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पुनर्बीमा में संरक्षणवाद दर्शाते नियामक के प्रारूप नियम

श्यामल मजूमदार /  February 21, 2018

इन नियमों में कहा गया है कि भारतीय बाजार में भारतीय पुनर्बीमा कंपनियों  (जीआईसी) और एफआरबी से असीमित जोखिम का बीमा कराया जा सकता है। बता रहे हैं श्यामल मजूमदार 

 
ऐसा लगता है कि संरक्षणवाद इस सीजन का जायका है और 'तरजीही क्रम' के चलते भारतीय बीमा उद्योग भी इसका स्वाद चख रहा है। यह विसंगति पैदा होने की वजह प्रारूप आईआरडीए (पुनर्बीमा) नियमन, 2018 है, जिससे भारतीय पुनर्बीमा और विदेशी पुनर्बीमा शाखा (एफबीआर) को इनकार का पहला अधिकार मिल गया है। इस उद्योग के एक बड़े धड़े का कहना है कि इससे पुनर्बीमा में प्रतिस्पर्धा कम होगी, जिससे ज्यादा लागत एवं कम कवर और नवोन्मेषी उत्पादों के लिहाज से पॉलिसीधारकों पर बुरा असर पड़ेगा। 
 
इससे पॉलिसीधारकों और बीमा कंपनियों के लिए भी गंभीर जोखिम भी पैदा हो जाएगा क्योंकि जोखिम के बीमे का ज्यादातर कारोबार कुछ पुनर्बीमा कंपनियों के हाथ में होगा। इससे बीमा बाजार के स्थायित्व को लेकर खतरा पैदा हो सकता है। इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का कहना है कि इन नियमनों के मुताबिक उपभोक्ताओं को वरीयता क्रम में पुनर्बीमा प्रदाताओं से संपर्क करना होगा और उनके पास अन्य कोई पसंद नहीं होगी।  ये नियमन भारतीय पुनर्बीमा कंपनियों और एफआरबी एक समान बनने और अंतरराष्ट्रीय पुनर्बीमा कंपनियों का कारोबार निगलने की मंजूरी देते हैं, भले ही अंतरराष्ट्रीय कंपनियां कम कीमत की पेशकश करें। इन नियमों में कहा गया है कि भारतीय बाजार में भारतीय पुनर्बीमा कंपनियों (जीआईसी) और एफआरबी से कितने भी जोखिम का पुनर्बीमा कराया जा सकता है। यह डर है कि इससे भारतीय बाजार में केंद्रीकरण का जोखिम बढ़ेगा और पुनर्बीमा का कोई मकसद ही नहीं रह जाएगा। 
 
इसके अलावा पहले इनकार का अधिकार बौद्धिक संपदा अधिकारों का अनादर करता है क्योंकि सभी गोपनीय उत्पाद पेशकश एवं नवप्रवर्तन केवल कुछेक तरजीही पुनर्बीमा कंपनियों के साथ साझा करने होंगे। उदाहरण के लिए साइबर जोखिम एवं बीमा विश्व में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ती बीमा श्रेणी है, जिसके लिए गहरी विशेषज्ञता और लगातार नवप्रवर्तन की जरूरत होती है। अगर अनिवार्य रूप से बौद्धिक संपदा को साझा करने के लिए बाध्य किया गया तो ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय पुनर्बीमा कंपनियों को भारत में अपने ज्यादातर करारों से बाहर निकलना पड़ेगा। भारतीय बाजारों को वैश्विक विशेषज्ञता से वंचित करना भारतीय ग्राहकों के हित में नहीं होगा।
 
यह व्यवस्था इस तरह से काम करती है। बड़े और विशेष जोखिम के लिए व्यक्तिगत पुनर्बीमा में दरें, नियम एवं शर्तें और कवर का फैसला लीड पुनर्बीमा कंपनी करती हैं। जोखिम की प्रकृति के आधार पर किसी अनोखे उत्पाद की पेशकश करने वाली बहुत सी वैश्विक पुनर्बीमा कंपनियां या कुछ विशेष पुनर्बीमा कंपनियां हो सकती हैं। केवल कुछेक पुनर्बीमा कंपनियां ही भारत में प्रवेश कर पाएंगी क्योंकि उन्हें शाखा परिचालन एवं पूरे कारोबार की पेशकश तरजीही क्रम में दिया जाएगा, इसलिए ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धा के लिए समान स्तर नहीं मिलेगा। इससे वे सभी उद्योग प्रभावित हो सकते हैं, जो पुनर्बीमा खरीदते हैं। 
 
उदाहरण के लिए तेल एवं गैस उद्योग को ही लीजिए। यह उद्योग सबसे ज्यादा प्रीमियम देने वाले उद्योगों में से एक है क्योंकि इसमें आवश्यक कवर बहुत अधिक विशिष्ट होता है। सीमित प्रतिस्पर्धा का बीमा लागत और क्षेत्र की कंपनियों के कवर पर सीधा असर पड़ सकता है। 25 अरब रुपये से अधिक संपत्ति वाली बड़ी भारतीय कंपनियां भी प्रभावित होंगी। नियामक ऐसी कंपनियों के लिए 'मेगा रिस्क' को मंजूरी दे रहा है ताकि वे वैश्विक गुणवत्ता का कवर और नियम एवं शर्तें हासिल कर सकें। कुछ चुनिंदा कंपनियों तक ही पुनर्बीमा सीमित होने से इन कंपनियों को सबसे बेहतर जोखिम प्रबंधन और प्रतिस्पर्धी बीमा कार्यक्रम नहीं मिल पाएगा। 
 
इतना ही नहीं, प्राकृतिक आपदा की स्थिति में कुछेक पुनर्बीमा कंपनियों के पास ही जोखिम कारोबार होने से बाजार ढह सकता है और अंतिम पॉलिसीधारकों के लिए कवर की सीमा तय की जा सकती है। इसका उदाहरण 2011 की थाईलैंड की बाढ़ थी, जहां बाढ़ जोखिम जैसे बुनियादी जोखिम को पॉलिसियों के नवीनीकरण में बाहर कर दिया गया।  इससे दवा उद्योग भी प्रभावित होगा। इस समय भारत विश्व में सबसे बड़ा जेनेरिक दवा विनिर्माता देश है और इस उद्योग को विशिष्ट उत्पाद जिम्मेदारी बीमा कवर की जरूरत होती है। लेकिन कुछेक विशिष्ट पुनर्बीमा बाजार ही ऐसा कवर मुहैया कराते हैं और ज्यादातर वाणिज्य पुनर्बीमा बाजार इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी पुनर्बीमा नहीं मुहैया कराते हैं। 
 
क्लीनिकल ट्रायल अनुसंधान बहुत सी कंपनियों को प्रभावित करते हैं, जिन्हें विभिन्न देशों में समयबद्ध तरीके से बीमा प्रमाणपत्र मुहैया कराने के लिए कवर और सेवा की जरूरत होती है। इन व्यवस्थाओं के कायम होने में वर्षों लगे हैं, इसलिए अगर नियामक प्रतिबंधात्मक पुनर्बीमा नियमनों को लेकर आगे बढ़ता है तो इन व्यवस्थाओं पर जोखिम पैदा हो सकता है। इन नियमों के तहत यह जरूरी है कि बहुत से देशों में सेवाएं देने वाली पुनर्बीमा कंपनियों की रेटिंग ए-(एसऐंडपी की) या समकक्ष होनी चाहिए। ऐसा कोई प्रमाणित समकक्ष पैमाना नहीं है, जो एसऐंडपी की रेटिंग की एएम बेस्ट रेटिंग के साथ समानता स्थापित कर सके। उदाहरण के लिए जीआईसी को केवल एएम बेस्ट रेटिंग मिली हुई है, जबकि उसे एसऐंडपी रेटिंग नहीं मिली हुई है। इससे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि क्या कोई समानता दर्शाने वाला पैमाना है। इसमें स्पष्टता की दरकार है। 
 
हम दुनियाभर में प्रचलित सबसे बेहतर पद्धतियों पर नजर डालते हैं। भारत सहित कुल 12 बाजार दुनियाभर के बीमा प्रीमियम में करीब 80 फीसदी योगदान देते हैं। हालांकि इन देशों में से 11 देश पुनर्बीमा प्रीमियम के घरेलू हस्तांतरण को प्रोत्साहित करते हैं, लेकिन उनमें से किसी में भी भारत जैसा तरजीही जोखिम हस्तांतरण का कानून नहीं है। वहां देश के भीतर कुछ चुनिंदा पुनर्बीमा कंपनियों को तरजीह मुहैया कराने के बजाय साख जोखिम प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। भारतीय बीमा बाजार जीआईसी समेत दुनियाभर से प्रतिस्पर्धी आधार पर पुनर्बीमा खरीद रहा है। हाल में सरकार और नियामक ने विदेशी पुनर्बीमा कंपनियों को भारत में शाखाएं स्थापित करने की मंजूरी दी थी, जो एक स्वागत योग्य कदम है क्योंकि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और पॉलिसीधारकों को फायदा होता है। हालांकि जिस तरह से पुनर्बीमा खरीद में प्रतिस्पर्धा का स्तर सीमित किया जा रहा है, उससे गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं। 
Keyword: insurance, GIC,,
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