की 60 फीसदी हिस्सेदारी थी, उनमें से 60 फीसदी कंपनियां 10 साल में सेंसेक्स में बहुत कामयाब नहीं रही हैं। सेंसेक्स ने 2008 के उच्चतम स्तर से 5 फीसदी प्रतिफल दिया है। लाभांश अलग है। लेकिन भारतीय स्टेट बैंक की 10 साल की सावधि जमा में ही तब से अब तक 9 फीसदी का प्रतिफल मिल गया है। अगर सावधि जमाधारक सर्वोच्च आयकर दायरे में आता है तब भी उसे 6.3 फीसदी प्रतिफल मिल जाएगा और शेयर बाजार जैसा जोखिम भी उसे नहीं उठाना पड़ेगा। लार्ज कैप इक्विटी म्युचुअल फंड का औसत प्रदर्शन भी इस दौरान 7.2 फीसदी प्रतिफल के साथ बेहतर रहा।

जिन कंपनियों ने शेयरधारकों को अच्छा प्रतिफल दिया है, वे खपत से जुड़ी हैं। पिछले एक दशक में यात्री वाहनों, मोटरसाइकलों, उपभोक्ता वस्तुओं और कर्ज में वृद्धि हुई है। दोपहिया वाहनों और कारों की बिक्री दोगुनी से अधिक हो गई है। इसकी बड़ी वजह ग्राहकों का बदलता स्वभाव भी है। हमेशा कर्ज से कन्नी काटने वाले भारतीय उपभोक्ता अब कर्ज लेकर आईफोन 10 खरीदने में भी नहीं हिचक रहे हैं। यही वजह है कि वाहन कंपनियों, उनके कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों, निजी बैकों और वित्तीय कंपनियों का कारोबार सुधार पर है।

अगले दशक में वाहन और बैंकिंग आदि क्षेत्रों में बड़ा बदलाव आएगा और इसकी वजह बनेगी तकनीक तथा डिजिटलीकरण। युवा आबादी, शहरीकरण, छोटे परिवार, बढ़ती आकांक्षाओं और ऋण की उपलब्धता से खपत में इजाफा होगा। मैकिंजी ने 2007 में कहा था कि भारत 2025 तक दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बन जाएगा। बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप को ज्यादा उम्मीद है और वह इसे तीसरा सबसे बड़ा बाजार बनता देख रहा है। ब्रांड को लेकर उपभोक्ताओं की पसंद और जीएसटी के कारण असंगठित क्षेत्र संगठित में बदलेगा। ऐसे में उपभोक्ताओं पर केंद्रित कंपनियों का भविष्य बेहतर है।


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