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बेतुका बदलाव

संपादकीय /  February 26, 2018

केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने घोषणा की है कि वह राष्टï्रीय सांख्यिकी से जुड़े अधिकांश आकलन के आधार वर्ष में बदलाव का प्रस्ताव रखने जा रहा है। फिलहाल 2011-12 को आधार वर्ष माना जाता है। मंत्रालय की योजना सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के लिए वर्ष 2017-18 को नया आधार वर्ष बनाने की है। इन पर अमल वर्ष 2018-19 में किया जाएगा जब नए रोजगार सर्वेक्षण और घरेलू व्यय सर्वेक्षण प्रस्तुत किए जा चुके होंगे। ये सभी प्रमुख वृहद आर्थिक संकेतक हैं जिनका इस्तेमाल राष्टï्रीय नीति निर्माण में किया जाता है। राजकोषीय और मौद्रिक नीति, दोनों जीडीपी में बदलाव से संबद्घ हैं। यह अन्य तमाम चरों के लिए संदर्भ का काम करता है। उदाहरण के लिए राजस्व संग्रह और तमाम तरह के घाटे। 
उधर, आईआईपी फैक्टरी और खनन उत्पादन की मात्रा बताता है जबकि सीपीआई वह आधिकारिक मानक है जिसका इस्तेमाल भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति के आकलन में करता है। आधार वर्ष में समय-समय पर बदलाव किया जाता है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है और इसकी मदद से अहम वृहद आर्थिक मानकों को सुसंगत किया जाता है और जो समय के साथ देश की अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलाव को समुचित ढंग से परिलक्षित करते हैं। इसमें दो राय नहीं कि ऐसे संशोधन कठिन होते हैं लेकिन इनके साथ पिछले आकलन को भी हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। बिना पुरानी शृंखला के आंकड़ों के बदलावों के बारे में अहम और सार्थक आकलन करना नामुमकिन तो नहीं लेकिन मुश्किल अवश्य हो जाएगा। ऐसे बदलाव अगर जल्दी जल्दी किए जाएंगे तो वे काफी भ्रम पैदा कर सकते हैं और उन हालात में आर्थिक रुझानों का आकलन और नीतिगत प्रभाव को समझ पाना मुश्किल हो जाएगा। कुछ हद तक अभी भी ऐसा ही हो रहा है। जीडीपी के आकलन के आधार वर्ष में पिछला बदलाव 2014-15 में किया गया था। तब इसे 2004-05 से बदलकर 2011-12 किया गया था। हकीकत में जीडीपी के आकलन के तरीके में भी बड़ा बदलाव किया गया था और डेटा नमूने का विस्तार करते हुए इसमें और कंपनियों को शामिल किया गया था। 
आईआईपी का हाल ही आधार वर्ष 2017 में बदला गया और उसे भी 2004-05 से 2011-12 किया गया। भारांक में संशोधन भी इसमें शामिल था। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) में 2015 में बदलाव किया गया था और इसे भी 2004-05 से बदलकर 2011-12 किया गया था। जबकि एक नया एकीकृत सीपीआई प्रस्तुत किया गया था ताकि केंद्रीय बैंक अपना ध्यान मुद्रास्फीति को लक्षित करने पर से हटा सके। 
बहरहाल, इन नए आधार वर्षों की पिछली शृंखला अब तक जारी नहीं की गई है। इसलिए आंकड़ों की विश्वसनीयता के बारे में पुख्ता कुछ नहीं कहा जा सकता है और बीते वर्षों के साथ इसकी सार्थक तुलना भी नहीं की जा सकती। इसे लेकर आर्थिक शोधकर्ताओं ने शिकायतें भी की हैं। जो बात मंत्रालय के प्रस्ताव को और अधिक विवादास्पद बनाती है वह है 2017-18 को नया आधार वर्ष बनाना। संशोधन के पारंपरिक रुझान को देखें तो नया आधार वर्ष 2014-15 होना चाहिए था। वर्ष 2017-18 का चयन समझ पाना मुश्किल है क्योंकि इससे संबंधित आंकड़ों को अब तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। इतना ही नहीं वर्ष 2017-18 राजकोषीय मोर्चे पर एक असामान्य वर्ष था क्योंकि नोटबंदी और नए वस्तु एवं सेवा कर का असर उस पर रहा। नई शृंखला को उस पर आधारित करने से संभव है जो रुझान आएं वे हकीकत से परे हों। नए बदलाव करने के बजाय मंत्रालय को विश्वसनीयता बहाल करने पर जोर देना चाहिए और मौजूदा आंकड़ों को तुलना योग्य बनाना चाहिए। 
Keyword: CSO, Base year, GDP, IIP,
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