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नए नियम से बैंकों का बढ़ेगा एनपीए

अभिजित लेले / मुंबई 02 13, 2018

फंसे कर्ज का बोझ

रिजर्व बैंक ने फंसी संपत्तियों के नियमों को किया संशोधित, बैंकों पर बढ़ सकता है बोझ
60 से 90 दिनों तक बकाया खातों के एनपीए बनने का जोखिम
केंद्रीय बैंक के इस कदम से करीब 2.8 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बन सकता है एनपीए
एसएमए 2 खातों के एनपीए होने की ज्यादा आशंका
आने वाली तिमाहियों में बैंकों पर ज्यादा प्रावधान का बढ़ेगा दबाव
सितंबर 2017 तक बैंकों के कुल ऋण में ऐसे ऋण की हिस्सेदारी थी करीब 3.5 फीसदी

फंसे कर्जों पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के संशोधित प्रारूप की वजह से करीब 2.8 लाख करोड़ रुपये का कर्ज गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) में बदल सकता है। अगर इन कर्जों का भुगतान 60 से 90 दिनों तक बकाया है , तो नए नियमों के तहत इनके एनपीए में बदलने का जोखिम बढ़ गया है। सकल एनपीए का आंकड़ा बढऩे से बैंकों पर इनके लिए ज्यादा प्रावधान करने का दबाव बढ़ सकता है।

बैंकिंग जगत में ऐसे खातों जिनका भुगतान 60 से 90 दिनों के अंदर नहीं हुआ हो, को विशेष निगरानी वाले खाते (एसएमए 2) माना जाता है। इनके एनपीए होने का खतरा अधिक रहता है, हालांकि इनमें से सब एनपीए नहीं होते हैं। बैंकरों का कहना है कि रिजर्व बैंक के नए नियमों से बैंकों को निर्दिष्ट खातों को एकसमान देखना होगा। अगर कोई बैंक किसी खास खाते को एनपीए के तौर पर देखता है और दूसरे बैंक को भी उसी के अनुरूप उक्त खाते को अपने बही-खाते में एनपीए के तौर पर रखना होगा।

रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2017 तक बैंक के कुल ऋण में एसएमए 2 ऋणों की हिस्सेदारी करीब 3.5 फीसदी थी। सितंबर 2017 तक अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों का फंसा कर्ज करीब 8 लाख करोड़ रुपये था। इस तरह अगली कुछ तिमाहियों में एनपीए श्रेणी में जिन ऋणों के जाने का जोखिम है, वह करीब 2.8 लाख करोड़ रुपये हो सकता है।

इक्रा में वित्तीय क्षेत्र के रेटिंग्स के समूह प्रमुख कार्तिक श्रीनिवासन ने कहा कि रिजर्व बैंक द्वारा जारी फंसी संपत्तियों के समाधान पर संशोधित प्रारूप से आने वाली तिमाहियों में बैंकों का एनपीए बढ़ सकता है। यह एसएमए 2 श्रेणी के तहत आने वाले बड़े कर्जदारों के लिए निपटान योजना के क्रियान्वयन का नतीजा हो सकता है।

अगर बैंक 2,000 करोड़ रुपये और इससे अधिक के कर्जदारों के लिए समाधान योजना लागू करने में सक्षम नहीं होता है तो ऐसे मामलों को ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के तहत राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के पास भेजा जा सकता है। रिजर्व बैंक द्वारा जारी डिफॉल्टर कंपनियों की दूसरी सूची में अधिकांश की यही कहानी है। ज्यादातर कर्जदारों की समाधान योजना नाकाम हो चुकी थी और उन्हें आईबीसी को भेजा गया था। इससे बैंकों के वित्त वर्ष 2019 के दौरान उधारी के लिए ज्यादा प्रावधान करना पड़ सकता है।

एडलवाइस एआरसी के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी सिबी एंटनी ने कहा, 'एसएमए वर्ग में चूक से फंसा कर्ज बढ़ सकता है। इस व्यवस्था का सकारात्मक पक्ष यह है कि संपत्ति पुनर्गठन कंपनियों सहित दूसरी कंपनियों को ऋण बेचना समाधान योजना का हिस्सा हो सकता है, जिससे कंपनी को फिर से पटरी पर लाने की योजना को गति मिल सकती है।' अलबत्ता उन्होंने कहा कि संशोधित नियमों में एकमात्र पेच यह है कि सभी ऋणदाताओं को समाधान पर सहमति जतानी होगी। उन्होंने कहा, 'यह अच्छी मंशा है लेकिन इसे व्यवहार में लाना मुश्किल है।'

देश के अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों का सकल एनपीए सितंबर 2018 तक 11 फीसदी पहुंच सकता है। परिसंपत्ति गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के कारण बैंकिंग क्षेत्र में समग्र जोखिम अब भी बरकरार है। मार्च और सितंबर 2017 के बीच बैंकों का सकल एनपीए उधारी अनुपात 9.6 फीसदी से बढ़कर 10.2 फीसदी हो गया।  सरकारी क्षेत्र के अधिकांश बैंकों को ज्यादा प्रावधान के बोझ का सामना करना पड़ेगा। बैंकरों का कहना है कि सरकार इन बैंकों में जो पैसा डाल रही है, उसमें से अधिकांश हिस्सा फंसे कर्ज के लिए प्रावधान में जाने की संभावना है।
Keyword: फंसा कर्ज, रिजर्व बैंक, नियम, बकाया, एनपीए, एसएमए2, ऋण, हिस्सेदारी,
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