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क्या परिवर्तन के दौर से गुजर रही है कांग्रेस?

आदिति फडणीस /  March 14, 2018

देश पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली पार्टी कांग्रेस ने अपने नए निजाम की योजनाओं की घोषणा करते हुए ट्वीट किया, 'कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी 16 से 18 मार्च तक होने वाले पूर्ण अधिवेशन में भारत के लिए एक दृष्टिïकोण का खुलासा करेगी। यह फिर से भारत को पाने का समय है।'

 

राहुल ने दिसंबर 2017 में अपनी मां सोनिया गांधी से देश की सबसे पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष का पद संभाला था। अब वह अपनी नियुक्ति की संवैधानिक जरूरत को पूरा करने के लिए अधिवेशन आयोजित कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष का दिमाग और संसाधन बैंक 24 सदस्यीय कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) है। इस समिति का चुनाव अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के 1,200 सदस्यों का निर्वाचक मंडल करता है। अधिवेशन में नई सीडब्ल्यूसी का चयन या निर्वाचन या फिर दोनों हो सकते हैं। फिर यह समिति पार्टी के बारे में राहुल को सुझाव देगी।

एक राजनीतिक दल का पुनर्गठन करना जोखिम वाला काम है। इसमें निरंतरता होनी चाहिए लेकिन बदलाव भी आना चाहिए। पिछली पीढिय़ों से विरासत में मिले बोझ से निजात मिलनी चाहिए। प्रतिस्पद्र्घा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए लेकिन एक हद तक ही इसकी अनुमति होनी चाहिए। आखिर कोई भी राजा से बड़ा नहीं हो सकता। इसका राज इसमें छिपा है कि नेतृत्व किस तरह से मुद्दों को प्रस्तुत करता है। आखिर मुद्दों से ही कोई राजनीतिक दल और उसका आधार परिभाषित होता है।

सीडब्ल्यूसी का संयोजन इन सवालों का समाधान करेगा। पार्टी में कई ऐसे नेता हैं जो उम्र को केवल एक संख्या मानते हैं लेकिन नई पीढ़ी भी नेतृत्व संभालने को बेकरार है। राजस्थान में इस धर्मसंकट को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री अशोक गहलोत गुजरात में राहुल के शेरपा (प्रभारी) थे। 

पार्टी भले ही गुजरात विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज नहीं कर पाई लेकिन उसका मानना है कि उसने राज्य में नैतिक जीत दर्ज की। लेकिन हाल में अलवर और अजमेर लोकसभा उप चुनावों में जीत का श्रेय सचिन पायलट को गया। पायलट कांग्रेस की राजस्थान इकाई के अध्यक्ष हैं और राहुल की पीढ़ी के हैं। राजस्थान में इस साल के अंत में होने वाले चुनावों में कांग्रेस की जीत की संभावनाओं के मद्देनजर गहलोत या पायलट में से किसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

मध्य प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। वहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। वहां कौन पार्टी का चेहरा होगा? ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल की पीढ़ी के हैं और राजघराने से संबंध रखते हैं। उनके पिता के सहयोगी कमलनाथ सफल प्रबंधक हैं और लंबे समय से लोकसभा के सदस्य हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की पूरे राज्य में  पकड़ है। फिलहाल वह अपनी राज्यव्यापी यात्रा के अंतिम चरण में हैं। 

अब सवाल उठता है कि सीडब्ल्यूसी में कितने युवा नेता होंगे? मौजूदा संकेतों के मुताबिक राहुल अपनी मां के नक्शेकदम पर ही आगे बढ़ेंगे। यानी सीडब्ल्यूसी में निर्वाचन नहीं बल्कि चयन होगा। यह कोई नई बात नहीं है। जब पी वी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे और पार्टी की बागडोर गांधी परिवार के पास नहीं थी तो सीडब्ल्यूसी के लिए निर्वाचन का आदेश दिया था। लेकिन जब उनके प्रतिद्वंद्वी अर्जुन सिंह और राजेश पायलट तथा शरद पवार जैसे नेता जीत गए तो उन्होंने सीडब्ल्यूसी के पुनर्गठन का आदेश दिया। इसके बाद सीडब्ल्यूसी का प्रारूप ऐसा हो गया कि उसके आधे सदस्य निर्वाचित और आधे चयनित थे।

लेकिन राहुल ने पार्टी में कुछ बदलाव किए हैं। पहली बार कांग्रेस ने डेटा विश्लेषण विभाग शुरू किया गया है जिसकी कमान निवेश बैंकर और राजनीतिक अर्थशास्त्री प्रवीण चक्रवर्ती को सौंपी गई है। पार्टी के सोशल मीडिया प्रकोष्ठï को अभिनेत्री रम्या और उनकी टीम के रूप में नया कलेवर दिया गया है। आईआईएम के प्रोफेसर राजीव गौड़ा के मार्गदर्शन में एक रणनीति प्रकोष्ठ बनाया गया है। इसे अनुसंधान और सरकार की नीतियों की आलोचना के लिए दस्तावेज बनाने का काम सौंपा गया है। 

कांग्रेस अब जिस भाषा में बात कर रही है, उसमें इन बदलावों की झलक मिलती है। 2013 में फिक्की की वार्षिक आम बैठक और पिछले सप्ताह सिंगापुर में भारतीय समुदाय के साथ बैठक में उनके भाषण की तुलना करें तो अंतर साफ नजर आता है।2013 में वह संकोची और रक्षात्मक दिखे। उन्होंने कहा था, 'अगर आपको काम करने में संघर्ष करना पड़ रहा है तो फिर काम की धीमी गति स्वीकार्य नहीं है। मैं इस बात को समझता हूं और जानता हूं कि जब आप बुरी खबर के साथ एजीएम में जाते हैं तो आपको कैसा महसूस होता है।' 

यह उस पार्टी की भाषा था जो सत्ता से बाहर जा रही थी। पिछले सप्ताह सिंगापुर में उन्होंने कहा कि वह इस बात को लेकर स्पष्टï हैं कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो उसे क्या करना है। वह एक ऐसी विदेश नीति पर चलेगी जो रणनीतिक हो। पार्टी भाजपा की तरह तात्कालिक विदेश नीति नहीं अपनाएगी। उन्होंने कहा, 'मैं इस राय से सहमत नहीं हूं कि भारत विनिर्माण में चीन से मुकाबला नहीं कर सकता।' एक समय ऐसा भी था जब राहुल केवल गरीबी की ही बात करते थे। अब वह कंपनियों को उत्साहित करने की बात भी कर रहे हैं लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वे मानवीय बनी रहें।

राहुल के साथ विदेश दौरों पर जाने वाली टीम उस टीम से अलग है जो उनकी मां के साथ जाया करती थी। सोनिया के साथ के नटवर सिंह, जयराम रमेश, मुरली देवड़ा और मनमोहन सिंह जाया करते थे। लेकिन कांग्रेस के नए अध्यक्ष के साथ सैम पित्रोदा, मिलिंद देवड़ा, मधु गौड़ यक्षी और शशि थरूर जाते हैं। कांग्रेस को भले ही चुनावों में हार का सामना करना पड़ रहा है लेकिन वह बदल रही है। अलबत्ता उसके पास समय कम है। 
Keyword: कांग्रेस, निजाम, योजना, सोनिया गांधी,
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