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खुशामद करने वाला समूह बनता जा रहा है समाचार मीडिया!

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  February 18, 2018

भारतीय समाचार मीडिया की स्थिति के बारे में कुछ पेचीदे पहलू दिखाई दे रहे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2014 के आम चुनाव में मत देने वाले 55.3 करोड़ लोगों में से 31 फीसदी मतदाताओं ने भाजपा को मत दिया था। लेकिन आप टेलीविजन चैनल देखें तो आपको भाजपा समर्थकों के सिवाय और कोई स्वर सुनाई ही नहीं देगा। हालांकि बड़े समाचारपत्र इस मामले में थोड़ी बेहतर स्थिति में हैं लेकिन उनमें भी सरकार की आलोचना करने वाले लेखों को भीतरी पृष्ठों पर जगह देने की प्रवृत्ति है। आर्थिक सुस्ती, कम रोजगार सृजन या सांस्कृतिक ध्रुवीकरण की किसी भी बहस को भीतर धकेल दिया जाता है। 
अंग्रेजी के कम-से-कम तीन और हिंदी के करीब आधे दर्जन समाचार चैनल पिछले कई महीनों से नफरत फैलाने वाला दुष्प्रचार कर रहे हैं। ऑनलाइन और ऑन एयर भी कई पत्रकार और संपादक एक समुदाय, धर्म या विचारधारा के खिलाफ लामबंद करने की बात करते रहे हैं। किसी भी आलोचना या विरोध की आवाज दबाने की कोशिश की जाती है। विरोधियों को निशाना बनाने के लिए व्हाट्सऐप पर बेसिर-पैर वाले संदेश प्रसारित करने और फर्जी समाचार देने वाली वेबसाइट पर पोस्ट लेखों को जरिया बनाकर इतिहास को अपने हिसाब से पेश करने की कोशिश की जाती है। फेसबुक, ट्विटर और गूगल इसमें उनके मददगार साबित होते हैं।
हमारे शुरुआती सवाल इन्हीं बिंदुओं से जुड़े हैं। विचार अभिव्यक्ति के ये प्लेटफॉर्म आखिर फर्जी तथ्यों को पेश करने वाली खबरों के लिए कड़े मानदंड क्यों नहीं रखते हैं? टीवी सामग्री की गुणवत्ता के लिए गठित न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन या समाचारपत्रों के लिए गठित निकाय भारतीय प्रेस परिषद समाचार चैनलों की सामग्री को लेकर चुप क्यों हैं? समाज में वैमनस्य फैलाने की कोशिश कर रहे समाचार चैनलों पर प्रतिबंध की चर्चा क्यों नहीं हो रही है?
दूसरा सवाल यह है कि समाचार मीडिया कारोबार में लगे ब्रांड भाजपा को मत नहीं देने वाले 69 फीसदी मतदाताओं के बाजार पर अपना ध्यान केंद्रित क्यों नहीं कर रहे हैं? आप यह दलील दे सकते हैं कि मीडिया संगठनों के मालिक प्रतिशोध की कार्रवाई को लेकर आशंकित हैं। लेकिन उनका यह डर क्या जायज है?
नवंबर 2017 में दिल्ली प्रेस द्वारा प्रकाशित पत्रिका कैरवैन ने अपनी वेबसाइट पर सीबीआई न्यायाधीश बी एच लोया की संदिग्ध मौत के बारे में राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील खबर प्रकाशित की थी। अधिकांश बड़े समाचारपत्रों और टीवी चैनलों ने उस खबर को नजरअंदाज किया, लेकिन उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों ने उन्हें इस पर ध्यान देने के लिए मजबूर कर दिया। उसके बाद तो विपक्षी दल भी कूद पड़े। क्या इस खबर के लिए कैरवैन को कोई खमियाजा भुगतना पड़ा है? दिल्ली प्रेस के निदेशक और कैरवैन के संपादक अनंत नाथ का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है। आप कह सकते हैं कि कैरवैन बौद्धिक सामग्री पेश करने वाला छोटा प्रकाशन है लिहाजा उसे अधिक तवज्जो नहीं दी गई। उससे आकार में बड़े और स्वतंत्र मिजाज वाले समाचार समूहों को तो केंद्रीय जांच ब्यूरो के छापों और आयकर विभाग के नोटिस का सामना करना पड़ा है। अकेले वर्ष 2017 में ही पत्रकारों पर हमले की 46 घटनाएं हुई हैं। 'द हूट' की तरफ से भारत में मीडिया स्वतंत्रता पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले साल भारत में 11 पत्रकारों की हत्या भी हुई जिनमें से तीन मामले तो पत्रकारिता से संबंधित दायित्वों के निर्वहन से सीधे जुड़ी थीं। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भी भारत को 180 देशों में से 136वां स्थान मिला है। यह 2016 की तुलना में तीन स्थानों की गिरावट है।
वैसे मीडिया स्वतंत्रता को चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना पहले भी करना पड़ा है लेकिन मीडिया इस कदर खुशामद में नहीं लगा रहता था। इतिहास गवाह है कि जब भी मीडिया मालिक अपने रुख पर सख्ती से टिके रहे हैं, उनकी जीत हुई है। आपातकाल के दौरान इंडियन एक्सप्रेस के सजग रवैये को मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है। लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल के समय के मीडिया के रवैये पर कहा था, 'जब मीडिया को झुकने के लिए कहा गया तो वह रेंगने लगा था।' इस बार मीडिया का समर्पण वाला जो रवैया है उसमें खुद ही अपने पर सेंसरशिप लगाने का तत्त्व भी शामिल है। किसी भी लोकतंत्र की सेहत के लिए ऐसा रवैया काफी डरावना है।
कैरवैन के संपादक अनंत नाथ कहते हैं, 'जहां तक निजी समाचार संगठनों के डरने का सवाल है तो सरकार ने उन पर कोई सेंसरशिप नहीं लगाई है। इसकी वजह शायद यह है कि निजी मीडिया या तो सरकार से मिलने वाले विज्ञापनों से मोटी कमाई करते हैं या फिर उन्हें यह डर है कि सरकार के पक्ष में खड़े बड़े कारोबारी समूहों से मिलने वाले विज्ञापनों पर असर न पडऩे लगे। कई मीडिया मालिकों के हित मीडिया से बाहर भी हैं लिहाजा उन्हें सरकार के समर्थन और संरक्षण की दरकार रहती है।' सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता को लेकर विवाद हो सकता है। विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) ने 2016-17 में केंद्र सरकार के मंत्रालयों एवं विभागों के विज्ञापनों पर 1,300 करोड़ रुपये खर्च किए थे। यह रकम टीवी, रेडियो एवं प्रिंट माध्यमों के विज्ञापन राजस्व का महज 2-3 फीसदी है। ऐसे में क्या मीडिया मालिकों को वाकई में सरकारी विज्ञापन को लेकर इतना फिक्रमंद होना चाहिए?
आखिरी सवाल, अगर हम समाचार चैनलों को लेकर निराशावादी हो जाएं तो भी अधिकांश भारतीय समाचारपत्रों का इतिहास 50-100 साल या और अधिक पुराना है। इन समाचारपत्रों ने आजादी के आंदोलन और आपातकाल से लेकर तमाम सरकारों के उत्थान-पतन को देखा है। उन्हें अपने ही इतिहास, विरासत और मुश्किल दौर में भी टिके रहने की काबिलियत पर थोड़ा अधिक भरोसा क्यों नहीं है? मतदाताओं के एक समूह नहीं बल्कि सभी मतदाताओं के प्रति थोड़ा अधिक प्यार जताना कारोबारी नजरिये से भी अच्छा साबित हो सकता है। 
Keyword: News, Media, newspapers,
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