बिजनेस स्टैंडर्ड - दिवालिया प्रक्रिया के अवरोध
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दिवालिया प्रक्रिया के अवरोध

संपादकीय /  March 11, 2018

ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) ने भारत में ऋण भुगतान की गंभीर समस्या के समाधान में कुछ अच्छी प्रगति की है। राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) को कर्ज समाधान के लिए जिन 12 कर्जदार कंपनियों के मामले सौंपे गए थे उनमें से दो कंपनियों- भूषण स्टील और एमटेक ऑटो को क्रमश: टाटा स्टील और लिबर्टी हाउस के रूप में खरीदार मिल गए हैं। छह अन्य कंपनियों के मामले में भी खरीदार का इंतजार अगले महीने की शुरुआत तक खत्म होने की संभावना है। भारत की परंपरागत जटिल प्रक्रियाओं को देखते हुए एनसीएलटी को मामले सौंपे जाने के पांच महीनों में ही इतनी प्रगति अच्छी मानी जाएगी। 

 

यह स्वत:सिद्ध है कि इस तेजी का आकलन मजबूत प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा लेकिन कर्ज समाधान पेशेवरों की सक्षमता भी इसका एक अहम पहलू होगा। भारतीय ऋणशोधन एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) की परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को ही इन्सॉल्वेंसी पेशेवर का लाइसेंस दिए जाने की जरूरत है। लेकिन कुछ हालिया घटनाएं आगे चलकर खड़ी होने वाली समस्याओं की ओर इशारा कर रही हैं।

मसलन, आईबीसी कानून के तहत पहले स्वीकृत मामले सिनर्जीज डूरे ऑटोमोटिव लिमिटेड के संदर्भ में उसके ऋणदाता एडलवाइस एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी ने सितंबर 2017 में समाधान पेशेवर के खिलाफ आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई थी। एडलवाइस का कहना था कि समाधान पेशेवर ने सिनर्जीज डूरे की धांधली को ध्यान में रखे बगैर 94 फीसदी हेयरकट को मंजूरी दे दी थी। सिनर्जीज डूरे पर अपना कर्ज संबद्ध कंपनियों को स्थानांतरित करने की धांधली करने के आरोप लगाए गए थे। एनसीएलटी ने इस शिकायत को खारिज कर दिया था लेकिन इस मामले ने दिवालिया प्रक्रिया में कर्जदाताओं के अधिकारों और समाधान पेशेवरों की भूमिका से संबंधित सवाल खड़े कर दिए। 

यह मुद्दा काफी अहम है क्योंकि परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियां और निजी इक्विटी एवं वेंचर कैपिटल फंड फंसे कर्जों की निपटान प्रक्रिया में लगने वाली जोखिम पूंजी के बेहद जरूरी स्रोत हो सकते हैं। हालांकि इन इकाइयों को अभी तक कर्ज समाधान प्रक्रिया में सीमित भूमिका ही दी गई है। सूचना साझा करने की प्रक्रिया का जटिल होना उनके अविश्वास का अहम कारण है। उनकी प्रमुख शिकायत यह है कि समाधान पेशेवर संबंधित कंपनी के बारे में पर्याप्त आंकड़े नहीं देते हैं। 

इसी तरह कर्जदार कंपनी के कारखानों का दौरा भी नहीं करवाया जाता है। समाधान पेशेवरों के स्तर पर पारदर्शिता के अभाव का सामना केवल जोखिम पूंजी मुहैया कराने वालों तक ही सीमित नहीं है। जैसे, बिनानी सीमेंट के मामले में आदित्य बिड़ला ग्रुप की कंपनी अल्ट्राटेक ने समाधान प्रक्रिया को एनसीएलटी के कोलकाता पीठ के समक्ष चुनौती दी है। उसका कहना है कि कर्ज समाधान पेशेवर ने उसकी बोली को खारिज करने की कोई वजह नहीं बताई थी। 

ये सभी मसले अनुभवहीनता की उपज हो सकते हैं। उसे देखते हुए आईबीबीआई ने शिकायत दर्ज कराने की एक औपचारिक व्यवस्था लागू करने का भी जिक्र किया है। अगर इससे बोलीकर्ताओं तक जरूरी सूचनाएं सक्रिय तरीके से पहुंचाने में मदद मिलती है तो निपटान प्रक्रिया को भी लाभ होगा। फंसे कर्ज की समस्या दूर करने के लिए की गई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहल को विवादों और दीर्घकालिक मुकदमों से बचाने के लिए ऐसा करना जरूरी है। कुछ दूसरी समस्याएं भी हैं। 

संजीदा बोलीकर्ताओं को हतोत्साहित होने से बचाने के लिए इस कानून में बदलाव करने का यह माकूल वक्त है। मसलन, इस कानून में 'संबद्ध' एवं 'संबंधित' पक्षों की व्याख्या की गुंजाइश नहीं छोड़ी जानी चाहिए। इसके अलावा इसका भी स्पष्ट जिक्र होना चाहिए कि समाधान प्रक्रिया के लिए अयोग्य ठहराई गई कंपनियों पर लगी रोक कब तक लागू रहेगी? 
Keyword: आईबीसी, एनसीएलटी, भूषण स्टील, एमटेक,
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