बिजनेस स्टैंडर्ड - भारतीय रिजर्व बैंक का ताजा कदम डिफॉल्टरों के लिए चेतावनी
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भारतीय रिजर्व बैंक का ताजा कदम डिफॉल्टरों के लिए चेतावनी

अनूप रॉय और अद्वैत पलेपू / मुंबई February 13, 2018

अगर किसी कंपनी के ऊपर बैंकिंग क्षेत्र के 2,000 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा बकाया हैं और इसके प्रवर्तकों ने जल्द बकाया का भुगतान नहीं किया तो वे भारी संकट में फंस सकते हैं। विशेषज्ञों ने हालांकि कहा कि आगामी तिमाहियों में फंसे कर्ज और प्रावधान के बैंकों के आंकड़े उच्चस्तर पर बने रहेंगे। दबाव वाली परिसंपत्तियों के ढांचे में अप्रत्याशित संशोधन के तहत भारतीय रिजर्व बैंक ने सोमवार को कहा कि अगर ये खाते डिफॉल्ट के दायरे में रहे तो इन्हें (चाहे उनके लिए पुनर्गठन प्रक्रिया शुरू कर दी गई हो) समाधान योजना के तहत रख दिया जाएगा।
 
विïशेषज्ञों ने कहा, इसके अलावा एक बैंक के साथ डिफॉल्ट करने वाले खाते के मामले में कंसोर्टियम के अन्य बैंकों को ऐसे खाते को बेहतर बनाने में शामिल होना पड़ेगा। अन्यथा ऐसे खाते को सामान्य तौर पर एनपीए परिसंपत्ति के तौर पर वर्गीकृत किया जा सकता है और ऐसे में उच्च प्रावधान का मामला  लागू होगा। बैंकरों ने कहा, यह मानते हुए कि पुनर्गठन वाले खातों में से ज्यादातर ने विगत में डिफॉल्ट किया है तो मौजूदा नियम सभी बड़े खातों को दबाव वाली परिसंपत्तियों के दायरे में घसीट लेगा। ये चीजें दो वजहोंं से प्रवर्तकों के लिए काफी बुरी हो सकती हैं।
 
पहला, अगर खाते ने डिफॉल्ट किया है तो समाधान योजना 1 मार्च से 180 दिन के भीतर लागू करनी होगी। अगर समाधान नहीं निकलता है तो खाते को दिवालिया अदालत में भेज दिया जाएगा। दूसरा, सभी बैंकों को समाधान योजना पर सहमति जतानी होगी। अगर उनमें से कोई समाधान पर एतराज जताता है तो यह खाता सीधे तौर पर दिवालिया कार्यवाही में चला जाएगा। अब एक दिवालिया कार्यवाही में कंपनी के मौजूदा प्रवर्तक बोली नहीं लगा सकते जब तक कि उसने बैंकों को कर्ज का भुगतान न कर दिया हो। यह कंपनी का नियंत्रण खोने जैसा है और इसके भारी असर होंगे। अब आरबीआई की तरफ से संदर्भित 40 बड़े खातों के अलावा डिफॉल्ट करने वाले अन्य प्रवर्तक भी अपनी कंपनियों का नियंत्रण खो सकते हैं, अगर उन्होंने बैंकों के साथ कर्ज का निपटान न किया।
 
विशेषज्ञों ने कहा कि कंपनियोंं के लिए अपनी देनदारी के निपटान का मतलब बनता है और वह भी समाधान योजना के लिए संदर्भित करने से पहले। ग्रांट थॉर्नटन एडवाइजरी प्राइवेट लिमिटेड के पार्टनर आशिष चौचडिय़ा ने कहा, मामला आईबीसी जाने से पहले समाधान की खातिर बैंकों व प्रवर्तकों के लिए काफी प्रोत्साहन उपलब्ध हैं। अगर यह अदालत की ओर जाता है तो इसकी कोई गारंटी नहीं है कि प्रवर्तक कंपनी में बने रहेंगे और बैंकों को कितनी रकम बट्टे खाते में डालनी होगी। यह बैंकों की रिकवरी में सुधार लाएगा, लेकिन अल्पावधि में बैंकों को काफी ज्यादा फंसे कर्ज और बढ़ते प्रावधान का सामना करना होगा, हालांकि कई विशेषज्ञ इसके दूसरे हिस्से से सहमत नहीं हैं क्योंकि दबाव वाली कंपनियोंं के लिए बैंक पहले ही प्रावधान कर चुके हैं। एक वरिष्ठ बैंकर ने कहा, कुछ निजी बैंकों के लिए भी नियमों में सख्ती की गई है जिन्होंने पूरी समाधान प्रक्रिया में देर की है। निजी क्षेत्र के बैंकों ने लगातार एक खाते को तब तक दबाव वाले खाते के तौर पर नहींं पहचाना जब तक कि आरबीआई ने उन्हें ऐसा करने को नहींं कहा, साथ ही ये बैंक संयुक्त लेनदार फोरम की किसी समाधान योजना पर एतराज जताने के लिए जाने जाते हैं क्योंंकि इन्हें खाते के एनपीए में वर्गीकृत होने का डर है।
 
ताजा ढांचे में काफी सुधार किया गया है, जो दिवालिया संहिता की अनुपस्थिति में लागू होते थे। अब चूंकि संहिता आ गई है, लिहाजा सभी जटिल ढांचे समाप्त किए जा सकते हैं। साथ ही बैंक पहले इस ढांचे का इस्तेमाल समाधान के बजाय फंसे कर्ज को छुपाने में में करते थे और आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इसे प्रतिकूल प्रोत्साहन का नाम दिया था। कॉरपोरेट लॉ फर्म जे सागर ऐंड एसोसिएट्स के पार्टनर असित शाह ने कहा,ऐसे कई मौजूदा ढांचे ठीक तरह से काम नहीं कर रहे थे क्योंकि लेनदार बैठक में नहीं आए या बैठक में आने वाले लोगों के पास फैसला लेने की शक्ति नहीं थी। कुछ लेनदारों ने पुनर्गठन की व्यवस्था पर हस्ताक्षर किए और कुछ ने नहींं किए, जिसके परिणामस्वरूप काफी अनिश्चितता फैली। 
 
विशेषज्ञों ने कहा कि नए ढांचे ने सुनिश्चित किया है कि कर्जदार का संरक्षण अब लेनदार के संरक्षण हो गया है। नई व्यवस्था में मौजूदा प्रवर्तकों को बैंकों के साथ मामला निपटाने के लिए 180 दिन का वक्त दिया गया है। अगर वे इसमें कामयाब नहींं होते तो मामला अदालत जाएगा और दिवालिया कार्यवाही शुरू हो जाएगी। क्रिसिल के मुताबिक, नए ढांचे के जरिए शायद फंसे कर्ज में या बैंकों के प्रावधान में अनिवार्य बढ़ोतरी शायद नहीं होगी। क्रिसिल के वरिष्ठ निदेशक कृष्णन सीतारामन ने कहा, बैंकों के लिए एनपीए के उद्भव पर बहुत कुछ नहींं हो रहा है, लेकिन ढांचे के जरिए रिकवरी मेंं सुधार होगा।
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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