बिजनेस स्टैंडर्ड - व्यवस्थित जवाबदेही नहीं
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व्यवस्थित जवाबदेही नहीं

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  February 16, 2018

अगर आप किसी को कुछ धनराशि उधार दें तो यह जोखिम रहता है कि शायद आपको वह राशि वापस न मिले। अगर आप अपनी जगह दूसरों को वित्तीय प्रतिबद्घताएं निभाने की अनुमति देते हैं तो वे आप द्वारा सौंपे गए अधिकार का दुरुपयोग कर सकते हैं। बैंकों के साथ ये दोनों जोखिम हमेशा बने रहते हैं। ऐसे में उनके कारोबार की सबसे अहम बात यही है कि वे इस बात का आकलन करते रहें कि कितना जोखिम लिया जा रहा है। उन्हें यह भी तय करना होता है कि अधिक जोखिम वाले ग्राहकों से अधिक ब्याज वसूला जाए या उन्हें ऋण देने से ही इनकार कर दिया जाए। 

 
बैंकों को दूसरी किस्म के जोखिम से भी निपटना होता है जहां कतिपय लोग सौंपे गए अधिकार का दुरुपयोग करते हैं। इससे निपटने के लिए उन्हें व्यवस्था, प्रक्रिया, निगरानी, सीमा समेत तमाम उपाय अपनाने होते हैं। इसके बावजूद गड़बड़ी हो सकती है क्योंकि जोखिम को कम किया जा सकता है लेकिन उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। विस्तृत नियमन, अंकेक्षक, निरीक्षक, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां, बॉन्ड बाजार से मिले संकेत, शेयर विश्लेषक आदि उनकी मदद करते हैं। अगर इनके बावजूद कोई बैंक बुरी तरह विफल रहता है तो कहा जा सकता है कि उसका प्रबंधन या तंत्र ठीक नहीं है। यह भी हो सकता है कि दोनों एक साथ खराब हों। जब हालात बार-बार बुरी तरह बिगड़ रहे हों तो परिस्थितियां पहले की तरह चलती नहीं रह सकतीं। देश के बैंकिंग तंत्र में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी 70 फीसदी से अधिक है। जाहिर है इस क्षेत्र की ज्यादातर समस्याओं का संबंध उनसे ही होने की आशंका रहती है। समस्याओं में उनकी हिस्सेदारी असंगत रूप से ज्यादा है। निजी और विदेशी बैंकों की भी समस्याएं हैं लेकिन उनका आकार बहुत छोटा है। वैसे भी वे अपना कारोबार चलाने के लिए सार्वजनिक संसाधनों पर निर्भर नहीं हैं। ऐसा लगता है मानो सरकारी बैंकों को यह पता ही नहीं है कि पैसा किसे और कैसे ऋण के रूप में देना है। या फिर कुल ऋण की तुलना में उनके बैंक ऋण का अनुपात निजी बैंकों की तुलना में तीन गुना नहीं होता। 
 
पंजाब नैशनल बैंक की ताजा घटना तंत्र और निगरानी व्यवस्था की विफलता का स्पष्टï प्रमाण है। ऐसे में सुधार को लेकर अपनी धारणा भी बदलने का वक्त है। बीते वर्षों के दौरान सरकार का रुख कुछ ऐसा रहा है कि वह समस्या हल करने के लिए धन उपलब्ध कराती रही है और ऊपर से सुधार सुझाती है।  सुधार या तो होता नहीं और अगर होता भी है तो निष्प्रभावी रहता है। इंद्रधनुष योजना की घोषणा सन 2015 में की गई थी। उम्मीद थी कि यह सात सूत्री सुधार योजना प्रभावी साबित होगी। लेकिन सभी प्रस्तावित सुधार लंबित हैं। अब एक बड़ी योजना है जिसमें पहले से भी अधिक धन लगना है। लेकिन एक ही कदम को बार-बार दोहरा कर अलग परिणाम की उम्मीद करना सही नहीं है। इस बीच, जैसे-जैसे समस्या का आकार बढ़ता गया वैसे-वैसे उनसे निपटने के लिए धनराशि का पैमाना भी। 
 
मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान सरकारी बैंकों के लिए 60,000 करोड़ रुपये की नई पूंजी का प्रावधान किया गया था। सन 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने 70,000 करोड़ रुपये का और प्रावधान किया। इसमें से 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि वितरित की जा चुकी है। पांच महीने पहले सरकार ने 1.35 लाख करोड़ रुपये की नई पूंजी इस साल और अगले साल बैंकों को देने की बात कही। इसके अलावा बाजार से पूंजी जुटाई जाएगी।  बीते एक दशक में बैंको को सरकार की ओर से करीब 2.65 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी दी जा चुकी है। अब जबकि आधी से अधिक पूंजी पहले ही बैंकों को दी जा चुकी है, क्या आपको अंदाजा है इन बैंकों का कुल बाजार मूल्य क्या है? अगर इनमें सबसे स्वस्थ भारतीय स्टेट बैंक को छोड़ दिया जाए तो शेष सरकारी बैंकों का बाजार पूंजीकरण बमुश्किल 2 लाख करोड़ रुपये है। यह निजी क्षेत्र के एक ही बैंक (आईसीआईसीआई) के बराबर है। यह बहुत बड़े पैमाने पर मूल्यह्रïास है और सरकारी धन का गलत उपयोग भी। इस पैसे को कहीं बेहतर इस्तेमाल में लाया जा सकता था। मिसाल के तौर पर इसे स्वास्थ्य कार्यक्रमों में खर्च किया जा सकता था। अनुभव बताता है कि बाजार आधारित सुधार मसलन नया दिवालिया कानून की सफलता की संभावनाएं ज्यादा हैं। सरकार को कुछ बैंकों का निजीकरण करते हुए बैंकों में निजी हिस्सेदारी बढ़ानी चाहिए। इसके बाद वह अन्य सरकारी बैंकों से कह सकती है कि वे बाजार के अनुशासन का पालन करें। 
 
(स्पष्टीकरण: बिज़नेस स्टैंडर्ड के स्वामित्व में कोटक महिंद्रा बैंक की सहभागिता है। )
Keyword: nirav modi, bank, loan, debt, PNB, fraud,,
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