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पीएनबी घोटाले का चुनावी असर रोक पाने में भाजपा सफल

ए के भट्टाचार्य /  March 06, 2018

नीरव मोदी की धोखाधड़ी का मामला 14 फरवरी, 2018 को सामने आते ही पूरे देश को स्तब्ध कर गया। देश के दूसरे सबसे बड़े सार्वजनिक बैंक पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) ने बंबई  स्टॉक एक्सचेंज को जानकारी दी थी कि उसकी तरफ से जारी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) के जरिये 11,400 करोड़ रुपये से अधिक की 'धोखाधड़ी और अनधिकृत लेनदेन' होने का उसे पता चला है।

 

बाद में कुछ और संदिग्ध लेनदेन के सामने आने पर पीएनबी में हुई इस धोखाधड़ी का आकार बढ़कर 12,600 करोड़ रुपये हो गया। महंगे हीरा आभूषणों के डिजाइनर और अरबपति कारोबारी नीरव मोदी और उसके मामा मेहुल चोकसी पर बिना गारंटी वाले इन एलओयू का गलत तरीके से इस्तेमाल कर अपने कारोबार के लिए फंड जुटाने का आरोप लगा।

इन फर्जी लेनदेन के सामने आने और पीएनबी के शेयरों में तीव्र गिरावट के कुछ दिन पहले ही नीरव और चोकसी भारत से बाहर चले गए थे। भले ही सरकारी एजेंसियां नीरव और चोकसी से संबंधित संपत्तियों को जब्त करने में लगी थीं लेकिन यह साफ हो चुका था कि नरेंद्र मोदी सरकार अपने कार्यकाल के सबसे बड़े वित्तीय घोटाले का सामना कर रही है। पीएनबी फर्जीवाड़ा सामने आने के अगले दिन के तमाम अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से जगह दी थी। अखबारों ने हर्षद मेहता और केतन पारेख की संलिप्तता वाले अतीत के दूसरे बड़े वित्तीय घोटालों का भी खास तौर पर जिक्र किया था।

उसके तीन दिन बाद ही 18 फरवरी को त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हुआ था। वामदलों के बेहद मजबूत गढ़ त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने स्थानीय दल इंडिजेनस पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) के साथ गठजोड़ किया हुआ था। वाममोर्चे के नेता माणिक सरकार दो दशकों से त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बने हुए थे। उनकी छवि भी एक ईमानदार और निष्ठावान मुख्यमंत्री की रही है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने त्रिपुरा में वामपंथी दलों की शिकस्त सुनिश्चित करने के लिए अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी और जमकर चुनाव प्रचार किया।

करीब 10 दिनों बाद पूर्वोत्तर के दो अन्य राज्यों मेघालय और नगालैंड में भी वोट डाले गए। इन राज्यों में भी भाजपा पहली बार सशक्त दावेदारी पेश करने की कोशिश कर रही थी। इसके लिए उसने त्रिपुरा की ही तरह स्थानीय दलों के साथ गठजोड़ की रणनीति अपनाई थी।

पिछले शनिवार को इन तीनों राज्यों के चुनावी नतीजे आए तो पता चला कि भाजपा ने त्रिपुरा में वाम मोर्चे और उसके 'ईमानदार' मुख्यमंत्री को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। नगालैंड में भी भाजपा ने एक नए क्षेत्रीय दल के साथ मिलकर सरकार बनाने लायक सीटें हासिल कर लीं। मेघालय में भाजपा ने यह सुनिश्चित कर दिया कि सबसे बड़ा दल होने के बावजूद कांग्रेस सरकार न बना सके और फिर अन्य दलों के साथ मिलकर वहां भी सरकार बनाने का दावा पेश कर सके। ऐसे में उस पुरानी धारणा का क्या मतलब रह जाता है जिसके मुताबिक बड़े आर्थिक घोटाले किसी भी सरकार के लिए चुनाव में बड़ी जवाबदेही बन सकते हैं। यहां पर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि भ्रष्टाचार उन प्रमुख मुद्दों में से एक था जिनके दम पर भाजपा ने 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस का तख्तापलट कर दिया था। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केंद्र सरकार पर पीएनबी घोटाले को न रोक पाने और आरोपियों को देश से भागने देने के बारे में लग रहे आरोपों के बावजूद भाजपा आसानी से बच गई है? 

त्रिपुरा में तो भाजपा गठबंधन के सामने एक ऐसा साफ-सुथरा मुख्यमंत्री था जो लगातार पांचवां मुख्यमंत्री बन सकता था। जबकि इस 'ईमानदार' नेता  को हराने की उम्मीद पाल रही भाजपा पर चंद दिनों पहले ही पीएनबी घोटाला न रोक पाने के आरोप लगे थे।

वैसे यह मुमकिन है कि मतदाता इतने समझदार हो चुके हैं कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी और राज्य में सरकार बनाने की उसकी लालसा को अलग-अलग देख सकें। किसी राज्य के चुनाव में उठने वाले मुद्दे अलग किस्म के होते हैं और त्रिपुरा, नगालैंड एवं मेघालय में भी ऐसा ही देखने को मिला। वहां के मतदाता क्षेत्रीय स्वायत्तता, विकास और शासन में अधिक भागीदारी को लेकर कहीं अधिक चिंतित दिखे। शायद यही वजह है कि सरकारी नियंत्रण वाले एक बैंक में हुआ घोटाला और उसे रोक पाने में केंद्र सरकार और नियामक की नाकामी का मसला कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया।
एक वित्तीय घोटाले और राज्यों के चुनावी नतीजों के बीच के धागों के महीन हो जाने की एक और व्याख्या भी है। ऐसा लगता है कि भाजपा सरकार पीएनबी घोटाले के संबंध में आई जानकारियों का इस तरह से प्रबंधन करने में सफल रही है कि चुनावी किस्मत पर बुरे असर को काफी हद तक थामा जा सके। कांग्रेस और वाममोर्चा दोनों ही पीएनबी घोटाले का चुनावी फायदा उठा पाने में नाकाम रहे हैं और उन्हें इसकी सही वजह की पड़ताल करनी चाहिए।

इसी के साथ केंद्र की भाजपा सरकार ने पीएनबी घोटाले के नकारात्मक असर को कम करने के लिए एक साथ कई प्रशासकीय कदम भी उठाए। जहां कानूनी एजेंसियों को घोटाले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने और उनकी संपत्ति जब्त करने के लिए जीतोड़ मेहनत करने का निर्देश दिया गया वहीं सरकार ने ऑडिट फर्मों के नियमन के लिए एक स्वतंत्र नियामक का गठन करने और भगोड़े आर्थिक अपराधियों की धरपकड़ के लिए नया कानून लाने का भी फैसला किया है।

बहरहाल शनिवार को आए विधानसभा चुनाव नतीजे भाजपा के लिए राहत की खबर लेकर आए हैं। वह पीएनबी घोटाले का अपने चुनावी नतीजों पर नकारात्मक असर रोक पाने में सफल रही है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि अब घोटालों और चुनावी नतीजों के बीच के संबंध काफी महीन हो चुके हैं?
Keyword: नीरव मोदी, पीएनबी, बंबई स्टॉक एक्सचेंज,
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