बिजनेस स्टैंडर्ड - सेवा क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने की मुश्किल चुनौती
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सेवा क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने की मुश्किल चुनौती

ए के भट्टाचार्य /  March 15, 2018

हाल की मीडिया रिपोर्टों में अर्थव्यवस्था के कुछ खास क्षेत्रों में निवेश प्रवाह के बारे में एक रोचक रुझान दिखा है। ऑनलाइन खाद्य सामग्री मुहैया कराने वाली कंपनियों में निवेशकों की रुचि तेजी से बढ़ी है। इस अवधि में ऑनलाइन फूड डिलिवरी कंपनियों में निवेश की राशि रेस्टोरेंट क्षेत्र के बराबर पहुंच गई है।

 

ऑनलाइन फूड डिलिवरी उद्योग के लिए यह एक रोचक पहलू है। लेकिन रेस्टोरेंट उद्योग में निवेश की अपेक्षाकृत धीमी रफ्तार को ध्यान में रखें तो समूचे खानपान उद्योग के लिए यह खतरे की घंटी है। ऑनलाइन फूड डिलिवरी सेवा में निवेश के जरिये खानपान उत्पादों का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाना आसान हो गया है। इन दोनों क्षेत्रों में निवेश के मौजूदा रुझान पर करीबी निगाह डालने की जरूरत है। 

यह दलील दी जा सकती है कि एक अपेक्षाकृत नए उद्योग के लिए यह एक शुरुआती रुझान है और खानपान सेवा क्षेत्र में निवेश की अच्छी गति नई तकनीक के उभार का नतीजा हो सकती है। कुछ साल पहले तक किसी भी ऑनलाइन सेवा प्रदाता के लिए रेस्टोरेंट से उपभोक्ताओं को जोड़ पाने की गुंजाइश ही नहीं थी। लेकिन अब हालात इतनी तेजी से बदले हैं कि उपभोक्ता पसंदीदा डिश ऑर्डर करने के पहले ऑनलाइन फूड डिलिवरी करने वाली कंपनियों की वेबसाइट पर जाना पसंद करते हैं। रेस्टोरेंट क्षेत्र में निवेश की अपेक्षाकृत सुस्त रफ्तार को दुरुस्त करने की जरूरत है।

अगर रेस्टोरेंट क्षेत्र में निवेश की रफ्तार पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़ती है तो इसकी संभावना है कि ऑनलाइन फूड डिलिवरी कंपनियों को भी उपभोक्ता के समक्ष विकल्प मुहैया करा पाने में समस्या होने लगेगी। इन कंपनियों की संख्या बढऩे के साथ इस क्षेत्र का आकार भी बढ़ते हुए देखा जा सकता है। लेकिन जब रेस्टोरेंट उद्योग में वाजिब प्रगति नहीं होगी तो फूड डिलिवरी करने वाली कंपनियां आखिर उपभोक्ताओं तक कौन सी खाद्य सामग्री पहुंचाएंगी?

रेस्टोरेंट क्षेत्र को ऑनलाइन फूड सेवा क्षेत्र के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा। दोनों क्षेत्रों में एक जैसी तेजी दिखाई देनी चाहिए। अगर इनके विकास में किसी तरह की असंगति या विरोधाभास नजर आता है तो वह दोनों के ही लिए अच्छी बात नहीं होगी। बड़ा खतरा यह है कि ऐसा रुझान भारतीय अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी फैला है। सेवा क्षेत्र भौतिक ढांचा क्षेत्र की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है और सवालों के घेरे में आए क्षेत्रों के सतत विकास एवं प्रगति के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण पूर्व-शर्त भी है। 

दूरसंचार उद्योग का ही उदाहरण लीजिए। दूरसंचार सेवा कंपनियों ने अपना बाजार बढ़ाने पर लगातार ध्यान केंद्रित किए रखा और वे बहुत तेजी से आगे बढ़ी हैं। ये कंपनियां बड़े पैमाने पर निवेश से इस स्थिति तक पहुंची हैं। लेकिन उनकी कोशिशों का बड़ा हिस्सा मोटी रकम देकर स्पेक्ट्रम खरीदने और उपभोक्ताओं को लुभावने पैकेज मुहैया कराने तक ही केंद्रित रहा है। इसके उलट दूरसंचार कारोबार के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र- टावर लगाने जैसी ढांचागत सुविधाओं के विस्तार पर उन्होंने शायद ही उतना ध्यान दिया है। दूरसंचार कंपनियों ने तकनीक-संबंधी ढांचा खड़ा करने में भी निवेश पर ध्यान नहीं दिया है। असल में, दूरसंचार कंपनियां इस तरह के ढांचागत कार्यों को आउटसोर्स करने में ही यकीन करती रही हैं।

किसी भी दूरसंचार कंपनी के लिए कारोबार का जो मुख्य क्षेत्र होना चाहिए वह दूसरी कंपनी से आउटसोर्स किया जा रहा है। लेकिन ऐसी ढांचागत सेवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता दूरसंचार सेवा प्रदान कर रही कंपनियों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं रह गई हैं। इससे संचार सेवा प्रदाताओं को भले ही कुछ समय के लिए लाभ मिले लेकिन सेवा एवं ढांचागत आधार के बीच तालमेल नहीं होने से उनके सामने एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा होने लगी है। संचार सेवा प्रदाता भले ही आकर्षक सेवाओं की पेशकश कर रही हैं लेकिन न तो उनके पास जरूरी ढांचागत आधार है और न ही उनकी गुणवत्ता पर ही वे नियंत्रण रख सकती हैं।

विमानन क्षेत्र भी ऐसे सवालों का सामना कर रहा है। एयरलाइंस और एयरपोर्ट ऑपरेटर दोनों ही एकदम अलग इकाइयां हैं और एक-दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र हैं। लेकिन विमानन सेवा की सक्षमता और गुïणवत्ता एयरपोर्ट के ढांचागत विकास से प्रत्यक्ष जुड़ा है।

भारत के संदर्भ में एयरपोर्ट के ढांचागत विकास का काम विमानन सेवाओं की तीव्र वृद्धि से पीछे रह गया है। कुछ एयरलाइंस के बीच स्वस्थ प्रतिस्पद्र्धा होने से हवाई यात्री परिवहन में अच्छी प्रगति देखी गई है। सरकार ने भी उड़ान योजना का ऐलान कर इस तेजी को गति दी है। इस योजना के तहत हवाई संपर्क से वंचित शहरों के बीच हवाई उड़ानें संचालित की जाएंगी।

लेकिन विडंबना है कि एयरपोर्ट क्षेत्र में नई क्षमता के निर्माण की दिशा में इस तरह ध्यान नहीं दिया गया है। दिल्ली और मुंबई के एयरपोर्ट पर बोझ बढ़ रहा है और बेंगलूरु, हैदराबाद एवं चेन्नई की भी हालत ऐसी ही हो सकती है। ऐसे में सवाल यह है कि ढांचागत आधार में समुचित विकास के बगैर संबंधित सेवाओं को बढ़ावा देने की नीति कितनी कारगर होगी?

ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं की असंतुष्टि का बढऩा लाजिमी है जो आखिरकार सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को मारने का ही काम करेगा। निवेशक भी पर्याप्त ढांचागत आधार नहीं होने से इस तरह के सेवा क्षेत्रों से दूर हो सकते हैं। इसके कुछ नीतिगत असर भी देखे जा सकते हैं। सरकार को बेहतर नीति अपनाने और उनके प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत है ताकि ये क्षेत्र अपनी कमजोरियों से निपट सकें। अगर इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता है तो मोदी सरकार का दर्जन भर सेवाओं को बढ़ावा देने का कदम कोई भी असर छोड़ पाने में नाकाम रहेगा।
Keyword: मीडिया रिपोर्ट, अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन, फूड डिलिवरी, उद्योग,
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