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चेतावनी की घंटी

संपादकीय /  March 15, 2018

तीन लोकसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव के नतीजे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए अचंभित करने वाले रहे हैं। तीनों सीटों पर भाजपा को मिली हार का राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक असर हो सकता है। इन सीटों का राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील होना भाजपा की हार को अधिक गंभीर बना देता है। उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर सीटों पर उपचुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद कराए गए थे। 
गोरखपुर सीट पर मिली हार भाजपा के लिए कहीं अधिक शर्मनाक है क्योंकि पार्टी इस सीट को 1989 से ही लगातार जीतती चली आ रही थी। इसके अलावा यह क्षेत्र आदित्यनाथ का अपना गढ़ भी रहा है। अहम बिंदु यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में इन दोनों ही सीटों पर समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और कांग्रेस को मिले कुल मतों से अधिक मत भाजपा को अकेले मिले थे। बिहार में अररिया लोकसभा सीट पर लालू प्रसाद की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने अपना कब्जा बरकरार रखा है। 

अब राजद अपने पूर्व सहयोगी एवं अचानक ही पाला बदलकर भाजपा से हाथ मिला लेने वाले नीतीश कुमार पर नैतिक जीत का दावा भी कर सकती है। इन चुनावी नतीजों का एक निहितार्थ यह है कि इन सीटों पर जीत विपक्षी दलों की एकता के प्रभाव को दर्शाती है। मसलन, उत्तर प्रदेश में सपा ने इस उपचुनाव के लिए अपनी कट्टïर प्रतिद्वंद्वी बसपा के साथ अस्थायी एवं अनौपचारिक समझौता किया था। इसका असर यह हुआ कि सपा प्रत्याशी आसानी से भाजपा को मिले मतों से आगे निकलने में सफल रहे। 

यह परिणाम भाजपा को 2015 में बिहार के दो कट्टïर प्रतिद्वंद्वियों- राजद और जनता दल यूनाइटेड के बीच हुए महागठबंधन की भी याद दिलाता है। उपचुनाव के नतीजों ने एक बार फिर जता दिया है कि एकजुट विपक्ष भाजपा को हरा सकता है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में अधिक समय नहीं रह जाने से इस धारणा को और भी अधिक बल मिलेगा। असल में, उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनाव भाजपा को राजस्थान और मध्य प्रदेश में मिली हार के सिलसिले को ही बयां करते हैं। 

भाजपा के मुख्य चुनावी रणनीतिकार माने जाने वाले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पार्टी से मतदाताओं के बढ़ रहे मोहभंग को नजरअंदाज करने का खतरा नहीं मोल ले सकते हैं। विरोधी स्वरों को साझा मंच मिलने की संभावना उनकी चिंता बढ़ा सकती है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाजपा का जबरदस्त उत्थान जाति-आधारित दलों से मतदाताओं की नाराजगी का परिचायक था लेकिन लग रहा है कि अब वह आकर्षण फीका पडऩे लगा है। अगर ऐसा होता है तो 2019 में भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

इन उपचुनावों ने विपक्ष को भी इतना ही अहम संदेश दिया है। विपक्ष अतीत की तरह इस बार भी बिखरा और अव्यवस्थित है। अब विपक्षी दलों को भी साफ हो चुका है कि उनमें से कोई भी अकेले भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकता है और न ही उसके पास नरेंद्र मोदी जैसा करिश्माई नेता है।

अगर विपक्षी दल आपसी झगड़े को किनारे रख देते हैं तो उनके पास अब भी इतना मत आधार है कि वे मोदी-शाह की जोड़ी का सारा खेल पलट सकते हैं। लेकिन यह अभी तय नहीं है कि विभिन्न राज्यों में एक दूसरे के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर मौजूद दल क्या एक साथ खड़े हो पाएंगे? 

इस तरह का प्रयोग बिहार में नाकाम साबित हो चुका है और हमें देखना होगा कि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के असहज संबंध कितना आगे तक जा पाते हैं? इस संदर्भ में कांग्रेस के साथ खड़े होने को लेकर वामदलों की हिचकिचाहट समझी जा सकती है। आखिर वामदल केवल केरल में ही सत्ता में बचे रह गए हैं और वहां पर उनका मुख्य मुकाबला कांग्रेस से ही होता है। निश्चित रूप से सोनिया गांधी के रात्रिभोज में पहुंचे करीब 20 दलों के प्रतिनिधियों के पास चर्चा के लिए काफी कुछ रहा होगा।
Keyword: लोकसभा, उपचुनाव, भाजपा, योगी आदित्यनाथ,
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