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संरक्षणवाद की वापसी

संपादकीय /  February 11, 2018

तीन स्टॉक एक्सचेंजों ने गत शुक्रवार को संयुक्त वक्तव्य जारी करके कहा कि वे भारतीय प्रतिभूतियों के विदेशी एक्सचेंजों में मूल्यांकन और लाइसेंसिंग के समझौते को तत्काल रद्द कर रहे हैं। इससे कई तरह की चिंताएं उठ खड़ी हुई हैं। यह अपने आप में संरक्षणवाद है जो एक खास बाजार (सिंगापुर स्टॉक एक्सचेंज या एसजीएक्स) को प्रभावित करता है जहां वैश्विक निवेशक भी कारोबार करते हैं। यह केवल एक उद्योग की रक्षा करता है और वह है घरेलू प्रतिभूति उद्योग। जबकि व्यापक अर्थव्यवस्था को इससे नुकसान ही पहुंचता है क्योंकि देश में विदेशी निवेश की लागत अभी हाल में बढ़ गई है। 

 
वित्तीय योजनाओं की प्रस्तुति (उदाहरण के लिए निफ्टी या रुपये से जुड़े डेरिवेटिव) के मामले में भारत की घटती बाजार हिस्सेदारी के चलते भारतीय वित्तीय सेवा क्षेत्र और राजकोष को कई तरह के राजस्व नुकसान का खतरा उत्पन्न हो गया है। वित्त मंत्रालय द्वारा भारतीय वित्तीय सेवा क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी क्षमता के आकलन के लिए गठित विशेषज्ञ समिति ने ऐसी कई समस्याओं का उल्लेख किया जिन्हें हल करके घटती बाजार हिस्सेदारी को थामा जा सकता है। समिति ने अनेक समस्याओं को चिह्निïत किया जिनमें बेहतर वित्तीय योजनाओं के अभाव से लेकर कर अनिश्चितता और पूंजी की आवक तथा उसके निर्गम का प्रबंधन करने वाले नियामकीय ढांचे की प्रशासनिक जटिलता आदि शामिल थे। प्रतिस्पर्धी मोर्चे पर हो रहे नुकसान से निपटने का सही तरीका है, प्रतिस्पर्धा को पहुंच रही हानि की जड़ पर प्रहार करना। इसके लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी), रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय को आर्थिक सुधार लाने होंगे। इसके बजाय नीति निर्माताअेां ने सिंगापुर की निफ्टी वायदा कारोबार तैयार करने की क्षमता पर प्रहार किया। इससे देश की छवि भी बिगड़ती है। संरक्षणवाद का गलत उपाय अपनाने की बहुत जल्दबाजी देखने को मिल रही है जबकि वास्तविक समस्याओं की ओर ध्यान नहीं है। 
 
सरकार का यह निर्णय तब सामने आया है जब एसजीएक्स ने सिंगल स्टॉक निफ्टी वायदा की पेशकश की। यह नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के कुल वायदा कारोबार के एक तिहाई से ज्यादा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक ऐसे अनुबंध का इस्तेमाल नकदी क्षेत्र में अपने जोखिम की रक्षा के लिए करते हैं। सिंगापुर जाने से उनकी लागत कम होती है क्योंकि वहां अनुबंध डॉलर में होते हैं और कर के मोर्चे पर भी लाभ मिलता है। यह प्रतिबंध जिस तरह लगाया गया है वह देखना रोचक है। यह संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति तीन एक्सचेंजों से आई है। बहरहाल, यह समझ पाना मुश्किल है कि बंबई स्टॉक एक्सचेंज एक ऐसे उपाय पर कैसे सहमत हो सकता है जो अनिवार्य रूप से एनएसई के कारोबार और मुनाफे को विस्तार देता है। इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि ऐसे कदम बिना उपयुक्त अधिकार और विधिक उपायों के उठाए गए। 
 
ऐसे में आगे भारतीय बाजारों की कमजोरी जारी रहने की आशंका है। इसका असर घरेलू और विदेशी सभी कारोबारियों पर होगा। विदेशी निवेशकों को लगेगा कि भारत में कारोबार की लागत ज्यादा है और नीति निर्माताओं की धारणा मजबूत नहीं है। इससे विश्व समुदाय में हमारा कद और कम होगा। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय समुदाय इस कदम के खिलाफ पेशकदमी करेगा। उदाहरण के लिए एसजीएक्स भी निफ्टी वायदा की जगह वायदा कारोबार को एमएससीआई इंडिया इंडेक्स पर स्थानांतरित कर सकता है।  एक्सचेंजों के समझौते में एक विशेष प्रावधान है। सूचकांकों की लाइसेंसिंग और उनका मूल्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों में कारोबार के लिए मुक्त है लेकिन अन्य जगह पर नहीं। यह बेहद खतरनाक है। बेहतर यह होता कि हम उनके अनुरूप बनते। किसी क्षेत्र में दूसरों को नुकसान पहुंचाते हुए आगे बढऩे की प्रवृत्ति सही नहीं।
Keyword: share, stock, sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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