बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत-पाकिस्तान बल प्रयोग की है सीमा
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भारत-पाकिस्तान बल प्रयोग की है सीमा

श्याम सरन /  February 19, 2018

दोनों पड़ोसी देशों को यह समझना होगा कि सैन्य शक्ति के इस्तेमाल की अपनी सीमाएं हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम सरन 

 
भारत और पाकिस्तान की सेनाएं पिछले कई महीनों से एक दूसरे खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। नियंत्रण रेखा पर लगातार गोलीबारी चल रही है। भारतीय पक्ष का मानना है कि पाकिस्तान की तुलना में कहीं अधिक घातक जवाबी हमला करने की लागत सामान्य से ज्यादा आ रही है। परंतु अब तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि भारतीय पक्ष की ओर से बढ़चढ़कर की जा रही गोलीबारी से पाकिस्तान पर कोई असर हुआ है। बल्कि इससे पाकिस्तान बढ़चढ़कर गोलीबारी कर रहा है और भारतीय सीमा पर स्थित गांवों में काफी नुकसान हो रहा है। हमारी सेना में भी हताहतों की तादाद बढ़ रही है। क्या उनकी जिंदगी का बलिदान किसी ऐसे लाभ के लिए उचित ठहराया जा सकता है जिसे अभी जाना भी नहीं जा सकता? चूंकि तेज प्रतिक्रिया की मौजूदा नीति की शुरुआत पाकिस्तान के सीमा पार आतंकवाद को जवाब देने के लिए की गई थी तो सवाल यह भी है कि क्या ऐसी गतिविधियों में कमी आई है? विडंबना यह है कि ऐसी गतिविधियों और हमलों में तेजी आई है। हाल में कश्मीर घाटी में हुए हमले इसकी बानगी हैं। नियंत्रण रेखा के पार गोलीबारी आगे और बढ़ सकती है लेकिन उससे वांछित नतीजे शायद ही हासिल हों। 
 
चूंकि दोनों ही देश परमाणु हथियार क्षमता संपन्न हैं इसलिए ऐसी गतिविधियों की एक सीमा है। हमें याद करना चाहिए कि कैसे सन 2001 में संसद पर हुए हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम के तहत भारतीय सेना बहुत बड़े पैमाने पर करीब एक साल तक सीमा पर तैनात रही थी। इसकी भारी लागत चुकानी पड़ी थी। तमाम आशंकाओं के बावजूद दोनों ही पक्ष इसलिए मैदाने जंग में नहीं उतरे क्योंकि दोनों को पता था कि पारंपरिक युद्घ जल्दी ही भीषण परमाणु युद्घ में तब्दील हो सकता है। जिसमें कोई जीतेगा नहीं, दोनों हारेंगे। वर्ष 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक ने भी पाकिस्तान का स्वभाव नहीं बदला। भले ही स्थानीय राजनीति में उसका लाभ मिला हो। 
 
दूसरी बात, भारत को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों को भी ध्यान में रखना होगा जिनके अधीन पाकिस्तान के साथ मौजूदा शत्रुता का भाव चल रहा है। पाकिस्तान और अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंतित होगा और हस्तक्षेप की संभावना बढ़ेगी। उसने हमेशा यह दावा किया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच का विवाद केवल तभी हल हो सकता है जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय या तीसरा पक्ष मध्यस्थता करे। वहीं भारत को पाकिस्तान के साथ जुड़े मुद्दों में जिनमें कश्मीर भी अनिवार्य रूप से आता ही है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का हस्तक्षेप बिल्कुल बरदाश्त नहीं है। अब तो यह बात और भी अहम हो चली है क्योंकि पाकिस्तान का मित्र चीन दक्षिण एशिया के विवादों में मध्यस्थ बनने को बेकरार है। ऐसे में हमें यह स्वीकार करना होगा कि पाकिस्तान की ओर से शत्रुभाव और हरकतों में और अधिक इजाफा होगा। क्या हम इसी दिशा में बढऩा चाहते हैं?
 
चीन वाली बात अब भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में और अहम हो चली है। सन 1980 के दशक में चीन ने अपेक्षाकृत निष्पक्ष बनते हुए यह कहना शुरू किया था कि दोनों देश अपने मतांतर को शांतिपूर्ण संवाद के जरिये हल करें। इससे पहले वह कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थक रुख दिखाता था जो बीच में शांत रहा। करगिल युद्घ के दौरान चीन ने अमेरिका के सुर में सुर मिलाकर जोर दिया कि पाकिस्तान को नियंत्रण रेखा का सम्मान करना चाहिए। परंतु अब हालात बदल चुके हैं क्योंकि पािकस्तान अब केवल भारत के साथ संतुलन कायम करने का जरिया भर नहीं रह गया है बल्कि चीन की व्यापक भूराजनैतिक नीति में उसकी अहम भूमिका है। 
 
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) में किया गया भारी भरकम निवेश और ग्वादर बंदरगाह ने पाकिस्तान की सुरक्षा में चीन की भूमिका बहुत बढ़ा दी है। यह भी एक वजह है कि पाकिस्तान भारत के प्रति निश्चिंत भाव से शत्रुता का प्रदर्शन कर रहा है। सीमापार से आतंकी गतिविधियों में भी इजाफा हुआ है। ऐसे में नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करते वक्त ज्यादा सावधानी बरतनी होगी। अब प्रतिक्रियास्वरूप चीन के भारत के साथ लगी सीमा पर हरकत करने की आशंका पहले से ज्यादा है। अमेरिका तथा अन्य शक्तियों के साथ करीबी रिश्ते के बावजूद भारत को इस चुनौती से स्वयं निपटना होगा।
 
इन तमाम वजहों से यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान के खिलाफ खुली लड़ाई और ताकत का इस्तेमाल करने की एक सीमा है और जब भी ऐसा किया गया, इसके वांछित परिणाम सामने नहीं आए। आगे भी ऐसा ही होगा बल्कि इसके कहीं अधिक खतरनाक परिणाम भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के हित में यही होगा कि वे संघर्षविराम करें। पाकिस्तान के व्यवहार में बदलाव के लिए अन्य माध्यमों पर विचार करना होगा। एक अन्य रुझान ऐसा है जो आगे चलकर पाकिस्तान से जुड़ी हमारी किसी भी नीति को जटिल बना सकता है। इन दिनों घरेलू राजनीतिक बहस में पाकिस्तान को लाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और राष्ट्रवाद तथा देशप्रेम को पड़ोसी के प्रति शत्रुता और दुराग्रही भावनाओं का प्रतीक बना दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहकर सही काम किया है कि हमारा विवाद पाकिस्तान राष्ट्र से है उसके लोगों से नहीं। घृणास्पद भाषणों के दौर में कहीं न कहीं हमने समझदारी की स्थिति गंवा दी है। इससे कूटनीतिक गुंजाइश कम हुई है। इस बीच ऐसे लोगों को भी बढ़ावा मिला है जो देश की मुस्लिम आबादी की तुलना पाकिस्तान से करते हैं और पाकिस्तान के प्रति अपनी नफरत का इजहार अपने ही नागरिकों के साथ गाली-गलौज या गलत बातें करके करते हैं। क्या यह द्विराष्ट्र सिद्घांत को ही परिलक्षित नहीं करता है जिसके आधार पर पाकिस्तान के निर्माण को उचित ठहराया जाता है? हम एक ढलवा रास्ते पर हैं और हमारे राजनीतिक दल अगर जल्दी से जल्दी इस सहमति पर पहुंचें तो बेहतर होगा कि विदेश नीति से जुड़े किसी मुद्दे को घरेलू राजनीति का मुद्दा बनने नहीं दिया जाएगा। इससे किसी राजनीतिक दल को अल्पकालिक लाभ भले ही हासिल हो जाए लेकिन लंबी अवधि के दौरान इससे भारतीय समाज के तानेबाने को ही नुकसान पहुंचेगा। 
 
(लेखक देश के पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर के मौजूदा फेलो हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं।)
Keyword: india, pakistan, military,,
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