बिजनेस स्टैंडर्ड - सुर्खियों के प्रबंधन की राजनीति
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सुर्खियों के प्रबंधन की राजनीति

शेखर गुप्ता /  March 04, 2018

राष्ट्रीय राजनीति अगर सुर्खियों के प्रबंधन तक सीमित रह गई है तो कहा जा सकता है कि भाजपा को इसमें ऐसा कौशल हासिल है जिसका कोई तोड़ नहीं है। 
बीते सप्ताहों की अखबारी सुर्खियों और टेलीविजन चैनलों पर प्राइम टाइम में चलने वाली बहसों पर नजर डालिए। वे सारी की सारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी तथा उनके द्वारा पंजाब नैशनल बैंक  से चुराए गए धन पर केंद्रित थीं। इसके बाद रोटोमैक पेन के विक्रम कोठारी समेत कुछ अन्य नाम सामने आए जिन्होंने 10 अरब रुपये से कम का घपला किया था। ऐसा लग रहा था मानो सरकारी बैंकों के पैसों की लूट मची थी।
मौजूदा सरकार भ्रष्टाचार से लड़ाई के वादे के साथ ही सत्ता में आई थी और जाहिर है उसके लिए यह ठीक नहीं था। सरकार के आलोचकों और विपक्षी कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक धन का चौकीदार होने के दावे का मखौल उड़ा रहे थे। विभिन्न टीकाकार कह रहे थे कि भाजपा भ्रष्टाचार के विरोध के मोर्चे पर नाकाम रही। खासतौर पर नीरव मोदी के दावोस के एक चित्र में प्रधानमंत्री मोदी के साथ दिखने के बाद।
विजय माल्या और ललित मोदी कर चोरी और ऋण न चुकाने के मामले में पहले ही देश से बाहर हैं। भाजपा के प्रवक्ता टेलीविजन पर अपने दल के बचाव में संघर्ष कर रहे थे। उनकी दलील थी कि यह चोरी संप्रग के कार्यकाल में हुई लेकिन सीबीआई की एफआईआर ने उनसे यह बचाव भी छीन लिया। फिर अचानक सबकुछ बदल गया। इन सुर्खियों की जगह नई सुर्खियों ने ले ली।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इसका संबंध श्रीदेवी के निधन से है। वह एक नितांत त्रासद संयोग था। परंतु बड़ा बदलाव मानवनिर्मित था। बल्कि कहें तो भाजपा निर्मित। जरा इन सुर्खियों के बारे में सोचिए: क्या कार्ति चिदंबरम ने इंद्राणी और पीटर मुखर्जी से 7 लाख डॉलर लिए? क्या उनके पिता ने सौदेबाजी में उनकी मदद की? हिरासत में कार्ति को नहीं मिल रहा है घर का खाना लेकिन अदालत ने उन्हें सोने की जंजीर पहनने की इजाजत दे रखी है वगैरह..वगैरह।
पूरी बहस बदल चुकी है। उन्हें बीते कई सप्ताहों के दौरान कभी भी पकड़ा जा सकता था। ध्यान रहे कि उन्हें देश छोड़ते वक्त गिरफ्तार नहीं किया गया बल्कि उन्हें तब पकड़ा गया जब वह वापस लौटे। इसलिए कि अगर आप संदेश पर नियंत्रण करना चाहते हैं तो यह अहम है कि वह किस समय सामने आता है।
यह बहुत बड़ी चोट थी लेकिन अभी कहीं अधिक कलात्मक घटना होनी बाकी थी। तकरीबन चार वर्ष तक सुसुप्तावस्था में रहने के बाद लोकपाल की नियुक्ति का मसला दोबारा चर्चा में आया। अपेक्षा के अनुरूप ही कांग्रेस ने विरोध किया और सुर्खियों का एक नया दौर शुरू हुआ। ताजा घटनाक्रम में पिछले दिनों कैबिनेट बैठक में भगोड़ा विरोधी कानून पारित करने का निर्णय हुआ। जिसके मुताबिक कोई भी व्यक्ति जो प्रवर्तन एजेंसियों के जवाब तलब करने पर छह महीने तक प्रतिक्रिया नहीं देता है उसे भगोड़ा घोषित किया जा सकता है। अब आप सोचते रहिए कि माल्या अथवा नीरव मोदी को अगर अब भगोड़ा घोषित कर भी दिया गया तो क्या होगा। क्या वे पहले ही भगोड़े नहीं हैं? कोई और वक्त होता तो मैं इसे जनता को संतुष्ट करने के लिए कानून बनाने की कवायद कहकर खारिज कर देता लेकिन अभी नहीं क्योंकि फिलहाल तो यह एक उद्देश्य की पूर्ति करता नजर आ रहा है।
ऐसी भी जानकारी सामने आ रही है कि सरकार ऐसे नए नियम कायदे ला सकती है जिनके मुताबिक आव्रजन अधिकारियों को यह अधिकार होगा कि वे बैंक देनदारी में चूक करने वालों को देश छोडऩे से रोक सकें। अब कानून और मूल अधिकार की बात की जाए तो यह कौन तय करेगा कि कोई नागरिक जानबूझकर देनदारी में चूक कर रहा है या उसे सचमुच कारोबारी घाटा हुआ है। यह भारतीय पुलिस की उस पुरानी कार्यशैली की तरह है जिसमें सेंधमारी रोकने के बजाय उस घर के आसपास पुलिस तैनात कर दी जाती थी जहां सेंध लगी होती थी। 
आज के राजनीतिक हालात की तुलना एक सप्ताह पुरानी स्थिति से करें तो भाजपा बचाव की मुद्रा में थी लेकिन आज हालात बदल गए हैं। तमाम टीवी चैनलों पर भाजपा आक्रामक है और कांग्रेस चिदंबरम का बचाव करती नजर आ रही है। 
बाकी जगह लोकपाल, भगोड़ा विरोधी विधेयक और डिफॉल्टरों पर आव्रजन संबंधी प्रतिबंध की चर्चा है। सनदी लेखाकारों की निगरानी के लिए एक नए नियामक की घोषणा की गई है जो  राष्ट्रीयकृत बैंकों पर नजर रखेंगे। बैंकों से यह भी कहा गया है कि वे 50 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी चूकने वालों की जानकारी सीबाआई को दें। सीबीआई ने सिंभावली शुगर्स के प्रवर्तकों के खिलाफ एक मामला दर्ज किया है जिनमें पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का दामाद शामिल है। यह मामला भी एक सरकारी बैंक से ऋण धोखाधड़ी से जुड़ा है। याद रहे कि ये सारे नियम कायदे उन अमीर आभूषण कारोबारियों के देश छोडऩे के बाद आए हैं। उन्होंने करीब 200 अरब रुपये की गड़बड़ी की है। उनमें से एक दावोस में प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर में नजर आया था जबकि दूसरे को प्रधानमंत्री अत्यंत अनौपचारिक ढंग से मेहुल भाई कहकर बुलाते दिखे। यह बुरी और भुलाए जाने लायक खबर थी इसलिए इसे भुला दिया गया। 
इस कथित लूट और चोरी, जिसने देश के सरकारी बैंकों को दिवालिया होने के कगार पर पहुंचा दिया, के कारण सरकार आरोपों के घेरे में थी लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही सरकार अपने इन प्रयासों के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩे वाले योद्घा के रूप में सामने थी। यह है सुर्खियों के प्रबंधन की राजनीति।
बीते चार सालों में मौजूदा सरकार के सामने आए संकटों की सूची बनाइए और आप पाएंगे कि हर बार यही रणनीति अपनाई गई। उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद अत्यंत नाटकीय सर्जिकल स्ट्राइक की घटना सामने आई। चूंकि उस पर सवाल उठाना अपनी सेना पर शंका करने का समान था इसलिए विपक्ष ने भी अपना मुंह बंद रखा बल्कि सराहना ही की। जब नोटबंदी का दबाव असहनीय हो चला था तब देश के अलग-अलग इलाकों से करोड़ों रुपये की बेनामी नकदी बरामद होने की खबरें सामने आईं। समय बीतने के साथ पता चला कि इनमें से अधिकांश तस्वीरें झूठी थीं। लेकिन फौरी तौर पर इससे जन भावनाओं को संभालने में मदद मिली। 
रोहित वेमुला की आत्महत्या के तत्काल बाद जेएनयू का मामला उछला और कन्हैया कुमार और उमर खालिद द्वारा कथित तौर पर भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाने के लिए देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया। यह अलग बात है कि किसी ने आज तक उन्हें ऐसे नारे लगाते हुए किसी वीडियो में नहीं देखा। डोकलाम संकट कहीं अधिक गंभीर मसला था, वहां भी यही तरीका आजमाया गया। टेलीविजन चैनलों और समाचार पत्रों को समझाया गया कि यह राष्ट्र हित का मसला है इसलिए इसे तूल न दी जाए। टेलीविजन चैनलों  पर बैठकर रोज ललकारने वाले कमांडो-कॉमेडियन जो अपने स्तर पर सीमा पार जाकर सर्जिकल स्ट्राइक को उद्यत रहते हैं, उन्होंने भी डोकलाम के बारे में एक शब्द नहीं कहा। सभी सरकारें संदेश पर नियंत्रण करना चाहती हैं लेकिन मोदी-शाह की भाजपा ने इसे एक ललित कला में बदल दिया है। तमाम सुर्खियां मतदाताओं के मन में इन्हीं तीन धारणाओं की पुष्टि करती हैं कि मोदी भ्रष्ट नहीं हो सकते, वह भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं और हिंदू राष्ट्रवाद के संरक्षक हैं। उनका व्यक्तित्व इतना विराट है कि उनके सामने कोई संकट टिक नहीं सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि मोदी ने कभी कुछ गलत किया ही नहीं। 
यही वजह है कि मोदी कभी ऐसे किसी झटके पर प्रतिक्रिया नहीं देते। मनमोहन सिंह और उनकी सरकार से तुलना करके देखिए। वे छोटी से छोटी बात पर बचाव की मुद्रा में नजर आते थे। उन्हें संकट के समय में मोदी सरकार के प्रदर्शन को विस्मय से देखना चाहिए और उनकी राजनीतिक बुद्घिमता की सराहना भी करनी चाहिए।
राष्टï्रीय राजनीति अगर सुर्खियों के प्रबंधन तक सीमित रह गई है तो कहा जा सकता है कि भाजपा को इसमें ऐसा कौशल हासिल है जिसका कोई तोड़ नहीं है। 
बीते सप्ताहों की अखबारी सुर्खियों और टेलीविजन चैनलों पर प्राइम टाइम में चलने वाली बहसों पर नजर डालिए। वे सारी की सारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी तथा उनके द्वारा पंजाब नैशनल बैंक  से चुराए गए धन पर केंद्रित थीं। इसके बाद रोटोमैक पेन के विक्रम कोठारी समेत कुछ अन्य नाम सामने आए जिन्होंने 10 अरब रुपये से कम का घपला किया था। ऐसा लग रहा था मानो सरकारी बैंकों के पैसों की लूट मची थी।
मौजूदा सरकार भ्रष्टाचार से लड़ाई के वादे के साथ ही सत्ता में आई थी और जाहिर है उसके लिए यह ठीक नहीं था। सरकार के आलोचकों और विपक्षी कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक धन का चौकीदार होने के दावे का मखौल उड़ा रहे थे। विभिन्न टीकाकार कह रहे थे कि भाजपा भ्रष्टाचार के विरोध के मोर्चे पर नाकाम रही। खासतौर पर नीरव मोदी के दावोस के एक चित्र में प्रधानमंत्री मोदी के साथ दिखने के बाद।
विजय माल्या और ललित मोदी कर चोरी और ऋण न चुकाने के मामले में पहले ही देश से बाहर हैं। भाजपा के प्रवक्ता टेलीविजन पर अपने दल के बचाव में संघर्ष कर रहे थे। उनकी दलील थी कि यह चोरी संप्रग के कार्यकाल में हुई लेकिन सीबीआई की एफआईआर ने उनसे यह बचाव भी छीन लिया। फिर अचानक सबकुछ बदल गया। इन सुर्खियों की जगह नई सुर्खियों ने ले ली।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इसका संबंध श्रीदेवी के निधन से है। वह एक नितांत त्रासद संयोग था। परंतु बड़ा बदलाव मानवनिर्मित था। बल्कि कहें तो भाजपा निर्मित। जरा इन सुर्खियों के बारे में सोचिए: क्या कार्ति चिदंबरम ने इंद्राणी और पीटर मुखर्जी से 7 लाख डॉलर लिए? क्या उनके पिता ने सौदेबाजी में उनकी मदद की? हिरासत में कार्ति को नहीं मिल रहा है घर का खाना लेकिन अदालत ने उन्हें सोने की जंजीर पहनने की इजाजत दे रखी है वगैरह..वगैरह।
पूरी बहस बदल चुकी है। उन्हें बीते कई सप्ताहों के दौरान कभी भी पकड़ा जा सकता था। ध्यान रहे कि उन्हें देश छोड़ते वक्त गिरफ्तार नहीं किया गया बल्कि उन्हें तब पकड़ा गया जब वह वापस लौटे। इसलिए कि अगर आप संदेश पर नियंत्रण करना चाहते हैं तो यह अहम है कि वह किस समय सामने आता है।
यह बहुत बड़ी चोट थी लेकिन अभी कहीं अधिक कलात्मक घटना होनी बाकी थी। तकरीबन चार वर्ष तक सुसुप्तावस्था में रहने के बाद लोकपाल की नियुक्ति का मसला दोबारा चर्चा में आया। अपेक्षा के अनुरूप ही कांग्रेस ने विरोध किया और सुर्खियों का एक नया दौर शुरू हुआ। ताजा घटनाक्रम में पिछले दिनों कैबिनेट बैठक में भगोड़ा विरोधी कानून पारित करने का निर्णय हुआ। जिसके मुताबिक कोई भी व्यक्ति जो प्रवर्तन एजेंसियों के जवाब तलब करने पर छह महीने तक प्रतिक्रिया नहीं देता है उसे भगोड़ा घोषित किया जा सकता है। अब आप सोचते रहिए कि माल्या अथवा नीरव मोदी को अगर अब भगोड़ा घोषित कर भी दिया गया तो क्या होगा। क्या वे पहले ही भगोड़े नहीं हैं? कोई और वक्त होता तो मैं इसे जनता को संतुष्ट करने के लिए कानून बनाने की कवायद कहकर खारिज कर देता लेकिन अभी नहीं क्योंकि फिलहाल तो यह एक उद्देश्य की पूर्ति करता नजर आ रहा है।
ऐसी भी जानकारी सामने आ रही है कि सरकार ऐसे नए नियम कायदे ला सकती है जिनके मुताबिक आव्रजन अधिकारियों को यह अधिकार होगा कि वे बैंक देनदारी में चूक करने वालों को देश छोडऩे से रोक सकें। अब कानून और मूल अधिकार की बात की जाए तो यह कौन तय करेगा कि कोई नागरिक जानबूझकर देनदारी में चूक कर रहा है या उसे सचमुच कारोबारी घाटा हुआ है। यह भारतीय पुलिस की उस पुरानी कार्यशैली की तरह है जिसमें सेंधमारी रोकने के बजाय उस घर के आसपास पुलिस तैनात कर दी जाती थी जहां सेंध लगी होती थी। 
आज के राजनीतिक हालात की तुलना एक सप्ताह पुरानी स्थिति से करें तो भाजपा बचाव की मुद्रा में थी लेकिन आज हालात बदल गए हैं। तमाम टीवी चैनलों पर भाजपा आक्रामक है और कांग्रेस चिदंबरम का बचाव करती नजर आ रही है। 
बाकी जगह लोकपाल, भगोड़ा विरोधी विधेयक और डिफॉल्टरों पर आव्रजन संबंधी प्रतिबंध की चर्चा है। सनदी लेखाकारों की निगरानी के लिए एक नए नियामक की घोषणा की गई है जो  राष्ट्रीयकृत बैंकों पर नजर रखेंगे। बैंकों से यह भी कहा गया है कि वे 50 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी चूकने वालों की जानकारी सीबाआई को दें। सीबीआई ने सिंभावली शुगर्स के प्रवर्तकों के खिलाफ एक मामला दर्ज किया है जिनमें पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का दामाद शामिल है। यह मामला भी एक सरकारी बैंक से ऋण धोखाधड़ी से जुड़ा है। याद रहे कि ये सारे नियम कायदे उन अमीर आभूषण कारोबारियों के देश छोडऩे के बाद आए हैं। उन्होंने करीब 200 अरब रुपये की गड़बड़ी की है। उनमें से एक दावोस में प्रधानमंत्री के साथ तस्वीर में नजर आया था जबकि दूसरे को प्रधानमंत्री अत्यंत अनौपचारिक ढंग से मेहुल भाई कहकर बुलाते दिखे। यह बुरी और भुलाए जाने लायक खबर थी इसलिए इसे भुला दिया गया। 
इस कथित लूट और चोरी, जिसने देश के सरकारी बैंकों को दिवालिया होने के कगार पर पहुंचा दिया, के कारण सरकार आरोपों के घेरे में थी लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही सरकार अपने इन प्रयासों के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩे वाले योद्घा के रूप में सामने थी। यह है सुर्खियों के प्रबंधन की राजनीति।
बीते चार सालों में मौजूदा सरकार के सामने आए संकटों की सूची बनाइए और आप पाएंगे कि हर बार यही रणनीति अपनाई गई। उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद अत्यंत नाटकीय सर्जिकल स्ट्राइक की घटना सामने आई। चूंकि उस पर सवाल उठाना अपनी सेना पर शंका करने का समान था इसलिए विपक्ष ने भी अपना मुंह बंद रखा बल्कि सराहना ही की। जब नोटबंदी का दबाव असहनीय हो चला था तब देश के अलग-अलग इलाकों से करोड़ों रुपये की बेनामी नकदी बरामद होने की खबरें सामने आईं। समय बीतने के साथ पता चला कि इनमें से अधिकांश तस्वीरें झूठी थीं। लेकिन फौरी तौर पर इससे जन भावनाओं को संभालने में मदद मिली। 
रोहित वेमुला की आत्महत्या के तत्काल बाद जेएनयू का मामला उछला और कन्हैया कुमार और उमर खालिद द्वारा कथित तौर पर भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाने के लिए देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया। यह अलग बात है कि किसी ने आज तक उन्हें ऐसे नारे लगाते हुए किसी वीडियो में नहीं देखा। डोकलाम संकट कहीं अधिक गंभीर मसला था, वहां भी यही तरीका आजमाया गया। टेलीविजन चैनलों और समाचार पत्रों को समझाया गया कि यह राष्ट्र हित का मसला है इसलिए इसे तूल न दी जाए। टेलीविजन चैनलों  पर बैठकर रोज ललकारने वाले कमांडो-कॉमेडियन जो अपने स्तर पर सीमा पार जाकर सर्जिकल स्ट्राइक को उद्यत रहते हैं, उन्होंने भी डोकलाम के बारे में एक शब्द नहीं कहा। सभी सरकारें संदेश पर नियंत्रण करना चाहती हैं लेकिन मोदी-शाह की भाजपा ने इसे एक ललित कला में बदल दिया है। तमाम सुर्खियां मतदाताओं के मन में इन्हीं तीन धारणाओं की पुष्टिï करती हैं कि मोदी भ्रष्ट नहीं हो सकते, वह भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं और हिंदू राष्ट्रवाद के संरक्षक हैं। उनका व्यक्तित्व इतना विराट है कि उनके सामने कोई संकट टिक नहीं सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि मोदी ने कभी कुछ गलत किया ही नहीं। 
यही वजह है कि मोदी कभी ऐसे किसी झटके पर प्रतिक्रिया नहीं देते। मनमोहन सिंह और उनकी सरकार से तुलना करके देखिए। वे छोटी से छोटी बात पर बचाव की मुद्रा में नजर आते थे। उन्हें संकट के समय में मोदी सरकार के प्रदर्शन को विस्मय से देखना चाहिए और उनकी राजनीतिक बुद्घिमता की सराहना भी करनी चाहिए।
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