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खत्म होती जवाबदेही

संपादकीय /  March 19, 2018

गत सप्ताह करीब 89.25 लाख करोड़ रुपये की व्यय योजना के साथ वित्त विधेयक और विनियोग विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत करने और ध्वनि मत से उन्हें पारित करने में बमुश्किल 30 मिनट का समय लगा। इसमें 99 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों की बजट मांगें और करीब 200 संशोधन शामिल थे। यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण था बल्कि इससे कार्यपालिका की खत्म होती विधायी जवाबदेही भी परिलक्षित होती है। राज्य सभा इस सत्र में पहले ही पंगु है क्योंकि विपक्षी दल लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। अगर 14 दिन के भीतर उच्च सदन वित्त विधेयक को लौटाता नहीं है उसे पारित मान लिया जाएगा क्योंकि वह धन विधेयक है। 

 
इसमें कुछ भी गलत नहीं था क्योंकि लोकसभा की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने विधेयकों को बिना चर्चा के पारित करने का रास्ता चुना। उन्हें यह अधिकार है कि अगर सदन बजट और उसके प्रावधानों पर निश्चित समय में चर्चा नहीं कर पाता है तो उनको इसी तरह पारित कर दिया जाए। परंतु इसका नतीजा यह निकला कि तमाम बकाया मांगों पर सदन ने बिना किसी चर्चा या विधायी निगरानी के मतदान किया। कई वर्षों में यह पहला अवसर है जब लोकसभा में अनुदान की एक भी मांग पर चर्चा नहीं हुई और मतदान हो गया। हालिया अतीत की बात करें तो बिना चर्चा के पिछला बजट सन 2003-04 में राजग की पहली सरकार के कार्यकाल में पारित हुआ था। वर्ष 2013-14 में संप्रग के दूसरे कार्यकाल के दौरान भी ऐसा ही हुआ था। उस वक्त भी यही किया गया था। ऐसा लगता है कि राज्यों की विधानसभाओं ने भी इन दो घटनाओं से प्रेरणा ली है। राज्यों में भी बजट को इस प्रकार बिना किसी चर्चा के पारित करने का चलन बढ़ता ही जा रहा है। 
 
एक स्तर पर इसे केवल तकनीकी मसला भी माना जा सकता है। आखिरकार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली मौजूदा राजग सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है और ऐसा लगता नहीं कि विपक्ष किसी खास अनुदान की मांग पर मतों में जीत हासिल कर सकता है। परंतु इस विधायी प्रक्रिया का उद्देश्य है बहस और चर्चा को स्थान देना। यह तत्त्व नदारद रहा क्योंकि सरकार विपक्ष को बाधा पहुंचाने वालों के रूप में चित्रित करके प्रसन्न थी और उसने सदन की उथलपुथल का फायदा नतीजे पर जल्दी पहुंचने में किया। विपक्ष की बात करें तो इस जिम्मेदारी में उसका भी साझा है। सदन को बार-बार बाधित करके उसने एक बड़ा अवसर गंवा दिया। बजट पर चर्चा के दौरान वह सरकार को यह स्पष्टï करने पर विवश कर सकता था कि वह किसानों की दिक्कतें कम करने संबंधी प्रावधानों को स्पष्टï करे या फिर वह बताए कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के आवंटन में कमी क्यों आई। सरकार से यह भी पूछा जा सकता था कि वह राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना की फंडिंग के बारे में विस्तृत ब्योरा दे। इस योजना को दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी फंडिंग वाला स्वास्थ्य कार्यक्रम बताया जा रहा है।
 
कमजोर विधायी निगरानी के नुकसानदेह प्रभाव यहीं समाप्त नहीं होते। वित्त विधेयक को इस प्रकार पारित करने का अर्थ यह भी है कि सांसदों के वेतन, दैनिक भत्तों और पेंशन में 1 अप्रैल से हुए भारी इजाफे पर भी कोई चर्चा नहीं हो सकी।  सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टïाचार कम करने पर केंद्रित होने के बावजूद इस वर्ष वित्त विधेयक में अब समाप्त हो चुके विदेशी अंशदान नियमन कानून 2010 यानी एफसीआरए को अतीत की तिथि से संशोधित किया गया। इससे बीते 42 वर्ष में राजनीतिक दलों को हुई तमाम विदेशी फंडिंग वैध हो गई। यह कदम देश के दो शीर्ष दलों को बचाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकसभा ऐसे मुद्दों पर विस्तृत बहस जरूरी नहीं समझती। यह सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के अपनी लोकतांत्रिक जवाबदेही से बचने का स्पष्टï उदाहरण है। 
Keyword: projects, budget,,
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