बिजनेस स्टैंडर्ड - समयपूर्व सख्ती का क्या होगा प्रभाव?
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समयपूर्व सख्ती का क्या होगा प्रभाव?

नीलकंठ मिश्रा /  March 14, 2018

ठीक ऐसे वक्त जबकि भारत की आर्थिक वृद्घि ने गति पकडऩी शुरू ही की थी, मौद्रिक हालात सख्त होने लगे हैं। जो लोग बॉन्ड बाजार पर निर्भर हैं उनके लिए हालात पहले ही सख्त हो चुके हैं क्योंकि ब्याज दरों में करीब डेढ़ फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है। बीते वित्त वर्ष के दौरान करीब 7 लाख करोड़ रुपये के वृद्घि संबंधी ऋण में से करीब 5 लाख करोड़ रुपये की फंडिंग बैंकिंग व्यवस्था के बाहर हुई। यहां तक कि बैंक फंडिंग वाले संस्थान भी अब उच्च दरों की उम्मीद कर रहे हैं क्योंकि भारतीय स्टेट बैंक ने भी ऋण दरों में 20 आधार अंक तक का इजाफा किया है।
बॉन्ड प्रतिफल इतनी तेजी से बढ़ा है कि केवल इस पर दृष्टिï रखने वाले पर्यवेक्षकों को लग सकता है कि अर्थव्यवस्था संकट में है। बीते छह महीनों की गतिविधियां हालिया स्मृति की सबसे खराब गतिविधियां हैं और ये 2013, 2008 और 2009 की संकट वाली तिमाहियों की याद दिलाती हैं। 

इसके लिए तमाम तरह की बातें सामने आ रही हैं। मसलन क्या अर्थव्यवस्था वाकई बदल रही है? क्या प्रतिफल बढऩा नहीं चाहिए? वैश्विक बॉन्ड प्रतिफल में इजाफे की ओर संकेत किया जा रहा है तो कोई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में इजाफे का जिक्र कर रहा है और राजकोषीय चूक की बात की जा रही है। इसमें कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों की भूमिका तथा पास आ रहे आम चुनावों का उल्लेख हो रहा है। हमारी नजर में इन सबकी जांच परख की कोई आवश्यकता नहीं।

यहां तक कि दिसंबर तिमाही में अप्रत्याशित मजबूत जीडीपी वृद्घि भी अतीत की तुलना में काफी कम है और अभी आर्थिक सुधार के शुरुआती स्तर पर मुद्रास्फीतिक दबाव को लेकर चिंतित होना बहुत जल्दबाजी होगी। दरअसल 10 वर्ष की सरकारी प्रतिभूति पर प्रतिफल तथा मौद्रिक नीति समिति द्वारा तय रीपो दर उच्चतम स्तर पर है। यह वर्ष 2013 के मध्य के महीनों से भी अधिक है। अगर इस अंतर को औसत स्तर तक कम करना है तो या तो बॉन्ड प्रतिफल में एक फीसदी की कमी करनी होगी या एमपीसी को दरों में इजाफा करना होगा। 

एमपीसी का लक्ष्य मुद्रास्फीति है। मुद्रास्फीति को 6 फीसदी के आसपास केंद्रित रखना होगा। मुद्रास्फीति नियंत्रण में है क्योंकि प्याज और टमाटर जैसी वस्तुएं जो अतीत में महंगाई की प्रमुख वजह रही हैं, उनकी कीमत अभी काफी कम है। केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का नया फॉर्मूला बनाया है जिससे कुछ चिंता उत्पन्न हो सकती है क्योंकि यह नीतिगत प्राथमिकता में बदलाव का संकेत देती है। पहले जहां प्राथमिकता हर हाल में मुद्रास्फीति पर नियंत्रण की थी वहीं अब किसानों को मुनाफे की गारंटी देना हो गई है। बहरहाल, अगर सरकार इसमें सफल भी हो जाती है तो भी हर श्रेणी के अधिशेष को देखते हुए लगता नहीं कि उपभोक्ता मूल्य पर इसका असर होगा। 

इसी प्रकार देश के संप्रभु बॉन्ड प्रतिफल और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिफल के अंतर को निरंतर रखने के क्रम में कोई संबंध तय कर पाना मुश्किल है। भारत सरकार के बॉन्ड में से 5 फीसदी से भी कम का मालिकाना विदेशियों के पास है और बीते दशक के मध्य में अमेरिका और भारत सरकार के बॉन्ड प्रतिफल समान थे। हाल में अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में हुआ इजाफा भी कई मोर्चों पर अनुमान बदलने से संबद्घ है। इसमें बढ़ते वेतन भत्ते और अमेरिकी राजकोषीय घाटे में इजाफा शामिल हैं।

भारत में राजकोषीय फिसलन को लेकर तथा वस्तु एवं सेवा कर संग्रह के सरकारी अनुमान को लेकर भी चिंताएं हैं। यह बात चकित करने वाली है क्योंकि इसके अनुमान मृदु ही नजर आ रहे हैं। खासतौर पर धातु, प्लास्टिक और रसायन आदि क्षेत्रों ने अप्रत्यक्ष कर में काफी मदद की है। 

आने वाले वर्ष में कारोबारी आय कर संग्रह भी बाजार के अनुमान से कम होने की बात कही जा रही है। ज्यादा अहम बात यह है कि व्यापक स्तर पर कोई भी विश्लेषण जो राजकोषीय घाटे को बॉन्ड प्रतिफल से जोड़ता हो उसे केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त उधारी पर ध्यान देना चाहिए।

इन बातों के आधार पर हम यह मानते हैं कि बान्ड प्रतिफल के इस ऊंचे स्तर पर बरकरार रहने की कोई वजह नहीं है। ऐसा लगता है कि बॉन्ड बाजार में तरलता के कारण अस्थिरता बढ़ रही है। सरकारी बैंकों में गत अक्टूबर में भारी पूंजी डालने का वादा सरकार ने किया था। उन्होंने सरकारी बॉन्ड में अपनी होल्डिंग कम करनी शुरू कर दी ताकि ऋण बढ़ाने की गुंजाइश बन सके। 

बॉन्ड प्रतिफल में इस इजाफे की वजह से ऋण बॉन्ड बाजार से वापस बैंकों की ओर जाने लगा। इससे बॉन्ड पर बिकवाली का दबाव बना। उन्होंने सरकारी बॉन्ड की नीलामी में भी रुचि लेना कम कर दिया। बकाया सरकारी बॉन्ड का करीब 40 फीसदी बैंकों के पास है। ऐसे में जब वे बिकवाली पर आते हैं तो बाकी का बाजार इनको संतुलित नहीं कर सकता। 

यह प्रकरण बताता है कि बैंकों का इस प्रक्रिया से अलग होना जहां नीतिगत प्राथमिकताओं के अनुरूप है, वहीं महत्त्वपूर्ण सरकारी बॉन्ड प्रतिफल की निगरानी और उनको स्थिर रखने के उपाय अभी निर्मित ही हो रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा अतिरिक्त उधारी की घोषणा की तारीख इसका उदाहरण है। 31 दिसंबर को तिमाही समाप्त होने के दो दिन पहले इसकी घोषणा की गई। 

तीन सप्ताह बाद उसके आकार को संशोधित किया गया। बहरहाल जैसे-जैसे बाजार का तंत्र विकसित होगा और व्यवस्थागत अपरिपक्वता के चलते असावधानीवश सख्ती की स्थिति बनेगी तो निष्क्रियता नुकसानदेह साबित हो सकती है। हाल ही में कुछ नीतिगत बदलाव ऐसे भी किए गए हैं जो बैंकों और कंपनी प्रवर्तकों के गठजोड़ को तोडऩा चाहते हैं। इन्होंने भी सरकारी बैंकों में ऋण के प्रति अरुचि पैदा की होगी। व्यापार फाइनैंसिंग के हालिया स्कैंडलों के बाद भी बाहरी उधारी घरेलू बाजार में वापस आ रही है।

बॉन्ड कीमतों में गिरावट ने वित्तीय बचत को शेयरों की ओर मोड़ा है। यह ऐसे वक्त में हुआ है जबकि औपचारिक ऋण की पहुंच अभी भी बहुत कम है। फंडिंग की लागत में होने वाला इजाफा बॉन्ड बाजार के विस्तार को धीमा कर सकता है। बहरहाल, अर्थव्यवस्था में बचत का गलत आवंटन न केवल अनुत्पादक होता है बल्कि वह नुकसानदेह भी हो सकता है। 

अर्थव्यवस्था में वित्तीय बचत बढ़ती रहने, मुद्रास्फीति के नियंत्रण में रहने तथा बॉन्ड बाजार से सरकारी उधारी के नियंत्रण में रहने पर बॉन्ड प्रतिफल को ऐसे स्तर पर पहुंच सकते हैं जहां उन्हें वास्तव में होना चाहिए। बहरहाल, अभी यह स्पष्टï नहीं है कि क्या ऐसे संतुलन में पहुंचने में कितना वक्त लगता है।
Keyword: भारत, आर्थिक वृद्घि, मौद्रिक, बॉन्ड प्रतिफल,
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