बिजनेस स्टैंडर्ड - 'एमसीएलआर की गणना में बदलाव का विरोध'
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'एमसीएलआर की गणना में बदलाव का विरोध'

अनूप रॉय / मुंबई February 11, 2018

बैकों ने सीमांत लागत आधारित उधारी दर (एमसीएलआर) को बाहरी, बाजार आधारित मानक से जोडऩे के कदम का विरोध किया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने इस तरह के फीडबैक मिलने की दुर्लभ जानकारी वेबसाइट पर दी है।  रिजर्व बैंक की मानक प्रक्रिया के मुताबिक उसकी रिपोर्ट तैयार करने के लिए समितियां नियुक्त होती हैं और उस पर फीडबैक लिया जाता है। इस अहम मामले को छोड़ दें तो रिजर्व बैंक ने इस तरह के किसी फीडबैक का खुलासा नहीं किया है।  आंतरिक अध्ययन समूह अक्टूबर 2017 में प्रस्तावित प्रभावी मौद्रिक पारेषण के मसले को देख रहा है, जिसके मुताबिक बैंकों को तीन बाहरी मानकों- ट्रेजरी बिल रेट, सर्टिफिकेट आफ डिपॉजिट (सीडी) रेट और रिजर्व बैंक की रीपो रेट पॉलिसी को  1 अप्रैल 2018 से निश्चित रूप से मानना होगा। इस प्रस्ताव का पहले दिन से ही विरोध हो रहा है। बैंक इस पर पहले ही दिन से सार्वजनिक रूप से टिप्पणी कर रहे हैं कि इस तरह से जोड़ा जाना संभव नहीं है, जब बैंक की जमा दरें बाजार दर से नहीं जुड़ी हुई हैं। 
 
वेबसाइट के एक परिशिष्ट के मुताबिक आंतरिक समूह ने कहा है, हालांकि बैंकिंग व्यवस्था में इस तरह की विषमता मौजूद है, क्योंकि जमाकर्ता फ्लोटिंग रेट के मुताबिक निवेश करने को तैयार नहीं हैं।  परिशिष्ट में कहा गया है, 'आईबीए (इंडियन बैंंक एसोसिएशन) और बैंकों ने सामान्यतया यह कहा है कि एमसीएलआर व्यवस्था बेहतर काम कर रही है और इसे जारी रखा जाना चाहिए। कुछ विदेशी बैंकों को छोड़ देंं तो सभी बैंकों का विचार है कि अध्ययन समूह द्वारा सिफारिश की गई तीन बाहरी मानकोंं मेंं से किसी को भी निकट भविष्य से लेकर मध्यावधि के हिसाब से स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि बैंकों के  वित्तपोषण की लागत तीन में से किसी भी प्रस्तावित बाहरी मानक से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा है।' 
 
बैंकों ने तर्क दिया है कि ज्यादातर बैंकों का कर्ज प्राथमिक रूप से खुदरा जमाकर्ताओं द्वारा वित्तपोषित होता है,  न कि थोक बाजार से, जैसा कि दुनिया के अन्य देशोंं मेंं होता है। परिशिष्ट मेंं कहा गया है, 'इसलिए अगर जमा पर ब्याज दरें स्थिर बनी रहती हैं तो ऐसे में बैंक बाहरी मानकों से जुड़े दरों पर उधारी नहीं दे सकते, जिसमें हर दिन बदलाव हो सकता है।'   बैंकों का तर्क है कि प्रभावी ब्याज दर स्वैप (आईआरएस) बाजार न होने की वजह से वे ब्याज दर की जोखिम को हेज नहीं कर सकते। इसकी वजह यह है कि ऐसे में या तो उनके मुनाफे पर दबाव बढ़ेगा या जरूरत से ज्यादा प्रसार होगा। पत्र में कहा गया है, 'बैंकों ने यह भी उल्लेख किया है कि विश्वसनीय सावधि धन बाजार की अनुपस्थिति में किसी मानक के इस्तेमाल से बैंकों के साथ सावधि प्रीमियम में दरों का विवेकाधीन अधिकार नहीं रहेगा।' इसकी जगह बैंकों ने प्रस्ताव किया है कि बैंकिंग व्यवस्था की जमा दरों पर समग्र आधार के मुताबिक आदर्श मानक बनाया जा सकता है। 
 
बैंकों की यह भी राय है कि एमसीएलआर की गणना के लिए फिर से तय करने की अवधि में बदलाव को तिमाही आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए। इस समय कर्ज के मामले में फिर से तय करने की अवधि एक साल रखी गई है, जिससे बैंकिंग खाते में ब्याज दर के जोखिम का समाधान हो जाता है। 'कमोबेश इंडियन अकाउंटिंग सिस्टम (इंड एएस) और इंटरनैशनल फाइनैंशियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड (आईएफआरएस) में भी कर्ज की अवधि और फिर से तय करने की अवधि में तालमेल होने का सुझाव दिया गया है। यहां तक कि अगर बाहरी मानक को भी स्वीकार किया जाता है तो फिर से तय करने की अवधि को कर्ज की अवधि से जोड़ा जाना चाहिए, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों में आता है।' 
 
फिर से तय करने की अवधि अगर लंबी है तो पारेषण अंतराल बढ़ता है और फिर से तय करने की अवधि कम होने पर बैंकों के लिए ब्याज दर का जोखिम बढ़ता है। इसके अलावा इस तरह से अगर ब्याज भुगतान बाध्यता में बार बार बदलाव किया जाता है तो ग्राहकों को भी परेशानी होगी। 
Keyword: bank, loan, debt, MCLR,,
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