बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकिंग कदाचार को बर्दाश्त करने की बुरी आदत
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बैंकिंग कदाचार को बर्दाश्त करने की बुरी आदत

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  February 27, 2018

हर कोई इस बात को लेकर अचरज में है कि अपने नियोक्ताओं की नजर में 'विदेशी मुद्रा विशेषज्ञ' माना जाने वाला गोकुलनाथ शेट्टïी महज उप प्रबंधक के पद से ही किस तरह सेवानिवृत्त हो गया? बैंकिंग पदानुक्रम में यह पद काफी निचले स्तर का है। उसके करियर की धीमी रफ्तार का प्रत्यक्ष कारण तो यह है कि उसने पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) के 36 साल लंबे अपने करियर में केवल एक पदोन्नति ही ली थी। कई लोगों को इस पर भी आश्चर्य है कि पीएनबी में हुई 11,400 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मुख्य आरोपियों में से एक शेट्टïी मुंबई की फोर्ट शाखा में एक ही दायित्व का सात साल तक कैसे निर्वहन करता रहा? यह भी पता चला है कि शेट्टïी को इस शाखा में तैनाती के सात वर्षों के दौरान कम-से-कम दो बार बाहर भेजने की योजना बनी लेकिन बैंकिंग प्रणाली के भीतर के ही किसी शख्स ने उसका स्थानांतरण रुकवा दिया।
हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कामकाज की शैली से परिचित लोगों के लिए यह कोई असामान्य बात नहीं है। सार्वजनिक बैंकों के कर्मचारी बड़ी संख्या में पदोन्नति ही नहीं लेते हैं ताकि उन्हें स्थानांतरित होकर गृहनगर से बाहर न जाना पड़े। पूर्वी भारत तो इस तरह की प्रवृत्ति के लिए खासा मशहूर है लेकिन देश के अन्य हिस्सों में भी यह आम है। बैंकों में ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें क्लर्क के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले कर्मचारी उसी पद पर रहते हुए सेवानिवृत्त भी हो गए। 
इसकी वजह यह है कि वे लोग पदोन्नति के लिए होने वाले सभी साक्षात्कारों से दूर रहते हैं। कुछ बैंकों ने इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए सख्ती बरतनी शुरू कर दी है और अपने कर्मचारियों को पदोन्नति के पहले के साक्षात्कारों में शामिल नहीं होने के बाद भी स्थानांतरित करने की चेतावनी दी है। लेकिन कई बैंकों में अब भी पुरानी परिपाटी जारी है और ऐसा बैंक के भीतर या बाहर के रसूखदार लोगों की मदद से ही होता है। 
अनेक सार्वजनिक बैंकों में एक विभाग से दूसरे विभाग में होने वाले स्थानांतरण भी रूटीन तरीके से रोक दिए जाते हैं। 
ऐसा दो वजह से होता है: पहला, बहुतेरे कर्मचारी अपने सुविधाजनक दायरे से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं और दूसरा, बैंक प्रबंधन वर्षों से विशेषज्ञता वाले काम कर रहे कर्मचारियों को खुद भी छोडऩा नहीं चाहता है क्योंकि आसानी से उनका विकल्प नहीं मिल पाता है। पीएनबी घोटाला दिखाता है कि बदमाश कर्मचारी आसानी से इस व्यवस्था का फायदा उठा सकते हैं और उसका दुरुपयोग कर सकते हैं। बैंकिंग प्रणाली के भीतर नियंत्रण एवं संतुलन या पुष्टिकरण की व्यवस्था नहीं होने से ही ऐसा होता है। तमाम सार्वजनिक बैंकों ने अब विशेषज्ञ उम्मीदवारों को भर्ती करना शुरू किया है लेकिन सुनियोजित करियर विकास नहीं होने और अपर्याप्त वेतन एवं अन्य लाभों की वजह से वे बीच में ही नौकरी छोड़ देते हैं।
सार्वजनिक बैंकों के लिए प्रतिभावान उम्मीदवारों को अपने साथ जोडऩा खासा मुश्किल होता है क्योंकि इन बैंकों के वेतन ढांचे से काफी छेड़छाड़ हुई है। सरकार और कर्मचारी संघों के दबाव के चलते बैंकों के निचले स्तर के कर्मचारियों का वेतन तो बढ़ गया है लेकिन वरिष्ठ पदों पर बैठे अधिकारियों का वेतन काफी हद तक गैर-प्रतिस्पद्र्धी ही है। अगर वरिष्ठ कैडर को हटा दें तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कर्मचारियों का औसत वेतन निजी क्षेत्र के बैंकों की तुलना में अधिक है।
सार्वजनिक बैंकों के साथ एक और समस्या उनकी निगरानी प्रणाली की गुणवत्ता को लेकर है। भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर के सी चक्रवर्ती ने 2013 में एक संगोष्ठी में बैंकिंग प्रणाली की खामियों को दुरुस्त करने के उपाय विस्तार से बताए थे। चक्रवर्ती की तरफ से उठाया गया मुख्य बिंदु यह था कि शीर्ष स्तर पर जवाबदेही का अभाव है। कुछ गिने-चुने हाई-प्रोफाइल मामलों में भले ही शीर्ष अधिकारियों पर कार्रवाई हुई हो, लेकिन आम तौर पर कार्रवाई की जद में निचले स्तर के कर्मचारी ही आते हैं। जब भी धोखाधड़ी का कोई मामला सामने आता है तो सबसे पहले निचले स्तर पर काम करने वाले बैंक कर्मचारियों पर ही कार्रवार्ई होती है।
बड़े स्तर पर की गई धोखाधड़ी का विश्लेषण करने पर कुछ रोचक नतीजे सामने आते हैं। बैंक संदिग्ध खातों को धोखाधड़ी में शामिल बताने में काफी देर कर देते हैं, जांच में एक साथ कई अधिकारियों को शामिल कर दिया जाता है और अंत में कुछ कनिष्ठ अधिकारियों को इन गड़बडिय़ों के लिए जिम्मेदार बता दिया जाता है। रिजर्व बैंक के विश्लेषण के मुताबिक बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी वाले 230 मामलों में जिन 719 बैंक अधिकारियों को दोषी बताया गया उनमें से 426 अधिकारी वरिष्ठ प्रबंधक, 196 मुख्य प्रबंधक एवं सहायक महाप्रबंधक और 94 अधिकारी उप महाप्रबंधक, महाप्रबंधक एवं मुख्य महाप्रबंधक पदों पर तैनात थे। धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराए गए केवल तीन अधिकारी ही बैंकों के शीर्ष प्रबंधन एवं निदेशक मंडल से ताल्लुक रखते थे।
दरअसल अधिकतर बैंकर सतर्कता विभाग में स्थानांतरित किए जाने से नाखुश हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें किनारे किया जा रहा है और मुख्य बैंकिंग कामकाज से दूर किया जा रहा है। उनके सहकर्मी भी उन्हें गैरजरूरी सवाल पूछकर समस्याएं खड़ी करने वाले त्वरित फैसलों की राह में रोड़े अटकाने वाले शख्स के तौर पर ही देखते हैं। हालांकि ऐसा होना काफी दुर्भाग्यपूर्ण है और बैंकिंग गतिविधियों में कदाचार को बर्दाश्त नहीं किए जाने के बारे में सख्त संदेश देने में समूचे बैंकिंग क्षेत्र के शीर्ष प्रबंधन की नाकामी को दर्शाता है।
ऐसा लगता है कि चक्रवर्ती के उस भाषण को भी बाकी दूसरे दस्तावेजों की तरह बहुत लोगों ने पढ़ा और सुना लेकिन बहुत कम लोगों ने ही उसका अनुसरण किया है।
Keyword: PNB, Gokulnath Shetty, Bank,
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