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राजस्व संतुलन और व्यय संदर्भ की अनदेखी न हो

रथिन रॉय /  February 26, 2018

वित्त वर्ष 2018 में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में विचलन बजट के कमजोर निर्माण की वजह से नहीं बल्कि कुछ ऐसे कारकों की वजह से है जो वित्त मंत्रालय के नियंत्रण से बाहर हैं। बता रहे हैं रथिन रॉय
मैं रोलां बार्थ की इस कहावत से अवगत हूं कि 'पाठक का जन्म ही लेखक की मृत्यु है।' बजट को लेकर मैंने जो भी लिखा उसकी कई लोगों ने व्याख्या की। इनमें कई शक्तिशाली निर्णय प्रक्रिया में शामिल लोग भी हैं। इसलिए सबसे पहले मैं अपने विचारों को ही संक्षेप में प्रस्तुत कर दूं। यह लोकलुभावन बजट नहीं था। बल्कि बजट में वृहद राजकोषीय विवेक को कायम रखने में आंशिक सफलता की झलक देखने को मिलती है। वित्त वर्ष 2018 में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में जो चूक नजर आती है उसकी वजह बजट निर्माण या उसके डिजाइन में कोई कमी नहीं है। इसके लिए कई ऐसे कारक जिम्मेदार हैं जो वित्त मंत्रालय के नियंत्रण से ही बाहर हैं। 
मैंने विशिष्टï कर प्रस्तावों की वांछनीयता अथवा उनके अवांछित होने को लेकर कोई नजरिया नहीं दिया है। मैं यह उम्मीद करता हूं कि अगले कुछ सालों के दौरान कर प्राप्तियों में कुछ बढ़ोतरी देखने को मिलेगी लेकिन मेरा यह भी मानना है कि भविष्य के कर राजस्व को लेकर आश्वस्त होने से बचने की आवश्यकता है। इसे भविष्य में बहाने के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। मैं गैर कर राजस्व के संग्रह में आ रही कमी को लेकर भी चिंतित हूं। इसके अलावा मौजूदा व्यय में इजाफा भी मेरी चिंता का विषय है। यह बढ़ोतरी लोकलुभावन कदमों के चलते नहीं बल्कि सरकार की व्यय प्रतिबद्घताओं की वजह से है। मैं खासतौर पर आवर्ती व्यय के ऋण को लेकर चिंतित हूं जो इस प्रशासन के कार्यकाल में तेजी से कम हुआ था लेकिन अब वह दोबारा 2013-14 के स्तर पर पहुंच गया है। 
आवर्ती व्यय से मेरा तात्पर्य ऐसे व्यय से है जिसके बारे में सरकार का मानना होता है कि वह साल दर साल सामने आएगा। इसमें वेतन भत्ते, मरम्मत और रखरखाव, कर्ज पर ब्याज, पेंशन, सब्सिडी और हस्तांतरण आदि का व्यय शामिल होता है। तकनीकी ढंग से देखें तो एक जवाबदेह राजकोषीय नीति में इसका ख्याल रखना पड़ता है लेकिन बीते तीन दशक से भारत इस मोर्चे पर काफी पीछे है। 
सहज बुद्घि तो यही कहती है कि मौजूदा राजस्व की मदद से ही आवर्ती व्यय का भुगतान किया जाना चाहिए। अगर मैं अपने घरेलू कर्मचारियों को वेतन देने के लिए या अपनी रोजमर्रा की जरूरत का सामान खरीदने के लिए अथवा किसी मित्र को धन देने के लिए या बकाया ऋण की ईएमआई चुकाने के लिए नया उधार लूं तो मुझे मूर्ख कहा जाएगा। ऋण निवेश करने के लिए लिया जाना चाहिए और जरूरत हो तो एकबारगी व्यय के लिए भी। बार-बार खर्च करने के लिए ऋण नहीं लेना चाहिए। इस वर्ष आवर्ती व्यय के लिए राजस्व घाटे का आकलन नाटकीय ढंग से बढ़ा और कुल ऋण के 73.6 फीसदी के बराबर आंका गया। 
जब सरकारी व्यय की बारी आती है तो लोग इस सहज बुद्घि का इस्तेमाल क्यों नहीं करते? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे व्यय के निष्कर्ष और लक्ष्य की आवृत्ति को उद्देश्य समझने की भूल कर बैठते हैं। यही वजह है कि कई लोग कहते हैं कि सरकारी राजस्व व्यय से शिक्षकों का वेतन चुकाया जाता है और ये शिक्षक ही मानव संसाधन तैयार करते हैं। अच्छी बात है लेकिन चूंकि एक शिक्षक ऐसे छात्र तैयार करता है जो आगे चलकर सक्षम मानव संसाधन बनते हैं तो क्या स्कूली शिक्षा का साल पूरा होते ही उनको निकाल दिया जाना चाहिए? ऐसा क्यों नहीं किया जाता? क्योंकि शिक्षक से उम्मीद की जाती है कि वह अगले वर्ष फिर नए सिरे से छात्रों को तैयार करेगा। यह सिलसिला साल दर साल चलता रहेगा। यानी हमें उनका वेतन आवर्ती आधार पर देते रहना होगा। रक्तचाप की दवा एक लंबा और स्वस्थ जीवन जीने के लिए आवश्यक है लेकिन चूंकि मरीज को इसे बार-बार खरीदना होता है इसलिए अगर वह उसे खरीदने के लिए कर्ज लेगा तो दिक्कत में आ जाएगा। व्यय का लक्ष्य यह देखना भी है कि क्या उन्हीं चीजों को बार-बार खरीदने की आवश्यकता पडऩे वाली है। 
कुछ लोग दलील देते हैं कि केंद्र सरकार राज्यों को अनुदान देती है। उसका इस्तेमाल वे निवेश के लिए करते हैं। इसलिए इसे राजस्व व्यय नहीं समझा जाना चाहिए। यह कमोबेश इसी तरह है जैसे कि अगर मैं हर वर्ष धनराशि दान करके एक स्कूल की इमारत बनवाऊं तो मैं उस अनुदान के लिए पैसे उधार ले सकता हूं। एक बार फिर कहूंगा कि अनुदान का उद्देश्य मायने नहीं रखता। बल्कि उसकी आवृत्ति और परिसंपत्ति स्वामित्व का हस्तांतरण मायने रखता है। उसको मौजूदा राजस्व से वित्तीय मदद मुहैया कराई जानी चाहिए। लब्बोलुआब यह है कि उद्देश्य कितना भी नेक क्यों नहीं हो, उसके लिए उधार लेना एक खराब परंपरा है। 
हमारा संविधान भी इस भेद की महत्ता को रेखांकित करता है। अनुच्छेद 112 के मुताबिक सरकार को राजस्व खाते के व्यय को अन्य व्यय से अलग करना होता है। इसकी बदौलत राजस्व घाटे को राजकोषीय घाटे से विशिष्टï तौर पर अलग किया गया। यह सरकार के कुल राजस्व और कुल व्यय के अंतर के बराबर होता है। संविधान द्वारा यह व्यवस्था किए जाने की वजह यह है कि सरकार की आय यानी राजस्व के जरिये आवर्ती प्रकृति के व्यय का भुगतान किया जाना चाहिए, भले ही उनका उद्देश्य कितना भी नेक क्यों न हो। इस प्रकार राजस्व व्यय शब्द अस्तित्व में आया। आज हम यह सुनिश्चित करने में सफल रहे हैं कि राज्य समेकित रूप से भी आवर्ती व्यय की भरपाई के लिए कर्ज न लें। परंतु केंद्र सरकार की उधारी का 70 फीसदी आवर्ती व्यय चुकाने में जाता है। 
जिन देशों ने उक्त कहावत की अनदेखी की उनको आगे चलकर वित्तीय संकट का सामना करना ही पड़ा क्योंकि आवर्ती व्यय के लिए ली जाने वाली उधारी के कारण ब्याज की लागत में काफी इजाफा होता है और राजस्व आवर्ती व्यय को निपटा नहीं पाता। इस तरह सरकार की देनदारी में चूक होती है, बिल भुगतान में देरी होती है और मेहनताने चुकाने में भी। कुलमिलाकर यह ऋण देनदारी में चूक का मामला बन जाता है। फ्रांसीसी क्रांति का बीज ऐसे ही पतन में निहित था। मुगल साम्राज्य का खात्मा भी कमोबेश ऐसे ही हालात में हुआ। 
इसकी तात्कालिक प्रासंगिकता भी है। वित्त विधेयक 2018 में उल्लिखित एफआरबीएम के प्रावधानों में राजस्व व्यय और राजस्व संतुलन के सभी संदर्भ हटा दिए गए हैं। इस प्रकार एफआरबीएम समिति की अनुशंसा को खारिज कर दिया गया। मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए। 
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी के निदेशक और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
 
Keyword: Fiscal deficit, Budget, finance ministry,
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