बिजनेस स्टैंडर्ड - मोबाइल विज्ञापन में बदलाव की जरूरत
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मोबाइल विज्ञापन में बदलाव की जरूरत

अजित बालकृष्णन /  February 27, 2018

समय के साथ-साथ विज्ञापनों का स्वरूप भी बदलता रहा है। नए दौर में मोबाइल फोन पर दिखने वाले विज्ञापनों की दुनिया में एक बड़े रचनात्मक बदलाव की प्रतीक्षा है। विस्तार से बता रहे हैं अजित बालकृष्णन 
 
कई मायनों में विज्ञापन और उसके विविध स्वरूपों तथा समाज के बीच का रिश्ता काफी असहज रहा है। एक ओर यह शुरुआती दौर में समाचार पत्रों से लेकर टेलीविजन और बाद में वेबसाइटों और मोबाइल ऐप के रूप में मीडिया को जरूरी राजस्व मुहैया कराता आया है। वहीं दूसरी ओर समाज ने हमेशा विज्ञापन के तौर तरीकों को लेकर शंकालु रुख अपनाए रखा। फिर चाहे वह गोरा बनाने से जुड़ा विज्ञापन हो या सिगरेट जैसी नुकसानदेह चीजों का विज्ञापन अथवा राजनीतिक दलों द्वारा वोट मांगते विज्ञापन। 
सन 1957 में आई वांस पैकर्ड की किताब द हिडन पर्सुएडर्स  में पहली बार विज्ञापन जगत और उससे जुड़े लोगों को निहायत खराब ढंग से चित्रित किया गया था। रशेल कार्सन की किताब साइलेंट स्प्रिंग्स ने प्रदूषण फैलाने वाले रासायनिक उद्योगों को लेकर और राल्फ नाडर ने अपनी किताब अनसेफ एट द स्पीड  में वाहन उद्योग को लेकर किया था। पैकर्ड की किताब में मनोवैज्ञानिकों और समाजविज्ञानियों के विज्ञापन जगत के कार्याधिकारियों के साथ मिलकर आम नागरिकों पर ऐसी चीजों को खरीदने का दबाव बनाने और उनकी आदत लगाने का ब्योरा है जिनकी उन्हें दरअसल आवश्यकता ही नहीं थी। 
इसके अलावा कुछ अन्य किताबें ऐसी भी हैं जिनमें विज्ञापनों के प्रभाव को लेकर ही सवाल उठाए गए हैं। सर्जियो जाइमन की सन 2003 में आई किताब द एंड ऑफ एडवर्टाइजिंग एज वी नो इट में कहा गया कि 21वीं सदी तक विज्ञापन व्यवसाय से जुड़े लोग विज्ञापनों को लेकर इस कदर केंद्रित हो गए कि वे विज्ञापन की कला और मनोरंजन पर बहुत अधिक जोर देने लगे और उत्पाद को बेचने में उसकी भूमिका कहीं पीछे छूट गई। एआई रीस और लॉरा रीस ने 2004 में आई अपनी किताब द फाल ऑफ एडवर्टाइजिंग ऐंड द राइस ऑफ पीआर में अलग रुख अपनाया। 
उन्होंने दावा किया कि 30 सेकंड के टीवी विज्ञापनों या अखबारों और पत्रिकाओं में पूरे पन्ने के विज्ञापनों की शक्ति और उनके प्रभाव के दावे अतिरंजित हैं। उन्होंने बताया कि कैसे स्टार बक्स, बॉडी शॉप, वॉलमार्ट, रेडबुल और जारा बिना किसी विज्ञापन के इतने बड़े नाम बने। उन्होंने कहा कि बाजारविदों को विज्ञापन के बजाय जनसंपर्क की सहायता लेनी चाहिए और अपने उत्पादों के बारे में अनुकूल लिखवाना चाहिए। विज्ञापनों की सफलता और उनकी क्षमता को लेकर ये अलग-अलग विचार विज्ञापन जगत के अलग-अलग दौर को दर्शाते हैं। पहला बदलाव सन 1950 के दशक में अमेरिका में आया और पूरी दुनिया में फैल गया। वह था उस वक्त उत्पाद का जिंसीकरण। अगर एक दर्जन निर्माता अलग-अलग टूथपेस्ट बनाते थे और उनमें इस्तेमाल होने वाली चीजें और उनकी गुणवत्ता एक सी थी तो आखिर जिंगल अलग-अलग रखने के अलावा विज्ञापन में किया क्या जा सकता था?
जब नई तकनीक कोई नया मीडिया विकल्प तैयार करती है तब भी विज्ञापन का पहिया एक बार घूमता है। सन 1970 के दशक में रंगीन प्रिंटिंग प्रेस सस्ती हो गईं और पत्रिकाओं की बाढ़ आ गई। इंडिया टुडे, बिजनेस इंडिया और स्टार डस्ट ने न केवल पाठकों बल्कि विज्ञापनदाताओं को भी लुभाया।
अगला बदलाव टेलीविजन के जरिये हमारे घरों में आया। केबल के आगमन से टीवी प्रसारण की बाधा दूर हुई। अब आप एक क्षेत्र विशेष या भाषा पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे। जी, टीवी18 और स्टार इस क्रांति के अगुआ बने। इन चैनलों पर भारतीय भाषाओं में 30 सेकंड के विज्ञापनों ने धूम मचा दी। हर बदलाव के वक्त पिछली पीढ़ी की विज्ञापन शैली को संघर्ष करना पड़ा।
आश्चर्य नहीं कि पहली बार जब वल्र्ड वाइड वेब का आगमन हुआ तो इंटरनेट के शुरुआती पांच सालों तक बैनर विज्ञापनों का ही बोलबाला रहा। बाद में जैसे-जैसे वेबसाइटों की तादाद बढ़ती गई और लोगों में पसंदीदा वेबसाइट की तलाश बढ़ती गई तो सर्च इंजन सामने आए। जिस तरह वाहनों की भीड़ भरी सड़क पर दोनों ओर विज्ञापन होर्डिंग होते हैं, वैसे ही सर्च इंजन ने खोज के विषय से जुड़े विज्ञापनों की भरमार करनी शुरू कर दी। कॉलेज शिक्षा से जुड़े विज्ञापनों के आसपास कॉलेज के विज्ञापन दर्शाना। उन्होंने यह तक कह दिया कि उनको भुगतान तभी किया जाए जब कोई विज्ञापन पर क्लिक करे। उसके बाद इंटरनेट विज्ञापनों में भी गतिशीलता आनी शुरू हुई और वे प्रदर्शन आधारित हो गए।
इन दिनों हम एक और बदलाव के बीच में हैं। इन दिनों हम सभी स्मार्ट फोन इस्तेमाल करते हैं और दुनिया भर में विज्ञापन जगत से जुड़े लोग ऐसे विज्ञापन बनाने की जुगत में हैं जो मोबाइल फोन पर सही रहें।
टेलीविजन पर आने वाले विज्ञापन मोबाइल पर सही नहीं हैं क्योंकि मोबाइल पर समूह के बजाय व्यक्ति को संबोधित करना होता है। वहां निजता का भी मामला है। साथ ही मार्केटिंग और विज्ञापन जगत में ये बातें भी सामने आ रही हैं कि ऐसे सर्च विज्ञापनों पर आने वाले क्लिक्स की तादाद में कमी देखने को मिल रही है।
शायद अब वक्त आ गया है कि हम सन 1950 के दशक के पुराने विपणन सिद्धांत पर एक बार पुन: नजर डालें। वह सिद्धांत विज्ञापनों की प्रक्रिया और उपभोक्ता जिन चरणों से होकर गुजरता है उनका ब्योरा है। सबसे पहली बात तो यह कि उसे आपके ब्रांड के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इसके बाद आप उसमें रुचि जगा पाने में सक्षम हों। 
इसके बाद आता है उसके मन में आपका उत्पाद रखने की आकांक्षा पैदा करना। अब आती है उसके द्वारा आपका उत्पाद खरीदने और उसे अपने मित्रों या परिजन को सुझाने की बारी। खोज आधारित विज्ञापनों के साथ समस्या यह है कि यह केवल उन लोगों तक पहुंच पाता है जो शुरुआती दौर यानी जागरूकता, रुचि और इच्छा के तीन चरणों को पार कर चुके होते हैं और अब खरीदने के लिए तैयार होते हैं। ऐसे में तलाश है ऐसे रचनात्मक विज्ञापनों की जो मोबाइल फोन के जरिये ग्राहकों को इन शुरुआती तीन चरणों से पार लाएं और खरीद के लिए तैयार करें। जो भी इस पहेली को हल करेगा, चाबी उसी के हाथ होगी। 
Keyword: Advertisements, विज्ञापन, Mobile,
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