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नरेंद्र मोदी भी दोहरा रहे हैं इंदिरा गांधी की गलतियां

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  February 19, 2018

सन 1980 में इंदिरा गांधी ने तत्कालीन गृह सचिव को पद से हटाने के पहले उनसे पूछा कि वह सन 1977 की उनकी हार के बारे में क्या सोचते हैं। दरअसल वह गृह सचिव जनता सरकार में भी गृह सचिव रह चुके थे।  इससे पहले उनके रिश्ते ठीक थे। वह पहले संयुक्त सचिव रहे थे और उसके पश्चात सन 1967-75 के बीच वह गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और संयुक्त सचिव रह चुके थे। वह राजनीतिक मसलों पर भी उनसे विचार विमर्श कर लिया करती थीं। इस तरह देखें तो 28 जनवरी, 1980 को भी वह उनसे उतने ही बेतकल्लुफ थे जितने कि आपातकाल लगने के दो दिन बाद 28 जून, 1975 को। परंतु यह बेतकल्लुफी इंदिरा को रास नहीं आई और 3 जुलाई तक उन्हें वापस उनके काडर मध्य प्रदेश भेज दिया गया था। सन 1980 में उनके पास इंदिरा के सवाल का यही जवाब था कि आपने सन 1974 में सुनना बंद कर दिया था और आप जब सुनती भी थीं तो हमेशा गलत लोगों की बात सुनती थीं। उन्होंने पूछा कि वे गलत लोग कौन थे? अधिकारी ने जवाब दिया-खुफिया ब्यूरो। इंदिरा गांधी ने हामी भरी और थोड़ी बहुत बातचीत के बाद मुलाकात खत्म हो गई। वे दोबारा कभी नहीं मिले। उन्हें उनके पद से हटा दिया गया और अगले 18 महीने में सेवानिवृत्त होने तक उन्हें कोई पदस्थापना नहीं दी गई। 

 
इंदिरा गांधी ऐसा करने वाली न तो पहली नेता थीं और न ही वह ऐसी अंतिम प्रधानमंत्री होंगी जिसने गलत लोगों की बात सुननी शुरू कर दी हो। वैश्विक सूची बनाई जाए तो रिचर्ड निक्सन से लेकर तमाम नाम इस सूची में शामिल हैं। उनके पिता जवाहरलाल नेहरू खुद इस समस्या के शिकार हुए थे और इसी के चलते सन 1962 में चीन के साथ युद्घ का सामना करना पड़ा। इंदिरा के बेटे राजीव गांधी भी गलत लोगों से मशविरा लेने के शिकार हुए और इसका खमियाजा उन्हें सन 1987 की गर्मियों के बाद चुकाना पड़ा। 
 
सन 1995 तक पी वी नरसिंह राव ने भी खुद को पूरी तरह अलग-थलग कर लिया था और वह केवल योगियों और अपना भला करने वाले अधिकारियों की सुना करते थे। वाजपेयी काफी हद तक इसके अपवाद थे परंतु उनके भी कुछ प्रिय थे। मनमोहन सिंह तो सही मायनों में बतौर प्रधानमंत्री कभी नजर ही नहीं आए। अब नरेंद्र मोदी की बारी है। जैसा कि गुजरात और राजस्थान के चुनाव नतीजे बताते हैं, यह एकदम साफ होता जा रहा है कि वह भी गलत लोगों की सलाह सुन रहे हैं। वह भी वही गलती दोहरा रहे हैं जो इंदिरा गांधी ने सन 1975-1977 के दौर में दोहराई। यह गलती है कि एक साथ सबको नाराज करना। किसान, मध्य वर्ग, अमीर, मुस्लिम, दलित समेत हर वर्ग उनसे नाराज है। लोगों की नाराजगी की दो प्रमुख वजह हैं। पहली बात तो यह कि केवल किसान ही नहीं बल्कि हर किसी की व्यय करने की क्षमता पर बहुत बुरा असर पड़ा है। यही वजह है कि हर कोई परेशानी महसूस कर रहा है। दूसरी बात यह है कि मोदी ने भीड़ और नौकरशाहों को अधिकार संपन्न बना दिया है। यही वजह है कि हर कोई असुरक्षित महसूस कर रहा है। 
 
आपको इस बारे में कोई अंदाजा ही नहीं है कि कब आपके साथ क्या हो जाएगा? कौन आपको पीट देगा, कौन आपको कर नोटिस दे देगा, कौन सा पुलिसकर्मी आपका शोषण करेगा। आपातकाल के दौरान भी हालात काफी हद तक ऐसे ही थे। भय नहीं तो भी निरंतर आशंका का माहौल देखने को मिल रहा है। ऐसा भी नहीं है कि मोदी को इस बात का पता नहीं है कि निचले स्तर की नौकरशाही किस हद तक दमनकारी हो सकती है। वर्ष 2013 और 2014 में अपने चुनाव प्रचार के दौरान वह अक्सर इसका जिक्र करते थे। सन 2002 के गुजरात दंगों के उनके अनुभव की बात करें तो उन्हें भीड़ का प्रभाव भी बहुत अच्छी तरह पता है। सन 1984 में दिल्ली में क्या हुआ था यह भी वह बहुत अच्छी तरह जानते ही हैं। 
 
तो फिर वह कुछ करते क्यों नहीं? इसका उत्तर बेहद आसान है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके लोग यानी कि चापलूसी करने वाले और खुफिया ब्यूरो के लोग उनसे लगातार यह कह रहे हैं कि इस संबंध में आने वाली तमाम रिपोर्ट बढ़ाचढ़ाकर पेश की जा रही हैं और जो भी कुछ कहा जा रहा है वह सब कांग्रेस का प्रोपगंडा है। परंतु समस्या यह है कि अब तक भले ही यह सच रहा हो लेकिन आगे ऐसा नहीं है।  ऐसे हालात में चापलूसी करने वाले और खुफिया विभाग दोनों तरह के लोग अपने बॉस को नाराज करने से बचते हैं। उन्हें पता है कि अगर वे सच बोलेंगे तो बॉस नाराज हो सकते हैं। यही वजह है कि वे अपने बॉस को आश्वस्त करते रहते हैं कि कहीं कुछ भी गलत नहीं है। 
 
देवदत्त पटनायक के मुताबिक माना जाता है कि चाणक्य ने एक बार चंद्रगुप्त मौर्य से कहा था, 'एक राजा के हाथ में तलवार होती है और उसके इर्दगिर्द खड़ा हर आदमी इस बात से अवगत होता है। इसलिए खुद को बचाने के लिए वे झूठ बोलते हैं और उसकी चापलूसी करते हैं। ऐसे में अदालतों का व्यवहार राजा के मिजाज और उसके विचारों के भय से संचालित होता है।' मोदी को अब दूसरों की बात भी सुननी चाहिए। उन्हें नौकरशाही और भीड़ को रोकना चाहिए। इसकी शुरुआत आधार का दुरुपयोग रोकने से होना चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें सन 2019 के आम चुनाव के नतीजों से चकित भी नहीं होना चाहिए।
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