बिजनेस स्टैंडर्ड - तंत्र की नाकामी
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तंत्र की नाकामी

संपादकीय /  February 15, 2018

सरकारी बैंक पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) ने स्वीकार किया है कि उसकी मुंबई की एक शाखा में 114 अरब रुपये की धोखाधड़ी हुई है। फर्जी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) को आधार बनाकर विदेशों में अन्य भारतीय बैंकों की शाखाओं से डॉलर में रकम स्थानांतरित की गई। ये एलओयू नीरव मोदी और उनके रिश्तेदारों की रत्न एवं आभूषण कंपनियों के खातों के लिए जारी किए गए थे। इस मामले में पहली प्राथमिकी दर्ज होने के पहले ही जनवरी में मोदी भारत छोड़ गए। जाहिर सी बात है इस कथित घोटाले का असली स्वरूप गहन जांच के बाद ही सामने आ सकेगा। इस मामले में नतीजों पर पहुंचने की कोई हड़बड़ी नहीं होनी चाहिए।

 
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि देश के बैंकिंग क्षेत्र की कमजोरी एक बार फिर उजागर हो गई है। देश के बैंकों, खासतौर पर सरकारी बैंकों में जोखिम प्रबंधन की समुचित व्यवस्था नहीं है। यह समस्या केवल पीएनबी तक सीमित नहीं है। हालांकि यह बैंक 2013 में भी हीरे का कारोबार करने वाली कंपनी विनसम से जुड़े ऐसे ही घोटाले में फंसा था। हीरे के कारोबार में बहुत बड़ी राशि विभिन्न देशों के बीच स्थानांतरित होती है। ऐसे में यह कारोबार स्वाभाविक तौर पर धोखाधड़ी और धनशोधन के लिए जांच के दायरे में रहता है। यह चिंता की बात है कि कुछ बैंक इस जोखिम भरे कारोबार को लेकर जरूरी सतर्कता नहीं बरतते। उदाहरण के लिए इस मामले में पीएनबी के साझेदार बैंकों की विदेशी शाखाओं ने एलओयू जारी किए। ये एलओयू नियामकीय अनुशंसा के तहत मान्य माल भेजने के बाद 90 दिन की सीमा से ज्यादा के लिए जारी किए गए। उन कई बैंकों ने भी गलती की है जिन्होंने बिना पीएनबी के साथ उचित जांच परख किए हजारों करोड़ रुपये की राशि जारी कर दी। इस राशि की गारंटी पीएनबी को देनी थी।
 
यह सवाल बरकरार है कि आखिर केवल दो कर्मचारी बैंक के भीतरी स्विफ्ट सिस्टम और अनाधिकारिक पत्रों का इस्तेमाल करते हुए जोखिम का पता लगाने वाली हर व्यवस्था को धता बताने में कैसे कामयाब रहे? आखिर धोखाधड़ी पर आधारित यह व्यवस्था इतने लंबे समय तक कामयाब कैसे होती रही? यह सिलसिला पूरे सात साल तक चलता रहा। अगर किसी व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करना इतना आसान हो या ऐसी अनदेखी संभव हो तो क्या यह स्वीकार्य होना चाहिए था? बैंकों के बीच ऐसा सहज तालमेल यह भी बताता है कि सुधार रहित और व्यापक तौर पर राष्ट्रीयकृत बैंकों में किस कदर जोखिम मौजूद है। निजी क्षेत्र हो या सरकारी लेकिन जमाकर्ताओं के पैसे का गंवाया जाना प्रबंधकीय जवाबदेही है। जिन लोगों की वजह से यह गड़बड़ी हुई है उन सभी को उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। 
 
निजी बैंक जवाबदेही के मोर्चे पर कमजोर रहे हैं लेकिन सरकारी क्षेत्र की स्थिति तो और खराब रही है। उनके संचालन के ढांचे को देखकर इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होता है। पीएनबी मामला दिखाता है कि सरकारी बैंकिंग क्षेत्र किस कदर दिक्कतों और व्यवस्थागत नाकामी का शिकार है। उनमें निगरानी और प्रक्रियाओं का पालन भी सही ढंग से नहीं हो रहा है। यह सारा कुछ बहुत व्यापक स्तर तक पनप चुका है। भारतीय रिजर्व बैंक लंबे समय से बैंकिंग क्षेत्र को चेतावनी देता रहा है कि उच्च मूल्य के धोखाधड़ी भरे लेनदेन गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। नियामक जटिल वित्तीय लेनदेन को लेकर नियम कड़े करता रहा है। उसने निगरानी बढ़ाई और बैंकों के बोर्डों को ऐसे खतरों को लेकर समय-समय पर अवगत कराता रहा है। जब तक उनमें प्रमुख हिस्सेदार यानी सरकार जवाबदेही नहीं डालती है तब तक समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते ही रहेंगे।
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