बिजनेस स्टैंडर्ड - पीएनबी संकट: गड़बड़झाला दर्शाता वित्तीय सेवा विभाग की अक्षमता
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, May 27, 2018 08:56 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

पीएनबी संकट: गड़बड़झाला दर्शाता वित्तीय सेवा विभाग की अक्षमता

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 21, 2018

केंद्रीय वित्त मंत्रालय की एक इकाई वित्तीय सेवा विभाग में करीब 1,600 कर्मचारी हैं। कागजों में यह आंकड़ा काफी बड़ा नजर आता है, लेकिन असल में केंद्र में किसी भी विभाग के कर्मचारियों की तादाद उनकी प्रबंधन या निगरानी क्षमता में नजर नहीं आती है। सबसे अहम चीज कर्मचारी समूह में विभिन्न विशेषज्ञताओं और अनुभवों वाले व्यक्तियों का मौजूद होना है। वित्तीय सेवा विभाग भी केंद्र के अन्य विभागों से कोई अलग नहीं है। विभाग के 1,600 कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा कनिष्ठ स्तर के अधिकारियों, लिपिकों और सहायक कर्मचारियों का है। अगर आप संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के पद वाले लोगों को अधिकारियों में गिनते हैं तो विभाग का प्रभार संभाल रही शीर्ष टीम में केवल आठ लोग हैं। इनमें छह संयुक्त सचिव, एक अतिरिक्त सचिव और एक सचिव शामिल है। 

 
अगर आप यह मानते हैं कि संयुक्त सचिव के पद से नीचे के अधिकारी भी शीर्ष प्रबंधन में योगदान देते हैं तो यह सूची थोड़ी लंबी हो जाती है और इसमें एक उप महानिदेशक, दो आर्थिक सलाहकार, सात निदेशक, छह उप सचिव, दो संयुक्त निदेशक 17 अवर सचिव, दो उप निदेशक और 20 अनुभाग अधिकारी शामिल हो जाते हैं। अनुभाग अधिकारी के पद से ऊपर के अधिकारियों को शामिल करने पर भी वित्तीय सेवा विभाग की शीर्ष टीम 65 से अधिक नहीं होगी।  अब इन कर्मचारियों के काम के दबाव पर विचार कीजिए। इन अधिकारियों पर बैंकिंग एवं बीमा क्षेत्रों से संबंधित बहुत से वित्तीय क्षेत्र के कानूनों के प्रबंधन के अलावा सार्वजनिक एवं निजी बैंकों, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), सहकारी बैंकिंग, वित्तीय संस्थान और भारतीय निर्यात-आयात बैंक से संबंधित सभी मामलों की निगरानी की जिम्मेदारी है। इसके अलावा उनसे उम्मीद की जाती है कि वे जीवन बीमा, सामान्य बीमा, बीमा अधिनियम और सामान्य बीमा कारोबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम  से संबंधित नीतियों का कामकाज देखेंगे। 
 
इस बात में संदेह है कि इन सभी जिम्मेदारियों को निभाने के बाद विभाग की शीर्ष टीम के पास उन करीब 21 सरकारी बैंकों और सात बीमा कंपनियों के परिचालन को संभालने के लिए पर्याप्त समय बचता है, जिनमें सरकार की बहुलांश हिस्सेदारी है। ना ही ऐसा लगता है कि यह टीम इन 28 सरकारी स्वामित्व वाली वित्तीय सेवा क्षेत्र की कंपनियों में बहुलांश हिस्सेदार के रूप में सरकार के हितों की सुरक्षा और संवर्धन की क्षमता एवं कुशलता रखती है।  ऐसे में केंद्रीय वित्त मंत्रालय अपने वित्तीय सेवा विभाग से यह सुनिश्चित करने में क्या उम्मीद कर सकता है कि उसके राष्ट्रीयकृत बैंक और बीमा कंपनियां उचित कारोबारी तरीकों और सरकारी नीतियों का पालन करें? न केवल कार्यबल की दक्षता के लिहाज से बल्कि सरकारी स्वामित्व वाली वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों का प्रबंधन संभालने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की संख्या के लिहाज से भी वित्तीय सेवा विभाग इन कंपनियों में एक बहुलांश हिस्सेदार के रूप में सरकार के हितों की ठीक से रक्षा करने में असमर्थ है। 
 
पंजाब नैशनल बैंक में जो कुछ हुआ है, वह यह दर्शाता है कि कैसे बैंक के प्रबंधकों ने कारोबार करने के बुनियादी नियमों की धज्जियां उड़ाईं। निस्संदेह नियमन को बेहतर बनाना होगा और आरबीआई को अपनी निगरानी और ज्यादा मजबूत करनी होगी। लेकिन अगर वित्तीय सेवा ïविभाग ने बैंक के बोर्ड में शामिल अपने निदेशकों के जरिये ठीक से बैंक के कारोबारी तरीकों पर नजर रखी होती तो यह समस्या काफी पहले उजागर हो गई होती और नुकसान कम हो सकता था। न ही बैंक के स्तर पर पर्याप्त निगरानी रखी गई और न ही वित्तीय सेवा विभाग ने यह सुनिश्चित किया कि बैंक के प्रबंधक नियमों का ठीक से पालन करें। वर्तमान हालात में सरकार क्या कर सकती है? सार्वजनिक बैंकों की कार्यप्रणाली पर नजर रखने के लिए वित्तीय निगरानी विभाग के कर्मचारियों की तादाद और प्रशिक्षण अपर्याप्त है। इसके साथ ही राष्ट्रीयकृत बैंकों का प्रदर्शन 1990 के दशक में शानदार रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ये निजी बैंकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। करीब पांच साल पहले बैंकों का कुल ऋण में 72 फीसदी हिस्सा था, जो अब घटकर करीब 66 फीसदी रह गया है। न ही सार्वजनिक बैंक निजी क्षेत्र के कुशल कार्मिकों को खुद से जोड़ पा रहे हैं। सार्वजनिक बैंकों की अगुआई करने के लिए निजी क्षेत्र के प्रबंधकों को नियुक्त करने के प्रयासों की प्रगति धीमी है। सरकारी बैंकों की एक अहम ताकत उनमें लोगों का भरोसा था। उनके ग्राहक आम तौर पर उनके प्रदर्शन से खुश रहते थे। सरकार और नियामक की निगरानी में किए गए हालिया ग्राहक प्रतिक्रिया सर्वेक्षणों में यह सामने आया है कि उनसे लोगों की नाखुशी बढ़ती जा रही है। 
 
वित्तीय सेवा विभाग की सरकारी स्वामित्व वाली वित्तीय सेवा क्षेत्र की कंपनियों की देखभाल करने की आवश्यक क्षमता न होने और सरकारी बैंकों की निजी क्षेत्र से कुशल कार्मिकों को भर्ती करने में असमर्थता के कारण सरकार के पास इन बैंकों में धीरे-धीरे अपनी हिस्सेदारी के विनिवेश की योजना बनाने के अलावा और कोई चारा नहीं है। अगले कुछ वर्षों का लक्ष्य यह होना चाहिए कि इन बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी 49 फीसदी से कम की जाए और किसी बहुलांश हिस्सेदारी वाले रणनीतिक निवेशक को इन्हें चलाने दिया जाए। यशवंत सिन्हा ने वर्ष 2000 में वित्त मंत्री के रूप में एक सुझाव दिया था, जो काबिलेगौर है। उन्होंने कहा था कि सार्वजनिक बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी घटाकर 33 फीसदी की जाए। 
Keyword: nirav modi, bank, loan, debt, PNB, fraud,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या मोदी सरकार के चार साल में जमीन पर हुआ है विकास?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.