बिजनेस स्टैंडर्ड - कौन चाहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सुधार!
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, May 22, 2018 08:07 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कौन चाहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सुधार!

देवाशिष बसु /  March 13, 2018

सरकारी क्षेत्र के बैंक हर कुछ महीने में खबरों में बने रहते हैं। उनके बारे में जो खबरें आती हैं उनमें तमाम खबरें उनके भारी भरकम घाटे से जुड़ी होती हैं। 5 या 10 अरब रुपये के तिमाही घाटे की खबरें तो अब आम हो चुकी हैं। दूसरी तरह की खबरों का ताल्लुक बड़े घोटालों या कहें ऋण डिफॉल्ट से संबंधित होती हैं। 

 

उदाहरण के लिए 50 अरब रुपये का घोटाला जिसमें विनसम डायमंड्स के हाई प्रोफाइल प्रवर्तक सावधानीपूर्वक पैसा इधर-उधर कर गायब हो गए या फिर 127 अरब रुपये का वह घोटाला जिसमें आभूषण कारोबारी नीरव मोदी और उनके मामा मेहुल चौकसी फरार हो गए। तीसरी तरह की खबर वह होती है जो उपरोक्त दोनों की प्रतिक्रिया स्वरूप सामने आती है। उदाहरण के लिए बैंकों का पुनर्पूंजीकरण, बैकों के शीर्ष प्रबंधन की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव या निगरानी व्यवस्था में बदलाव आदि। 

इन खबरों को लेकर लोगों के मन में एकबारगी आश्चर्य और गुस्सा पैदा होता है, इसे लेकर चर्चा होती है और फिर ये खबरें शांत पड़ जाती हैं। इसके साथ ही सुधारों को लेकर उपजा शोर भी शांत हो जाता है। सरकारी बैंक उसी पुराने ढर्रे पर चलते रहते हैं। अगर हमें सार्वजनिक धन की इस लूट के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना हो और किसी पर जवाबदेही डालनी हो तो आखिर यह जवाबदेही किस पर थोपी जाए? 

मेरी नजर में इसके लिए इन तीनों को जिम्मेदार माना जाना चाहिए: 
बैंक प्रबंधन और आरबीआई: इतने बड़े पैमाने पर फंसा हुआ कर्ज बताता है कि आधारभूत बैंकिंग का ढांचा ही चरमरा चुका है। बैंक अधिकारियों ने बगैर पर्याप्त जोखिम का आकलन किए जमकर ऋण बांटा। यह काम कंपनियों के प्रवर्तकों के साथ मिलीभगत के साथ किया गया। याद रहे कि बैंकिंग देश में सबसे अधिक विनियमित कारोबार में से एक है। 

रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के तमाम काबिल लोग हर सरकारी बैंक के बोर्ड की शोभा बढ़ाते हैं। बैंकों को दर्जनों अंकेक्षण और अनुपालन मानकों का पालन करना पड़ता है। समवर्ती अंकेक्षण, आंतरिक अंकेक्षण, सांविधिक अंकेक्षण और आरबीआई अंकेक्षण इसके उदाहरण हैं। 

रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब नैशनल बैंक जिसमें 127 अरब रुपये का घोटाला बहुत आसानी के साथ अंजाम दिया गया वहां ऋण के अंकेक्षण, जोखिम के आंतरिक अंकेक्षण, राजस्व अंकेक्षण, सूचना व्यवस्था का अंकेक्षण, आकस्मिक अंकेक्षण, क्षेत्रवार अंकेक्षण, अनुपालन अंकेक्षण, विधिक अंकेक्षण और विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम के तहत अंकेक्षण आदि की व्यवस्था है। इन सबके बावजूद न तो धोखाधड़ी रुकी और न ही फंसे हुए कर्ज की समस्या कम हुई। ऐसा इसलिए कि किसी बैंकिंग या नियामकीय अधिकारी ने कभी उनको जिम्मेदार ही नहीं ठहराया। जाहिर है यह पूरा समूह सरकारी बैंकों के सुधार को लेकर कतई रुचि नहीं रखता। 

वित्त मंत्रालय की नौकरशाही: भारत में बदलाव नौकरशाही के जरिये भी आ सकता है यानी पारंपरिक नीति निर्माताओं द्वारा। बैंकिंग और वित्त क्षेत्र में यह विभाग है वित्तीय सेवा विभाग। इसकी निगरानी छह सचिवों, दो अतिरिक्त सचिवों, दो आर्थिक सलाहकारों और एक उपमहानिदेशक के जिम्मे होती है। लोकरंजन संभवत: छह संयुक्त सचिवों में वरिष्ठïतम हैं। उनके पास व्यापक जिम्मेदारियां हैं। इनमें वित्तीय समावेशन, कारोबारी प्रतिनिधि, मोबाइल बैंकिंग, ई-गवर्नेंस, ई-भुगतान, प्वाइंट ऑफ सेल और प्रीपेड कार्ड, जिला और राज्य स्तरीय बैंकर समितियां, प्रमुख बैंक योजनाएं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, भुगतान नियामक बोर्ड और बैंकिंग नेटवर्क विस्तार आदि शामिल हैं। 

रंजन ने अगस्त 2017 में कार्यभार संभाला और तत्काल बैंक ऑफ बड़ौदा के निदेशक बन गए। वित्तीय क्षेत्र विशेषज्ञता की मांग करता है जबकि विभागीय अधिकारियों के पास वह नहीं होती। श्री रंजन का पिछला काम त्रिपुरा के पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव का था। 

पंकज जैन एक अन्य योग्य संयुक्त सचिव हैं। वह प्रधानमंत्री मुद्रा योजना और स्टैंड अप इंडिया योजना के लिए उत्तरदायी हैं। वह केनरा बैंक के निदेशक रहे हैं और अब आईडीबीआई बैंक के बोर्ड में हैं। इन दोनों बैंकों का नाम घोटालों में शमिल है। हमारे देश में शायद बैंकिंग और वित्तीय जगत की प्रतिभाएं दुर्लभ हैं और उन्हें केवल भारतीय प्रशासनिक सेवा में ही पाया जा सकता है। यही वजह है कि उन्हें इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस कंपनी लिमिटेड का उत्तरदायित्व भी सौंपा गया है। उनकी पिछली पदस्थापना मेघालय सरकार के सचिव के रूप में थी। 

अमित अग्रवाल तीसरे संयुक्त सचिव हैं। वह बैंकिंग परिचालन और लेखा, औद्योगिक संबंध, रिकवरी, बैंकों के निदेशक मंडल से जुड़ी शाखा, कोर बैंकिंग सॉल्युशन से जुड़े मुद्दों, सरकारी बैंकों के कंप्यूटरीकरण, साइबर सुरक्षा आदि का काम संभालते हैं। वह छत्तीसगढ़ सरकार के वित्त सचिव थे। इनके अलावा शिक्षा ऋण और विद्या लक्ष्मी पोर्टल के लिए संयुक्त सचिव हैं, वस्तु एवं सेवा कर इकाई, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, कृषि ऋण, पेंशन सुधार और फंसे हुए कर्ज तथा केंद्रीकृत केवाई के लिए भी संयुक्त सचिव हैं। 

ये सब शीर्ष स्तर के मस्तिष्क हैं जो मेहनत से काम करते हैं लेकिन शायद ही कभी नतीजों में कोई अंतर ला पाए हों। जबकि लोकतांत्रिक पूंजीवाद में नतीजे अहम हैं। उपभोक्ताओं के लिए सस्ती और आसान पूंजी सुनिश्चित करानी होगी वह भी वित्तीय क्षेत्र के कारोबारियों के बीच प्रतिस्पर्धा और क्षमता बढ़ाकर। क्या वे सरकारी बैंक सुधार में रुचि रखते हैं? बीते दो दशक के दौरान उनके काम का विस्तार हुआ है लेकिन इस दौरान उनका घाटा भी लगातार बढ़ता जा रहा है।

राजनेता: असली शक्ति नेताओं के पास ही है क्योंकि वे कानून बदल सकते हैं। इसके बावजूद सरकारी बैंकों की गड़बड़ी के लिए उन्हें सीधे उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। इसमें बैंकों पर कमजोर कारोबारी संस्थानों को ऋण देने के लिए दबाव बनाने से लेकर शीर्ष स्तर पर गलत नियुक्तियों तक के आरोप लगते रहे हैं। क्या वे सरकारी बैंकों के सुधार में रुचि रखते हैं? ऐसा सोचना भी हास्यास्पद है। 

यकीनन मौजूदा बैंकिंग संकट का अंत भी वैसा ही होगा जैसा कि हम देखते आए हैं। हमें अंतहीन बहस देखने को मिलेंगी, व्यवस्था को लेकर बात होगी, अंकेक्षण का जिक्र आएगा और यह बात चलेगी कि क्या शीर्ष प्रबंधन इससे अवगत रहा होगा। ये सब बातें बेकार है क्योंकि जो लोग बहस कर रहे हैं वे कोई बदलाव नहीं ला सकते। जो बदलाव ला सकते हैं उनके हित यथास्थिति बरकरार रखने से ही सधते हैं।
Keyword: बैंक प्रबंधन, आरबीआई, वित्त मंत्रालय,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या शुल्क कटौती कर तेल के बढ़ते दाम से राहत दिलाए सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.