बिजनेस स्टैंडर्ड - देश में कारोबारी बंधन की वापसी का दिखने लगा दौर
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देश में कारोबारी बंधन की वापसी का दिखने लगा दौर

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  February 25, 2018

एक समय था, जब भारत सरकार कुछ प्रमुख उद्योगों की कंपनियों को यह बताती थी कि कैसे बनाएं, कहां बेचें और किस कीमत पर बेचें। अब वे दिन बुरी यादों के कोहरे में दफन हो गए हैं। लेकिन अगर उद्यमों को डर है कि कंपनियों से संबंधित अहम फैसलों में फिर से नौकरशाही का दखल बढ़ रहा है तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है।  पिछले आठ महीनों के तीन फैसले इस धारणा को मजबूत करते हैं। ये फैसले हैं- वस्तुु एवं सेवा कर के तहत मुनाफारोधी नियम, आयकर विभाग का यह आदेश कि ऑनलाइन खुदरा विक्रेता की छूट एवं विपणन खर्च को पूंजीगत व्यय माना जाए और बजट की यह घोषणा कि शेयर बाजार का नियामक बड़ी कंपनियों के लिए अपनी उधारी जरूरतों का एक हिस्सा बॉन्ड बाजार से जुटाने की खातिर नियम बनाएगा। ये सभी कारोबार के आधारभूत सिद्धांतों के बारे में गलतफहमी फैलाते हैं। इतना तो अनुमान लगाया जा सकता है कि पहले दो फैसलों से भारत की कानून व्यवस्था पर और दबाव बढ़ेगा, जिस पर पहले ही मुकदमों का बड़ा दबाव है। 

 
जीएसटी के तहत मुनाफारोधी नियमों के पक्ष में यह आधिकारिक तर्क दिया गया है कि ये नियम यह सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं ताकि कंपनियां जीएसटी की कम दरों से होने वाले लाभ को उपभोक्ताओं तक पहुंचाएं। इस प्रक्रिया को देखने के लिए नवंबर में एक वरिष्ठ अधिकारी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय राष्ट्रीय मुनाफारोधी प्राधिकरण (एनएपीए) का गठन किया गया था। उसका कार्यकाल दो साल का है।  मुनाफारोधी बंदोबस्त का मकसद सरकार के उन दावों की विश्वसनीयता बढ़ाना है कि बहुत ज्यादा जटिल कर सुधार यानी जीएसटी से सभी चीजों के दाम कम होंगे। आम उपभोक्ता के नजरिये से यह तर्क लुभावना है, लेकिन इसमें एक सैद्धांतिक समस्या है। किसी भी परिवर्तनशील बाजार में कीमतें मूल्य शृंखला के खुदरा या बिचौलिया स्तर पर केवल लागत से ही तय नहीं होती हैं। यह कई जटिल फैसलों पर आधारित होती हैं। ये फैसले आपूर्तिकर्ताओं के साथ सौदेबाजी कर लंबी अवधि की कीमतें तय करने से लेकर ब्रांड वैल्यू एवं छवि और प्रतिस्पर्धी दबाव तक होते हैं। 
 
यानी बाजार के समीकरणों से कीमतें तय होती हैं। जो कंपनियां दरें कम होने पर कीमतें कम नहीं करने का फैसला करती हैं तो वे यह काम अपने जोखिम पर करती हैं और कारोबार से जुड़ा कोई भी व्यक्ति इन जोखिमों को समझता है। वे कर की कम दरों से होने वाले फायदे को आगे निवेश के लिए बचाने का फैसला कर सकते हैं या अपने सामान या सेवा की प्रीमियम छवि बनाए रखना चाहते हैं। ये सभी मुश्किल कारोबारी फैसले हैं, इसलिए केवल मुनाफा कमाने के लिए नहीं लिए जाते हैं।  एनएपीए औद्योगिक लागत एवं कीमत ब्यूरो की याद दिलाता है। यह ब्यूरो उस दौर में बहुत शक्तिशाली था, जब लाइसेंसी प्रक्रिया की वजह से बाजार में प्रवेश प्रतिबंधित था। इस वजह से उद्योगों के सांठगांठ करने का जोखिम भी अधिक था। विडंबना यह थी कि सीमेंट से लेकर टायर और ट्रैक्टर से लेकर खाद्य तेल तक के उत्पादक नियमित रूप से सलाह-सलाह-मशविरा करने के बाद कीमतें बढ़ाते थे। 
 
मानक कारोबारी पद्धति में यही अविश्वास आयकर विभाग के फ्लिपकार्ट को दिए गए आदेश में नजर आता है। देश की सबसे बड़ी घरेलू ऑनलाइन खुदरा विक्रेता कंपनी फ्लिपकार्ट को जारी इस आदेश पर अपील न्यायाधिकरण ने बरकरार रखा है। इसमें कंपनी से कहा गया है कि वह विपणन और छूट पर होने वाले खर्च को राजस्व खर्च के बजाय पूंजी खर्च माने। यानी अब आगे छूट पर भी कर लगेगा। आयकर विभाग ने तर्क दिया है कि छूट का इस्तेमाल कंपनी के लिए भारी अमूर्त संपत्तियां बनाने के लिए किया जा रहा है और इसलिए यह पूंजीगत व्यय है।  इस आदेश के सैद्धांतिक बेतुकेपन के लिए कुछ कहने की जरूरत नहीं है, मगर एक कर सलाहकार के तंज का जिक्र करना जरूरी है। इस सलाहकार ने कहा है, 'ब्रांड एक ऐसी चीज है, जो आप बाजार जाकर नहीं खरीद सकते। आपको यह नहीं पता होता है कि किसी ब्रांड को बनाने में कितना पैसा खर्च होगा।' 
 
छूट इस नए और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा वाले कारोबार की जीवन रेखा है और आयकर विभाग का यह आदेश स्टार्ट-अप इंडिया को असफल बना सकता है, जो देश में उद्यमिता संस्कृति विकसित करने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम है। इससे यह असहज सवाल पैदा होता है कि ऑफलाइन खुदरा कारोबार और दूरसंचार जैसे अन्य उद्योगों में बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दी जाने वाली छूटों को लेकर कर अधिकारी क्या रुख अपनाएंगे।  ये दो उदाहरण लाइसेंस राज की तरफ झुकाव के संकेत हैं, जो हर सरकार को परेशान करता है और एक दुष्चक्र पैदा करता है। राजनेता और नौकरशाहों ने अभी अत्यधिक हस्तक्षेप और तर्कसंगत नियमन का अंतर नहीं समझा है। कुछ ही लोग मामूली हस्तक्षेप और अनुचित कारोबारी गतिविधियों के प्रसार के बीच के संबंध को समझते हैं।
 
एक अन्य उदाहरण वह फैसला है, जिसमें कहा गया है कि बाजार नियामक सेबी बड़ी कंपनियों (अपरिभाषित) के लिए उनके बाजार से 25  फीसदी उधारी लेने के नियम बनाएगा। यह फैसला व्यावहारिक नहीं है। सेबी प्रमुख अजय त्यागी ने सितंबर तक ये नियम जारी करने का वादा किया है। यह आदेश देना कि कोई कंपनी कैसे अपनी पूंजी जुटाएगी, जो शायद ही इस तरीके से कहा जा सकता है। लेकिन दूसरी तरफ भारतीय सरकारें मुश्किल से ही अपने एजेंडा में ऐसे अस्पष्ट तर्क को हस्तक्षेप करने की इजाजत देती हैं। यह एक ऐसा कारक है, जिसे विश्व बैंक का कोई भी सूचकांक शामिल नहीं कर सकता, भले ही वह अपने आकलनों में कोई भी तरीका अपनाए। 
Keyword: company, industry, gst,,
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