बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत कब तक बना रहेगा निम्न-मध्य आय वाला देश?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, April 19, 2018 03:09 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

भारत कब तक बना रहेगा निम्न-मध्य आय वाला देश?

पर्सी मिस्त्री /  February 12, 2018

भारत के विकसित देश के रूप में तब्दील होने के आसार कम ही लग रहे हैं। केवल आमूलचूल बदलावों से ही इसे हकीकत के रूप में तब्दील किया जा सकता है। बता रहे हैं पर्सी मिस्त्री 

 
 
हरेक साल भारत आर्थिक विकास दर, बजट और राजकोषीय घाटे को लेकर चर्चाओं में मशगूल रहता है। अहम सवाल यह है कि भारत किस दिशा में जा रहा है? क्या यह निकट भविष्य में एक समृद्ध विकसित देश बन जाएगा?  चीन तीन दशकों (1979-2009) तक 10 फीसदी की दर से प्रगति करता रहा है। भारत ने भी 1991 से लेकर 2016 तक करीब सात फीसदी की दर से विकास किया है। भारत का प्रगति पथ उन राजनीतिक घटनाओं से भी प्रभावित रहा है जिनका चीन को सामना नहीं करना पड़ता है। इसके अलावा आर्थिक सुधारों को लेकर हिचक भी रही है। विकास के नाम पर जीतकर सत्ता में आई मौजूदा सरकार का प्रदर्शन तो खासा निराशाजनक है। सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया है लेकिन देश को इसकी कीमत 1-2 फीसदी वृद्धि के तौर पर चुकानी पड़ी है। जीएसटी ने तो सामान्य धारणा से कहीं अधिक मध्यम-अवधि का नुकसान पहुंचाया है।
 
शुरुआती दौर में नरेंद्र मोदी को लेकर दिखाया गया भरोसा चार साल बाद हिलने लगा है। विभिन्न कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में सरकार का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। महत्त्वपूर्ण सुधारों पर आगे बढऩे की कोशिश ही नहीं की गई है। भारत को अब मालूम हो चला है कि मोदी के फैसले आवेग में लिए गए होते हैं। आगे भी यह सिलसिला जारी रहता है तो भारत को एक 'विकसित' देश बनने में कितना लंबा वक्त लग जाएगा? दीर्घकालिक आथिक परिदृश्य को लेकर खड़ा होने वाला सवाल जायज है। 19वीं सदी में अर्जेंटीना और ब्राजील के विकसित होने की पुरजोर संभावना जताई जाती थी। पिछली सदी के मध्य तक इन दोनों इलाकों की प्रति व्यक्ति आय दक्षिण कोरिया की पांच गुनी हुआ करती थी। लेकिन इतने समय बाद भी ब्राजील मध्य आय के जाल में उलझा हुआ है। अर्जेंटीना उच्च आय वर्ग में आने के बाद भी विकसित श्रेणी से नीचे ही है।
 
इन देशों के बजाय पूर्व एशिया के कहीं गरीब देश (दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग) इस सिलसिले को तोडऩे में सफल रहे। इन देशों के विकसित होने की उम्मीद किसी ने नहीं की थी लेकिन ये 'उड़ते राजहंस' अब 'विकसित' हो चुके हैं। चीन दुनिया की दूसरी बड़ी महाशक्ति बन चुका है और ऐसा चीन की अपनी आकांक्षा एवं तैयारी से कहीं पहले हुआ है। यह अलग बात है कि चीन अब भी 'विकसित' नहीं हो पाया है। चीन के समय-पूर्व उभार की आंशिक वजह तो अमेरिका के लिए शुरू की गई डॉनल्ड ट्रंप की 'डूम स्पाइरल' मुहिम भी है। इसमें में भू-सामरिक शक्ति होने के साथ वैश्विक विश्वसनीयता पर भी जोर दिया गया है। 
 
किसी को भी अचरज हो सकता है कि 1950 में भारत की प्रति व्यक्ति आय चीन जितनी ही थी जबकि कोरिया और ताइवान केवल 50 फीसदी ही आगे थे। एक देश के तौर पर भारत पूर्व एशिया की तुलना में कहीं अधिक क्षमता रखता था, उसकी शासन प्रणाली भी अधिक विकसित थी और सामाजिक स्थिरता भी ज्यादा थी। लेकिन भारत की प्रति व्यक्ति आय 2017 में चीन की एक चौथाई ही रह गई। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक 2017 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 1852 डॉलर रही जो ताइवान से 13 गुना और दक्षिण कोरिया से 16 गुना कम है। यूएई और कुवैत जैसे खाड़ी देश भी सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग का प्रति व्यक्ति आय स्तर हासिल कर चुके हैं। मूलत: प्रवासी श्रमिकों पर आश्रित इन देशों में विकसित देशों जैसा आधारभूत ढांचा है और वे समृद्ध भी माने जाते हैं। लेकिन उन्हें विकसित देशों की श्रेणी में नहीं रखा गया है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों, न्याय प्रणाली की गुणवत्ता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवाधिकार, स्त्री-पुरुष समानता, व्यावहारिक मानक और संस्थागत एवं कॉर्पोरेट सक्षमता के नजरिये से देखें तो खाड़ी देशों के साथ चीन भी समृद्ध होने के बावजूद 'विकसित' नहीं माना जाएगा। विकासशील दुनिया 1960 से 2000 की अवधि में काफी हद तक पश्चिम के लोकतांत्रिक मॉडल को गले लगाती रही। लेकिन चीन ने भी सफलता हासिल कर इसका विकल्प पेश किया है। हालांकि यह विकल्प भारत जैसे बहुलवादी, व्यक्तिपरक, अराजक एवं अनुशासनहीन (धर्मनिरपेक्ष?) देश के लिए उतना आकर्षक नहीं होगा। भारत में अधिनायकवादी एवं निरंकुश शासन को व्यापक स्वीकार्यता मिलने की उम्मीद कम ही है।
 
मौजूदा शासन व्यवस्था में भारत के 'लोकतंत्र' में आमूलचूल बदलाव आ रहा है। यह एक बहुसंख्यकवादी देश का संस्करण बनता जा रहा है जिसमें भीड़तंत्र के भी अंश समाहित हैं। यह पाकिस्तान का हिंदू संस्करण लगने लगा है। यह इस ओर इशारा करता है कि भारत जिस रास्ते पर चल पड़ा है वह उसे विकसित बनाने के लिए सही नहीं होगा। आखिर क्यों? ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जो साधन-संपन्न देशों को भी मध्यम आय के जाल में फंसने से बचाने के लिए जरूरी रफ्तार देने वाले तत्त्वों की कहानी बयां करते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में होने वाले नुकसान की व्याख्या करने वाला कोई भी सशक्त आर्थिक सिद्धांत नहीं है।
 
भारत निम्न-मध्यम आय वर्ग के जाल में फंसने से नहीं बच सकता है। इसकी वजह यह है कि हमारी शासन व्यवस्था एक ऐसी राजनीति से निर्देशित हो रही है जो नेताओं के हितों को पुष्ट करती है, जो वित्त एवं व्यवसाय के बड़े हिस्से का स्वामित्व रखती है या नियंत्रित करती है तथा नेताओं और नियामकों को अपने पक्ष में कर लेने वाले घोर पूंजीवाद की समर्थक है। इसमें सक्षमता एवं नैतिकता के निम्न स्तर के चलते संस्थागत सक्षमता को क्षति पहुंचती है, शिक्षा एवं स्वास्थ्य, विज्ञान, तकनीक एवं शोध-विकास में पर्याप्त निवेश नहीं होता है। मोदी इन खामियों को दूर करने की बात करते रहे हैं लेकिन उसके लिए बहुत कम कदम उठाए गए हैं। 
 
भारत की प्रति व्यक्ति आय के बारे में गणितीय आकलन किया जाता रहा है कि अगर यह सालाना 5.5 फीसदी की वास्तविक वृद्धि दर को भी बनाए रखती है तो हरेक 13 साल में दोगुनी हो जाएगी। लेकिन इतनी विकास दर भी काफी नहीं है क्योंकि पूर्व एशियाई देशों का प्रदर्शन इससे बेहतर रहा है। अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि लंबे विकास पथ में कुछ समय तक तीव्र प्रगति के बाद शिथिलता का दौर भी आता है। अगर वाकई में यह आय दोगुनी होती है तो भारत की प्रति व्यक्ति वर्ष 2030 में 3,700 डॉलर, 1943 में 7,400 डॉलर और 2056 में 14,800 डॉलर तक हो जानी चाहिए। लेकिन वर्ष 2056 तक उच्च आय वाले विकसित देश की प्रति व्यक्ति आय 1 लाख डॉलर से अधिक होगी। क्या भारत चार दशक बाद भी 15,000 डॉलर की प्रति व्यक्ति आय के स्तर पर पहुंच पाएगा और विकसित देश का दर्जा हासिल करने के बारे में सोच सकता है?
 
इसकी संभावना कम ही लग रही है। आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के साथ उसमें तेजी भी लानी होगी। समस्या यह है कि भारतीय शासन की सार्वजनिक संस्थागत क्षमता में ह्रïास हो रहा है। नियम बनाना अच्छी बात है लेकिन उनके अनुपालन एवं नियमन को काफी विस्तार दिया जा रहा है। निजी क्षेत्र की सक्षमता अधिक होते हुए भी अधिकांश कंपनियों के कर्ताधर्ता पहल करने से परहेज करते हैं। इन वास्तविकताओं को देखें तो भारत के निम्न-मध्यम आय वर्ग से ऊपर जा पाने की संभावनाएं कम ही हैं। वैसे संंस्थागत बदलावों में तेजी दिखाकर हालात सुधारे जा सकते हैं। 
 
(लेखक ऑक्सफर्ड इंटरनैशनल ग्रुप के चेयरमैन हैं)
Keyword: india, salary, budget,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 2,000 रुपये के नोटों की जमाखोरी है नकदी किल्लत की वजह?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.