बिजनेस स्टैंडर्ड - भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की समस्या और हल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, May 27, 2018 08:54 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की समस्या और हल

देवाशिष बसु /  February 22, 2018

जिस समय पीएनबी घोटाला हो रहा था, आरबीआई क्या कर रहा था? बैंक का शीर्ष प्रबंधन उस वक्त क्या कर रहा था? अंकेक्षक उस वक्त क्या कर रहे थे? ऐसे कई सवाल उठा रहे हैं देवाशिष बसु

 
एक और बैंक घोटाला सामने आया है जिससे समूची जनता में निराशा व्याप्त है। इस बार भी नाम एक सरकारी बैंक- पंजाब नैशनल बैंक का ही आया है।  आभूषण कारोबारी नीरव मोदी और उनके मामा मेहुल चोकसी (चर्चित संस्थागत विदेशी निवेशकों में से एक) ने कथित तौर पर बैंक को 11,000 करोड़ रुपये का चूना लगाया और अमेरिका भाग गए। पूरा देश इनके दुस्साहस और बैंकों की मूर्खता पर हैरान है।  इसके ठीक पहले भारतीय स्टेट बैंक ने भी अपना मुनाफा 36 फीसदी बढ़ाकर दिखाने और 23,239 करोड़ रुपये अथवा 21 फीसदी के फंसे हुए कर्ज की बात स्वीकार की थी। ऐसे घोटालों और व्यवस्था की इस नाकामी पर एक सहज नाराजगी भरी प्रतिक्रिया यह होती है कि इसके लिए कौन उत्तरदायी है। 
 
भारतीय रिजर्व बैंक क्या कर रहा था? बैंक का शीर्ष प्रबंधन क्या कर रहा था? बैंक की आंतरिक सुरक्षा कैसी थी और अंकेक्षक क्या कर रहे थे? आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर और पीएनबी के पूर्व चेयरमैन के सी चक्रवर्ती कहते हैं कि बैंक के तंत्र में खामियां थीं जिन्हें ठीक करना चाहिए। ये तमाम उपाय जवाबदेही और जिम्मेदारी के इर्दगिर्द ही घूमते हैं। इसके लिए स्वामित्व और बैंकों का नियंत्रण बदलने की आवश्यकता नहीं है।  सरकारी बैंक अपने स्वामित्व और नियंत्रण के तौर तरीकों के कारण निरंतर संकट में हैं। उन्हें दुरुस्त करने की बात तब से बार-बार दोहराई जा रही है जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। मैं तीन साल में अपने स्तंभ के जरिये कई बार कह चुका हूं कि उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। दिसंबर 2014 में मैंने लिखा था, 'मुझे आशंका है कि वह वित्तीय क्षेत्र के सुधार में बहुत प्रगति नहीं कर पाएंगे। सरकारी बैंकों को 2.4 लाख करोड़ रुपये की पूंजी 2018 तक चाहिए ताकि वे बेसल 3 मानकों का पालन कर सकें। फंसे हुए कर्ज वाले 30 शीर्ष खातों में 87,368 करोड़ रुपये की राशि है। यानी सरकारी बैंकों के कुल एनपीए का 35.9 फीसदी। 
 
इन आंकड़ों के अलावा सरकारी स्वामित्व के कारण भ्रष्टाचार, राजनैतिक हस्तक्षेप, विकृत पूंजीवाद, नियामकीय विफलता और बार-बार पूंजीकरण देखने को मिल रहा है। अगर ये सवाल नहीं पूछे जाएंगे यथास्थिति बनी रहेगी और भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकारी बैंकिंग तंत्र का लडख़ड़ाना जारी रहेगा।' एकदम यही हुआ। नाकाम ज्ञान संगमों के अलावा मोदी सरकार ने इंद्रधनुष योजना की शुरुआत की और बैंक्स बोर्ड ब्यूरो की बात की। इसका काम था बैंकों में शीर्ष नियुक्तियां करना और फंसे हुए कर्ज की समीक्षा करना। 
 
अगस्त 2015 में मैंने इस बेकार की छेड़छाड़ के बारे में काफी कुछ लिखा था। दुख की बात है कि यह भी सही साबित हुआ। सरकार आखिर कहां चूक कर रही है? इसका जवाब दो अलग-अलग रुखों में निहित है जिनके बीच करीब 700 साल का अंतर है। इनमें से एक है वर्ष 2014 की बेस्ट सेलर जस्ट वन थिंग, जिसे लिखा है गैरी केलर और जे पापासन ने तो दूसरा है एक मध्यकालीन दार्शनिक विचार जिसे ओकम रेजर कहा जाता है। पुस्तक में कहा गया है कि आप अपने समय, पैसे और प्रयासों के नतीजों में नाटकीय सुधार ला सकते हैं बशर्ते कि हर मुद्दे पर और समय आप एक साधारण सा सवाल सामने रखें: मैं ऐसा क्या कर सकता हूं कि जिसे करने से हर कुछ आसान या अनावश्यक हो जाए? यह सवाल आपको न केवल बड़े सवालों के जवाब तलाश करने का अवसर देगा (मैं कहां जा रहा हूं? मुझे किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम करना चाहिए?)। साथ ही इसका संबंध छोटे लक्ष्यों से भी है, मसलन मुझे अभी क्या करना चाहिए ताकि मैं बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ सकूं? अगर नीति निर्माता इसे सरकारी बैंकों पर लागू करके देखें तो वे खुद से पूछेंगे कि हमें सरकारी बैंकों के साथ ऐसा क्या करना चाहिए ताकि सबकुछ आसान हो जाए (फंसा कर्ज कम हो, घोटाले रुकें और क्षमता सुधरे) या अनावश्यक? 
 
हम इसके जवाब पर आएंगे लेकिन पहले यह देखते हैं कि ओकम रेजर हमारी क्या मदद कर सकती है। जैसा कि आप में से कुछ लोग जानते ही होंगे ओकम  रेजर समस्या हल करने का एक तरीका है जिसे विलियम ऑफ ओकम नामक अंग्रेज दार्शनिक ने विकसित किया था। यह सुझाता है कि जब कई हलों में से एक को तलाश करने में मुश्किल आए तो तो ऐसा हल चुनना चाहिए जिसमें सबसे कम अनुमान शामिल हों।  अब सरकारी बैंकों पर इसे लागू करके देखते हैं। कोई भी दो रुख अपना सकता है। पहला, स्वामित्व और नियंत्रण को समान रखते हुए व्यवस्था और शीर्ष नेतृत्व में बदलाव लाकर बेहतर और सक्षम संस्थान का निर्माण करना। इसमें कई तरह के अनुमान शमिल हैं। 
 
दूसरा है स्वामित्व में बदलाव और पूरी जिम्मेदारी नए मालिकों पर डालते हुए समस्या को हल करना और जो भी परिणाम हो उसके लिए तैयार होना। इसमें किसी अनुमान की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह हलों का कोई समुच्चय नहीं बल्कि समस्या से पूर्ण निजात का तरीका है।  दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार को इस समस्या को हल करने के लिए स्वामित्व बदलने पर विचार करना चाहिए। तथ्य यही है कि पीएनबी जैसे तमाम भ्रष्टाचार फंसे हुए कर्ज एवं अन्य समस्याएं केवल इसलिए पैदा होती हैं क्योंकि बैंकों का स्वामित्व सरकार के पास है। निजी बैंकों पर नजर डालें तो वे किफायती हैं और उनमें भ्रष्टाचार भी कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां जवाबदेही सुनिश्चित है। 
 
परंतु मुद्दा वह है ही नहीं। बात दरअसल यह है कि अगर निजी क्षेत्र के बैंकों में कोई घोटाला होता है तो केवल उसके अंशधारक ही इससे प्रभावित होंगे और कुछ हद तक जमाकर्ता। जबकि सरकारी बैंकों का असर बहुत बड़े पैमाने पर होता है। हल यही है कि सरकारी बैंकों में जनता का धन बार-बार लगाने के बजाय उनका स्वामित्व बदला जाए। 
Keyword: nirav modi, bank, loan, debt, PNB, fraud,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या मोदी सरकार के चार साल में जमीन पर हुआ है विकास?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.