बिजनेस स्टैंडर्ड - सक्षम नीति प्रतिष्ठान की आवश्यकता
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सक्षम नीति प्रतिष्ठान की आवश्यकता

अजय शाह /  March 21, 2018

देश और विदेश में लोग चाहते हैं कि हमारे यहां एक सक्षम नीतिगत प्रतिष्ठïान स्थापित हो जो स्पष्टïता और समन्वय के साथ काम कर सके। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
बीते कुछ समय से वित्तीय क्षेत्र संकट का सामना कर रहा है। बैंकिंग जगत की घटनाओं, आयात क्षेत्र के लिए ऋण की व्यवस्था, बॉन्ड बाजार, पूंजी प्रवाह आदि कई घटनाएं इसके लिए उत्तरदायी रहीं। अब वित्त मंत्रालय के लिए वक्त आ गया है कि वह तमाम वित्तीय एजेंसियों के साथ मिलकर एक रणनीति तैयार करे। अगर बाजार को यह अंदाजा हो गया कि एक समन्वित नीति पर काम चल रहा है तो वे भी धीरे से शांति हो जाएंगे।
 
भारतीय वित्त जगत की बात करें तो बैंकिंग संकट धीरे-धीरे और खराब होता जा रहा है। आरबीआई ने हाल में नियमन में बदलाव किया है जो अपने आप में सही पथ पर हैं, उनके चलते आगे और समस्याएं सामने आएंगी। ये वे समस्याएं हैं जो इससे पहले वर्षों तक छिपी रही हैं। कई बैंक परिचालन जोखिम और फंसे हुए कर्ज के संकट से निपटने के लिए जमकर काम कर रहे हैं। इसके चलते जमा बढ़ाने और ऋण देने जैसे मूलभूत कामों पर उनका ध्यान ही नहीं रह गया है। जीएसटी ने निर्यातकों के लिए कार्यशील पूंजी की आवश्यकता में बढ़ोतरी की और बैंकिंग व्यवस्था के संकटग्रस्त रहते इन जरूरतों को पूरा करना मुश्किल बना रहा। 
 
आयातक भी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग पर अचानक रोक की प्रतिक्रिया स्वरूप परेशान रहे हैं। सरकारी बॉन्ड जिस पैमाने पर जारी किए जा रहे हैं उसे लेकर भी चिंता का माहौल है। ऋण प्रबंधन में आ रही दिक्कतों के कारण बॉन्ड बाजार में उतार-चढ़ाव आया है। दीर्घावधि के बॉन्ड की दर जून के मध्य में 6.5 फीसदी से बढ़कर 7.65 फीसदी हो गई। इससे बैंकों को नुकसान होगा। सरकारी उधारी और बॉन्ड बाजार के मोर्चे पर हमें मार्च और अप्रैल में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
 
निफ्टी आज जनवरी के अंत से 9 फीसदी नीचे के स्तर पर है। विदेशी निवेशक घबराए हुए हैं क्योंकि देश के आर्थिक नीति नियंताओं के समक्ष कुछ कठिन प्रश्न हैं। वित्त मंत्रालय को आंतरिक स्तर पर एक नीति तैयार करनी होगी ताकि इन समस्याओं को हल किया जा सके। अगर बैंक कंपनियों को ऋण देने से पीछे हट रहे हैं तो सरकार को ऋण मुहैया कराने संबंधी अन्य कदम उठाने के लिए कई उपाय करने की आवश्यकता है। इस क्रम में शेयर बाजार, बॉन्ड बाजार, पूंजी प्रवाह और फिनटेक को उदार बनाने की आवश्यकता है। आयात को ऋण मुहैया कराने और निर्यातकों की कार्यशील पूंजी की जरूरत को पूरा करने संबंधी समस्याओं को हल करना होगा।
 
देश के बैंकों, खासकर सरकारी बैंकों की मजबूती और सुरक्षा को लेकर चिंता का माहौल है। आरबीआई की नियामकीय और प्रवर्तन क्षमता कमजोर है। बैंकिंग नियमन की नाकामी पर सार्वजनिक आरोप प्रत्यारोप की शुरुआत हो गई है। वित्त मंत्री ने नियमन की नाकामी को लेकर चिंता जताई है और आरबीआई गवर्नर का कहना है कि आरबीआई केपास सरकारी बैंकों के नियमन के लिए पर्याप्त अधिकार नहीं हैं। स्वतंत्र अध्येताओं को इन विषयों पर दृष्टि डालनी चाहिए। वहीं इस वक्त वित्त मंत्रालय और आरबीआई को बहस में पडऩे के बजाय आरबीआई सुधारों और सरकारी बैंकों में सुधारों पर श्वेत पत्र पेश करना चाहिए। बाजार इस बहस को लेकर फिक्रमंद नहीं रहता है वह केवल नीतियों के क्रियान्वयन की चिंता करता है।
 
अगर मुझे पता होगा कि आपकी प्रतिरोधी क्षमता मजबूत है तो मैं आपके बीमार पडऩे की घटना पर अधिक तवज्जो नहीं दूंगा। मैं आपकी बीमारी के बारे में जानने को लेकर बहुत उत्सुक नहीं रहूंगा क्योंकि मुझे पता है कि अपनी प्रतिरोधी क्षमता की बदौलत आप इससे निजात पा लेंगे। सबसे अहम है आपकी प्रतिरोधी क्षमता को लेकर मेरा ज्ञान और उसमें मेरा भरोसा। इसी तरह, घरेलू और विदेशी नागरिक भी वित्तीय क्षेत्र की समस्याओं को लेकर आज इतने चिंतित नहीं हैं जितने कि वे हल की संस्थागत क्षमता को लेकर। कमजोर संस्थानों वाले देश में छोटी समस्याएं बड़ी गड़बड़ी में बदल जाती हैं। जबकि मजबूत संस्थानों वाले देश में बड़ी गड़बड़ी भी आसानी से हल हो जाती है।
 
निजी क्षेत्र की नजर आर्थिक नीति क्षमताओं पर है। समय की मांग यह है कि वित्त मंत्रालय इन समस्याओं से निजात दिलाए। समस्याओं का पता लगाने वाले दस्तावेज सामने आने चाहिए, एक कार्य योजना बननी चाहिए, शुरुआती कदम उठाए जाने चाहिए और शेष कदमों के लिए मानवीय और संस्थागत क्षमता का इस्तेमाल होना चाहिए। एक बार बाजार को यह अंदाजा लग जाए कि मजबूत संस्थागत क्षमता विकसित हुई है तो संकट अपने आप दूर हो जाएगा।
 
वर्ष 2008 और 2013 के अनुभवों की तुलना करने से काफी मदद मिल सकती है। लीमन ब्रदर्स की नाकामी के बाद भारत सर्वाधिक प्रभावित उभरते बाजारों में से एक था। हर संकट पिछले से अलग होता है। यह संकट म्युचुअल फंड, अचल संपत्ति की कंपनियों, विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय कर्जदारों, आईसीआईसीआई बैंक आदि का मिला जुला संकट था। परंतु बेहतर नतीजों की वजह था वित्त मंत्रालय, आरबीआईऔर सेबी का मिलकर काम करना। रोज ब रोज उठाए जा रहे कदम बहुत मायने रखते थे लेकिन सबसे बड़ी बात थी क्षमता में बाजार की आश्वस्ति।
 
निरपेक्ष होकर बात करें तो वर्ष 2013 में देश के सामने आया संकट 2008 की तुलना में छोटा था। अंतर केवल क्षमता और टीम भावना का था। सरकार के स्तर पर समस्या की समझ और तालमेल की कमी नजर आई। इस बात ने एक छोटे से झटके को विशालकाय समस्या में तब्दील कर दिया। एक प्रमुख अंतर था विनिमय दर को लेकर रुख। फ्लोटिंग विनिमय दर मुद्रा नीति अस्थिरता के दौर में मजबूती का स्रोत है। वर्ष 2013 में मौद्रिक नीति पर ध्यान केंद्रित था जबकि 2008 में फ्लोटिंग विनिमय दर को लेकर स्पष्टïता थी। सैद्घांतिक रूप से हमें आज बेहतर स्थिति में होना चाहिए था क्योंकि आरबीआई के विधान में मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाने की बात शामिल है। परंतु व्यवहार में देखें तो वर्ष 2013 के बाद से आरबीआई ने विनिमय दर के प्रबंधन पर जोर दिया। यह आने वाले महीनों के लिए अच्छा संकेत नहीं है। 
 
एफएसएलआरसी के डिजाइन में इस तरह के संकट प्रबंधन के लिए संस्थागत मशीनरी के रूप में वित्तीय स्थिरता एवं  विकास परिषद (एफएसडीसी) मौजूद है जिसकी अध्यक्षता वित्त मंत्री के पास है। यह कागजों पर ही मौजूद है क्योंकि इसके कार्यशील करने के लिए कानून अब तक नहीं बन पाया है। इसके लिए सक्षम तकनीकी सचिवालय की भी कमी है। इसके पास वे आंकड़े भी नहीं हैं जो वित्तीय डेटा प्रबंधन केंद्र के पास होने चाहिए थे। अब समय आ गया है कि समय रहते जरूरी उपाय कर लिए जाएं। अतीत में हम ऐसा करने से चूक गए।
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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