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रक्षा तैयारी के मामले में सही है मोहन भागवत की बात

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  February 14, 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखिया यानी सरसंघचालक मोहन भागवत ने पिछले दिनों एकदम ठीक कहा कि अगर जंग होती है तो सेना को तैयार होने में 6-7 महीने का वक्त लगेगा। उन्होंने यह नहीं कहा कि ये महीने सेना के लिए हथियारों की आपात खरीद में निकल जाएंगे। इस बीच उन्होंने एक हास्यास्पद बात कही कि जब तक सेना युद्ध के लिए तैयार होगी आरएसएस उसकी जगह ले सकता है। भागवत ने रक्षा तैयारी में कमजोरी की बात की लेकिन वह देश की रक्षा के लिए उत्तरदायी लोगों के बारे में कुछ न कह सके। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और उनके पूर्ववर्ती मंत्री अरुण जेटली और मनोहर पर्रिकर शामिल हैं। पिछली सरकार में भी हालात बेहतर नहीं थे। सेना की तैयारी न होने की बात किसी से छिपी नहीं है। 

 
पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने 2012 में तत्कालीन रक्षा मंत्री एम जे एंटनी को एक पत्र लिखकर हथियारों की कमी का जिक्र किया था। पठानकोट, उड़ी और हाल ही में जम्मू जैसे हमले हमारे कमजोर प्रशिक्षण और तैयारी को ही उजागर करते हैं। रक्षा क्षेत्र के कमजोर आवंटन से अंदाजा लगाएं तो शायद मोदी को युद्ध की आशंका नहीं है। पिछले कुछ बजट की तरह इस वर्ष भी बजट में मामूली इजाफा देखने को मिला। सेनाओं और विभागों के बीच लगभग समान प्रतिशत में वितरण किया गया जो सालाना कुल बजट का 6 से 10 फीसदी के बीच है। बीते तीन सालों में हर वर्ष सेना को सैन्य बजट का 68-69 फीसदी मिलता है जबकि नौसेना को 12.5 फीसदी और वायुसेना को करीब 19.5 फीसदी। उससे पहले के दो वर्ष यानी 2014-15 और 2015-16 में थल सेना को 64-65 फीसदी और नौ सेना और वायुसेना को 2-2 फीसदी ज्यादा बजट मिलता रहा। परंतु 2015 में एक रैंक एक पेंशन और 2016 में सातवें वेतन आयोग की सिफारिश लागू होने के बाद थल सेना के लिए धन की आवश्यकता बढ़ गई क्योंकि वहां काम करने वाले ज्यादा हैं। 
 
रक्षा बजट से यह भी पता चलता है कि सरकार कार्मिकों की समस्या से निपटना नहीं चाहती जबकि सेना के कुल आवंटन का करीब 70 प्रतिशत सैनिकों पर ही व्यय होता है। सैन्य पेंशन की लागत को घोषित बजट से बाहर रखना इसी अनिच्छा को दर्शाता है जबकि पेंशन बिल सीधे तौर पर तीनों सेनाओं की कार्मिक नीतियों से जुड़ा हुआ है। पेंशन की लागत मौजूदा सरकार के कार्यकाल में ही 60,450 करोड़ रुपये से दोगुनी बढ़कर 108,853 करोड़ रुपये हो चुकी है। उसे रक्षा बजट से अलग रखना ठीक नहीं है, खासकर जब थल सेना में शॉर्ट सर्विस करने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। लोग 5-7 साल नौकरी करके बिना आजीवन पेंशन लिए चले जाते हैं। 
 
मौजूदा सरकार ने रक्षा बजट को सहज और पारदर्शी बनाया है। अगर वह पेंशन लागत को भी रक्षा आवंटन में दर्शाए तो यह एक बड़ा सुधार होगा। रक्षा को लेकर गंभीर देशों में हर सेना को उसकी सुरक्षा प्राथमिकताओं, चुनौतियों से निपटने की उनकी भूमिका के आधार पर धन का आवंटन किया जाता है। बहरहाल परमाणु हथियार क्षमता के दौर में युद्ध को लेकर बदलता रुख फंडिंग में नजर नहीं आता। अतिरिक्त विशेष बलों या हवाई हमलों या सर्जिकल स्ट्राइक जैसी प्रतिरोधी कार्रवाई की क्षमता विकसित करने को लेकर कोई बजट व्यवस्था नजर नहीं आ रही। बार-बार सार्वजनिक रूप से यह दोहराया गया है कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा मुहैया कराने की भूमिका अपना रहा है या फिर देश की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर सुरक्षा व्यवस्था की जानी है लेकिन नौसेना के बजट में इस दिशा में कोई कदम उठाया गया हो ऐसा नहीं दिखता। बल्कि इसमें कमी ही आ रही है। 
 
पाकिस्तान जैसे कम समुद्री ताकत वाले देश भी भारत जैसी ताकतवर सेना का मुकाबला करने के लिए समुद्री सुरंगों और पनडुब्बियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नौसैनिक आवंटन अपर्याप्त बना हुआ है। इसके चलते 12 सुरंग रोधी पोत और 16 पनडुब्बीरोधी पोत, तॉरपीडो और सोनार नहीं खरीदे जा पा रहे हैं। देश में छह नई पनडुब्बियों का निर्माण भी नहीं हो पा रहा है। खरीद के गतिरोध के चलते ही नौसेना ने अरबों की राशि बिना खर्च किए जमा करनी पड़ी। वर्ष 2012-13 में यह राशि 2,543 करोड़ रुपये, 2013-14 में 3,621 करोड़ रुपये, 2015-16 में 5,285 करोड़ रुपये और वर्ष 2016-17 में 4,371 करोड़ रुपये थी।
 
वायुसेना को भी मिग विमानों के बेड़े की जगह तत्काल एक इंजन वाले लड़ाकू विमानों की जरूरत है। उसे भी जो पूंजीगत बजट दिया गया है वह बमुश्किल उल्लिखित प्रतिबद्धताओं को पूरा करने लायक है। एक और अहम पहलू है 'मेक' परियोजनाओं के लिए नाममात्र का आवंटन। रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठï अधिकारी इन परियोजनाओं को देश के रक्षा उद्योग का वाहक बताते हैं। इन परियोजनाओं में देश के रक्षा क्षेत्र की कंपनियों के समूह मिलकर जटिल रक्षा प्लेटफॉर्म तैयार करते हैं। रक्षा मंत्रालय इनके विकास की 80 से 90 फीसदी लागत लौटा देता है। इसके औद्योगिक और तकनीकी लाभों के बावजूद सरकार ने वर्ष 2015-16 में इस मद में कुछ भी व्यय नहीं किया। वर्ष 2016-17 में इसमें 247 करोड़ रुपये, गत वर्ष 15 करोड़ रुपये व्यय किए। इस वर्ष 142 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। 93,982 करोड़ रुपये के बजट में यह राशि बेहद मामूली है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रक्षा व्यय जो सरकार के कुल व्यय का 16.5 फीसदी और वर्ष 2018-19 के सकल घरेलू उत्पाद का 2.16 फीसदी है उसे उचित तरीके से खर्च किया जाए। इसके लिए विचारहीन नियमित वृद्घि के बजाय समग्र योजना अपनानी होगी। चार साल में देश में तीन रक्षा मंत्री बदले जा चुके हैं। ऐसे में मोदी सरकार का पूरा कार्यकाल तो मंत्रालयीन कामकाज सीखने-सिखाने में ही बीत जाएगा। रक्षा मंत्रालय को इससे बेहतर की दरकार है।
Keyword: RSS, BJP, military,,
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