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भारतीय राजनीति में थप्पड़ की नजीर

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  February 25, 2018

इसमें किसी को संदेह नहीं होगा कि आम आदमी पार्टी (आप) आक्रामक तेवर वाले लोगों से बनी है। इसके आलोचकों समेत तमाम लोग मानेंगे कि दिल्ली में सरकार बनाने और नरेंद्र  मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी को विधानसभा चुनाव में शर्मनाक रूप से पराजित करते हुए 70 में से 67 सीटें जीतने के बाद केंद्र ने उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दिल्ली जैसे राज्य में सीमित शक्तियों के साथ भी उसे काम नहीं करने दिया जा रहा है। इस बात में भी बहुत संदेह नहीं है कि दिल्ली के मृदुभाषी मुख्य सचिव और सन 1986 बैच के आईएएस अंशु प्रकाश के साथ पिछले सोमवार की देर रात मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास पर हाथापाई की गई।

 
निर्वाचित सरकारों और नौकरशाहों में अक्सर टकराव होता है। मुख्यमंत्रियों द्वारा आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को नीचा दिखाया जाना नया नहीं है। कई लोगों को तो इसमें परपीड़ा का आनंद भी मिलता है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं मायावती को स्थानांतरण करने के लिए ख्याति हासिल थी। उन्हें भी अपनी अधिकार संपन्नता पर गर्व था। सन 2005 में मेरे साथ 'वॉक द टॉक '  साक्षात्कार में उन्होंने कहा भी था कि जब वह पहली बार अपने गुरु कांशीराम से मिलीं (हम यह रिकॉर्डिंग हुमायूं रोड स्थित मायावती के घर पर कर रहे थे जहां कांशीराम कोमा में थे) तब वह आईएएस की तैयारी कर रही थीं। कांशीराम ने उनसे कहा कि वह यह सब छोड़कर राजनीति में शामिल हो जाएं। उन्होंने कहा था, 'तुम आईएएस अधिकारी बनना चाहती हो। मैं तुम्हें ऐसा बनाऊंगा कि आईएएस तुम्हारे आगे-पीछे भागेंगे।' कांशीराम ने अपना वादा निभाया और मायावती ने भी अधिकारियों को खूब आगे पीछे भगाया। बदायूं में सन 2007 की उनकी चुनावी बैठकों में से एक में वह जनता से कह रही थीं, 'नौकरशाही मेरे नाम से थर-थर कांपती है।'
 
वह उनका इतना ज्यादा तबादला करती थीं कि कई ने तो अपने परिवार को नई पोस्टिंग पर साथ ले जाना भी बंद कर दिया था। वे नई पोस्टिंग वाले शहर के सर्किट हाउस में जाकर रहने लगते। बच्चों की पढ़ाई लिखाई और परिवार पुरानी जगह पर बने रहते क्योंकि यह पता नहीं होता था कि कब उनका दोबारा तबादला कर दिया जाए। कई अधिकारी तो केंद्र में पदस्थापना लेकर वहां से हट गए। हरियाणा का इतिहास भी काफी हद तक ऐसा ही रहा है। खासतौर पर बंसी लाल और ओम प्रकाश चौटाला के कार्यकाल में अधिकारियों के तबादले और भ्रष्टाचार के मामले अक्सर सामने आते थे। पुरानी सरकारों के पसंदीदा अफसरों को हाशिये पर डाल दिया जाता।
 
ऐसे तमाम उदाहरणों के बावजूद बीते चार दशक के पत्रकारीय जीवन में मैंने ऐसा दूसरा मामला नहीं देखा जहां किसी वरिष्ठï सरकारी अधिकारी को पीटा गया हो। खासतौर पर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी को मुख्यमंत्री के आवास पर पीटे जाने की घटना। मैं पुराने दौर के बिहार की उन घटनाओं को इनमें शामिल नहीं करूंगा जहां माफिया राजनेताओं ने हत्याएं तक कराईं। वह एक अलग श्रेणी है।  अब तक आए चिकित्सकीय और वीडियो प्रमाण तथा अंशु प्रकाश की तीन दशक की प्रतिष्ठïा तो यही बताते हैं कि उन पर हमला हुआ। यानी उस बात पर तो बहस हो ही नहीं सकती। अब तो मुख्यमंत्री के सहयोगी वीके जैन ने भी स्पष्टï कह दिया है कि प्रकाश के साथ दुव्र्यवहार हुआ। 
 
जैसे-जैसे दिन बीते हैं, आप के प्रवक्ता और अन्य नेताओं ने अपने बयान बदले हैं। पहले उन्होंने इससे साफ इनकार किया था लेकिन अब उनका रुख बदल गया है। कहा जा रहा है, 'महज दो झापड़ मारने के आरोप की जांच के लिए आप मुख्यमंत्री के घर पर पुलिस भेजेंगे जबकि न्यायमूर्ति लोया की 'हत्या' के मामले में अमित शाह से आप कुछ नहीं पूछ सकते?' मैं इसे संवैधानिक गुस्ताखी की संज्ञा दूंगा। पश्चाताप की बात तो भूल ही जाइए, एक ऐसे व्यक्ति के साथ शारीरिक हिंसा पर सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं देखने को मिला जो निरंतर आपकी सेवा में है। शुक्रवार को आप के उत्तम नगर के विधायक नरेश बाल्यान ने कथित तौर पर कहा कि ऐसे नौकरशाह अपना काम नहीं करते और वे ऐसे ही व्यवहार के लायक हैं। 
 
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आप और केंद्र में नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार पिछले तीन सालों से एक दूसरे से जंग में उलझी हुई हैं। केंद्र सरकार अलग-अलग तरीके से उस पर हमलावर रही है। उप राज्यपाल राज्य सरकार के निर्णयों को खारिज करते रहे हैं। चुनी हुई सरकार द्वारा की गई तैनाती या तो बदल दी गई या उसे नकार दिया गया। सीबीआई ने मुख्यमंत्री के प्रमुख आईएएस अधिकारी राजेंद्र कुमार को भ्रष्टïाचार के मामले में आरोपित करते हुए छापेमारी की जबकि ऐसा करना बेतुका था। भ्रष्टïाचार विरोधी शाखा नामक विभाग जिस पर आप सरकार दम भरती थी वह उसे छीन लिया गया। ताजातरीन मामला है निर्वाचन आयोग द्वारा अत्यधिक सख्ती बरतते हुए आप के 20 विधायाकों की सदस्यता रद्द कर दी गई उन पर दो पद धारण करने का आरोप था। गजब की तेजी दिखाते हुए इस मामले में उसी सप्ताहांत राष्टï्रपति की मंजूरी भी मिल गई। 
 
यह कोई छोटी सूची नहीं है। इससे यही पता चलता है कि केंद्र सरकार लगातार नौकरशाही और प्रक्रियाओं की मदद से आप पर हमलावर है। आप ने इसका प्रतिरोध करते हुए जुबानी तीर छोड़े हैं। उनमें सबसे अधिक कुख्यात स्वयं केजरीवाल का वह कथन है जिसमें उन्होंने मोदी को झूठा और मनोरोगी कहा था। परंतु हाथापाई का ताजा मामला तो बहुत अप्रत्याशित है।  हम अगर किसी चीज को अप्रत्याशित कहते हैं तो वह अपने आप में एक नजीर भी बन रही होती है। क्या नौकरशाहों के खिलाफ शारीरिक हिंसा नया मानक है? क्या हमें आप को गली छाप लड़ाइयों में लगे लोगों की पार्टी मानना चाहिए। लेकिन अगर उन्होंने ऐसी राजनैतिक हिंसा को वैधता प्रदान की तो अन्य जगहों पर मौजूद तमाम राजनेता इससे बहुत गलत सबक लेंगे। 
 
ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए जहां एक ईमानदार अधिकारी किसी मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री के ऐसे आदेश को मानने से इनकार कर देता है जो उसे गलत प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में क्या उसे मंत्री के आवास पर ही मारा पीटा जाएगा? एक दलील जो हमें अक्सर सुनने को मिलती है वह यह है कि मुख्य सचिव या नौकरशाहों को ऐसे 2.50 लाख लोगों का सामना नहीं करना पड़ता जिन्हें राशन नहीं मिला हो। क्या तब राजनेता भीड़ को उनके दफ्तरों पर छोड़ देंगे? क्या वरिष्ठï अधिकारियों को अब निर्वाचित नेताओं के घर का रुख करते हुए पुलिस संरक्षण लेना पड़ेगा?
 
राजेनताओं और नौकरशाही का रिश्ता बहुत नाजुक होता है। अक्सर प्रक्रियागत मसलों पर उनके बीच झगड़े हो जाते हैं। ये झगड़े सैद्घांतिक भी होते हैं और व्यक्तिगत भी। अच्छे नेता जानते हैं कि इन मसलों से कैसे निपटना है। भले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री जैसा सीमित अधिकारों वाला क्यों न हो लेकिन किसी राज्य का मुखिया तो नेता ही होता है। इन मतांतरों को खत्म करने का काम उनका ही है ताकि चीजें गलत रूप न लें। अगर जरूरत पड़े तो मसले को उच्च संवैधानिक प्राधिकार तक ले जाना चाहिए। अगर यह भी न हो सके तब जाकर सार्वजनिक विरोध या मीडिया में विरोध जताने का काम करना चाहिए। आप इस मामले में बहुत अच्छी है। जाहिर है मुख्य सचिव पर हाथ उठाना कोई गर्व का विषय तो है नहीं। 
 
सन 2014 में आई मेरी किताब एंटीसिपेटिंग इंडिया (हार्पर कॉलिंस) में मैंने कहा था कि नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल की तिकड़ी हमारी राजनीति में ऐसी शानदार तिकड़ी होगी कि पत्रकारों के पास रोचक अवसरों की कमी न रहेगी। मैंने यह उम्मीद भी जताई थी कि ये तीनों आगे चलकर बदलेंगे। मोदी में सदाशयता आएगी, राहुल का आत्मसंशय और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति कम होगी और केजरीवाल सत्ता प्रतिष्ठïान को लेकर शांत होंगे। बीता सप्ताह बताता है कि अपनी तीसरी उम्मीद में मैं पूरी तरह गलत था।
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