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नियामकीय संस्थानों के लिए हो स्वतंत्र आकलन की व्यवस्था

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  March 01, 2018

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि भारत में राजनीतिक नेतृत्व को उसके तमाम कदमों और निष्क्रियता के लिए जवाबदेह ठहराया जाता है लेकिन नियामकों को नहीं। यह टिप्पणी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) घोटाले के संदर्भ में है जिसने पंजाब नैशनल बैंक को चपेट में ले रखा है।  वित्त मंत्री के वक्तव्य के कुछ दिन पहले योजना आयोग के अंतिम उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने भी देश की प्रमुख नीति निर्माण संस्थाओं में निगरानी तंत्र की कमी का जिक्र किया था। आहलूवालिया ने अपनी बात अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के स्वतंत्र आकलन के बारे में कही थी। वह इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनैशनल इकनॉमिक रिलेशंस में एक संगोष्ठïी  को संबोधित कर रहे थे।

 
दोनों वक्तव्यों के संदर्भ एकदम अलग हैं। जेटली ने उक्त बयान तब दिया जब पीएनबी में हुए 114 अरब रुपये के घोटाले की खबर के बाद सरकार से जरूरी कदम उठाने की मांग की जा रही थी। आहलूवालिया की देश में नीति निर्माताओं की निगरानी की इच्छा का संबंध आईएमएफ बोर्ड द्वारा गठित स्वतंत्र आकलन कार्यालय के सकारात्मक परिणामों से है जो उसके कामकाज की निगरानी करता है। आहलूवालिया 2001 में गठित आईएमएफ के स्वतंत्र आकलन कार्यालय के पहले निदेशक भी हैं। दोनों द्वारा उठाए गए मुद्दे अहम और प्रासंगिक हैं। आखिर नियामकों को जवाबदेह कैसे बनाया जाए? क्या वित्त मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित राजकोषीय नीतियों या एफआरबीएम ऐक्ट और मौद्रिक नीति समिति द्वारा आकलित मौद्रिक नीतियों के आकलन की निगरानी के लिए किसी निगरानी संस्था की जरूरत है? यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि भारतीय नियामक जवाबदेह नहीं हैं। फिलहाल अधिकांश नियामकों में अपीलीय संस्था है जो उनके आदेशों को देखती है और उसे यह अधिकार भी है कि चाहे तो आदेश को उलट सके। शेयर बाजार और बीमा बाजार की नियामकीय संस्थाओं के निर्णय के खिलाफ अपील की सुनवाई प्रतिभूति अपीलीय पंचाट में की जा सकती है। बिजली नियामक में एक नियामकीय संस्था है और दूरसंचार नियामक में भी। इसी तरह राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपीलीय पंचाट में प्रतिस्पर्धा आयोग और इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी बोर्ड के निर्णयों के खिलाफ अपील सुनी जाती है। 
 
इस मामले में रिजर्व बैंक अपवाद है। उसके पास बैंकों के नियमन और मौद्रिक नीति तैयार करने जैसे दो अहम काम हैं। केंद्रीय बैंक में भी लोकपाल हैं लेकिन वे केवल बैंकों के ग्राहकों की शिकायत सुनते हैं। आरबीआई के लिए कोई अपीलीय संस्था नहीं है और उसके किसी निर्णय या बैंक  नियमन को किसी उच्च प्राधिकार में चुनौती नहीं दी जा सकती है। ऐसे में वित्त मंत्री का इस बात से क्या तात्पर्य है कि भारतीय व्यवस्था के नियामक जवाबदेह नहीं हैं? आरबीआई के अलावा सभी नियामकों पर अपीलीय संस्था है जहां उनके निर्णयों को चुनौती दी जा सकती है। आरबीआई को सभी नियामकों में सर्वोच्च स्थान हासिल है। पहले से सटीक चली आ रही व्यवस्था में अचानक कोई भी बदलाव करना उचित नहीं होगा। 
 
फिर भी नियामकों के नियमन और उन्हें जवाबदेह बनाने का सवाल काफी समय से सरकार को परेशान किए हुए है। यह भी समझा जाना चाहिए कि केवल अपीलीय संस्था बनाने से जवाबदेही तय नहीं होती। अपील संस्थान कुछ क्षेत्रों में सफल साबित होते हैं क्योंकि नियामक इस बात से अवगत होते हैं कि उनके कदमों की समीक्षा हो सकती है और उन्हें पलटा भी जा सकता है।  बहरहाल, नियामकीय जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक तरीका यह है कि सभी नियामकों या नीति निर्णय संस्थानों के लिए स्वतंत्र निगरानी संस्था बनाई जाए। उन्हें  जवाबदेह बनाने के बजाय बेहतर होगा स्वतंत्र निगरानी समिति का गठन करना। यह समिति सभी नियामकीय संस्थानों और अपीलीय संस्थानों के लिए बनाई जा सकती हैं। 
 
इन समितियों का गठन न करने के भी अनेक खतरे हैं। उनकी अनुपस्थिति में राजनीतिक प्रतिष्ठानों से नियामकों को जवाबदेह बनाने की मांग बढ़ती जाएगी। एक और खतरा मौजूदा अंकेक्षण संस्थाओं के विस्तार का हो सकता है। ये संस्थाएं संसद को इस बारे में जानकारी देती हैं कि सरकार और उसके अन्य अंग, उन्हें आवंटित संसाधनों को किस तरह व्यय कर रहे हैं। यह अपने आप में एक अहम काम है लेकिन समस्या तब खड़ी हो सकती है जब वही वित्तीय अंकेक्षक अपनी भूमिका का विस्तार करता हुआ नीतियों के औचित्य और उनके प्रभाव पर भी विचार करने लगे। नीतिगत क्रियान्वयन का आकलन करने का मानस या मानक वही नहीं हो सकता है जो वित्तीय व्यवहार और व्यय की किफायत के आकलन के। 
 
ऐसे में यह आवश्यक है सरकार अपने राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के लक्ष्य पर किस तरह आगे बढ़ रही है, इसके आकलन तथा वृद्घि और स्थिरता के मोर्चे पर मौद्रिक नीति समिति की सफलता जानने के लिए स्वतंत्र निगरानी संस्थानों की व्यवस्था की जाए। अहम बात यह है कि ये निगरानी संस्थाएं वित्त मंत्रालय और आरबीआई को यह सलाह भी दे सकती हैं कि उन्हें अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए।  इन निगरानी संस्थानों की आजादी अहम है। तभी ये सार्थक भूमिका निभा पाएंगे। वे अपनी रिपोर्ट वित्त मंत्रालय या आरबीआई को दे सकते हैं। भले ही उनकी फंडिंग सरकार से आए लेकिन उन्हें पूरी आजादी से काम करने का मौका मिलना चाहिए। योजना आयोग ने अपने समापन से कुछ वक्त पहले स्वतंत्र आकलन कार्यालय की स्थापना की थी। परंतु योजना आयोग के साथ उसका अस्तित्व भी समाप्त हो गया। अब वक्त आ गया है कि अन्य नियामकों तथा राजकोषीय और मौद्रिक नीति के लिए स्वतंत्र आकलन कार्यालय के विचार पर काम किया जाए। देश के करदाताओं अथवा नागरिकों का यह अधिकार है।
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