बिजनेस स्टैंडर्ड - आम बजट से जुड़ी प्रमुख चिंताएं
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, February 24, 2018 09:27 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

आम बजट से जुड़ी प्रमुख चिंताएं

शंकर आचार्य /  February 09, 2018

ताजा बजट अल्पावधि में वृद्घि के लिए सहायक होगा लेकिन भविष्य में यह उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर राजकोषीय संतुलन की वजह बन सकता है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य

 
वर्ष 2018 में आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके बाद 2019 में देश में आम चुनाव होने हैं। ऐसे में वित्त मंत्री अरुण जेटली का पांचवां बजट अपने आप में आर्थिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक जरूरतों का संतुलन होना ही था। परिणामस्वरूप अगर अमत्र्य सेन के दशकों पुराने शब्द उधार लें तो बजट में कुछ अच्छे बिंदु थे और कुछ उतने अच्छे बिंदु नहीं थे। यहां मैं केवल बाद वाली श्रेणी पर बात केंद्रित करूंगा। ऐसा करने के क्रम में मैं बजट के आकलन पर अपना चार हिस्सों वाला मानक आजमाऊंगा। ये हैं: समग्र राजकोषीय रुख, कर नीतियां, व्यय नीतियां और सुधार संबंधी पहल।
 
राजकोषीय घाटा
 
वर्ष 2017-18 में गैर कर राजस्व में 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमी और राजकोषीय व्यय के एक लाख करोड़ रुपये तक ज्यादा होने के चलते राजकोषीय घाटा 3.2 फीसदी के तय लक्ष्य से 0.3 फीसदी तक ऊपर चला गया। वर्ष के दौरान निजी निवेश और निर्यात में धीमापन रहा। अल्पावधि के वृहद आर्थिक नजरिये से यह बढ़ोतरी पूरी तरह खराब नहीं थी। बहरहाल, वर्ष 2013-14 के चार साल के परिदृश्य में देखा जाए तो घाटे में एक फीसदी से भी कम की कमी आई। वर्ष 2013-14 में यह जीडीपी के 4.4 फीसदी के बराबर था जो वर्ष 2017-18 में घटकर 3.5 फीसदी हुआ। इससे संकेत मिलता है कि राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के मोर्चे पर हमारा प्रदर्शन कमजोर रहा। पिछली सरकार ने 2003-04 से 2007-08 के बीच इसमें दो प्रतिशत कमी की थी और इसे 4.5 फीसदी से 2.5 फीसदी करने में कामयाबी हासिल की थी। इतना ही नहीं वर्ष 2013-14 से 2017-18 के बीच राजस्व घाटे में जीडीपी की तुलना में केवल 0.5 फीसदी की कमी आई। वर्ष 2018-19 के लिए राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 फीसदी रखने का लक्ष्य तय किया गया है जो ज्यादा चिंताजनक है। वहीं 3 फीसदी के लक्ष्य को अब वर्ष 2020-21 तक के लिए टाल दिया गया है। अगर वर्ष 2018-19 में राजकोषीय मोर्चे पर थोड़ी शिथिलता को कई चुनावों के मद्देनजर माफ किया जा सकता है तो निश्चित तौर पर 3 फीसदी का लक्ष्य 2019-20 के लिए तय किया जाना था। दरअसल केंद्र सरकार के लिए अब घाटे को 3 फीसदी के स्तर पर लाना काफी कठिन हो रहा है। ऐसे समय में जबकि राज्यों का घाटा जीडीपी के 3 फीसदी के भीतर है, हमारा संयुक्त घाटा 6.5-7.0 फीसदी के इर्दगिर्द है। मध्यम और दीर्घावधि की ब्याज दरों के लिहाज से यह अच्छा संकेत नहीं है।
 
कर नीतियां
 
सूचीबद्ध शेयरों और म्युचुअल फंड पर 10 फीसदी की दर से लंबी अवधि का पूंजीगत लाभ कर लगाने संबंधी प्रस्ताव पर मीडिया और विश्लेषकों की प्रतिक्रिया प्राय: नकारात्मक रही है। मेरी नजर में यह एकदम उचित है। राजस्व के मोर्चे पर शेयरों और तमाम परिसंपत्ति वर्ग के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। हाल ही में शेयरों में जो बिकवाली देखने को मिली उसके कर प्रस्ताव नहीं बल्कि वैश्विक बाजारों की परिस्थितियां अधिक उत्तरदायी थीं।
 
बजट में कई चीजों पर आयात शुल्क बढ़ाने का पश्चगामी प्रस्ताव रखा गया है। इस पर चर्चा कम हुई है लेकिन यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव है। इन जिंसों में वाहन और कलपुर्जे, मोबाइल फोन और कलपुर्जे, कुछ प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और खाद्य तेल, सौंदर्य प्रसाधन, जूते-चप्पल, फर्नीचर, घडिय़ां-दीवार घडिय़ां, खिलौने और खेल सामग्री आदि शामिल हैं। जैसा कि स्वयं जेटली ने कहा इससे 20 साल की आयात शुल्क में कमी की व्यवस्था पलट जाएगी। उन्होंने कहा कि मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए यह जरूरी है। दरअसल दशकों के वैश्विक अनुभव और हमारे आर्थिक इतिहास ने यह दिखाया है कि ऐसी व्यवस्था की अपनी खामियां हैं। अतीत में हम देख चुके हैं कि ऐसे कदमों से क्षमता में कमी आती है, घरेलू कीमतें बढ़ती हैं, निर्यात को नुकसान होता है और अन्य क्षेत्रों में शुल्क वृद्धि को बल मिलता है। कारोबारी साझेदार इसका विरोध करते हैं और एक सक्षम और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र के विकास की प्रक्रिया बाधित होती है। अभी प्रधानमंत्री दावोस में संरक्षणवाद की आलोचना करके आए हैं, यह उसके ठीक उलट है। सरकार का यह कदम आसियान देशों के साथ मजबूत कारोबारी संबंधों की हालिया प्रतिबद्धता के भी खिलाफ है।अगर रुपये के अधिमूल्यन को कम किया जाए तो मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने का लक्ष्य कहीं बेहतर तरीके से हासिल किया जा सकता है।
 
व्यय नीतियां
 
बजट में व्यय क्षेत्र में दो प्रमुख पहल की गई  हैं। इनमें एक है राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना जिसके तहत देश के 50 करोड़ गरीबों को सालाना प्रति परिवार 5 लाख रुपये तक का अस्पताल बीमा दिलाया जाएगा। दूसरा है तकरीबन सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना और इस व्यवस्था को प्रभावी बनाना ताकि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिल सके। बजट में इन दोनों पहल के लिए फंड का प्रावधान नहीं है। साथ ही इनके डिजाइन, व्यवहार्यता, आर्थिक किफायत, राजकोषीय लागत, क्रियान्वयन क्षमता और राज्यों के साथ सहयोग आदि के मुद्दे भी हैं। उदाहरण के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना निजी अस्पतालों की सेवाओं के लिए सरकार द्वारा फंड की गई व्यवस्था लगती है। इसमें समस्या यह है कि देश में अस्पतालों और प्रशिक्षित चिकित्सकों की ही भारी कमी है। आधिकारिक प्रवक्ताओं ने इसके लिए 10,000 करोड़ रुपये की सालाना लागत की बात की लेकिन हकीकत में वह कई गुना अधिक हो सकती है। 
 
राजकोषीय दृष्टि से देखें तो असली चिंता मौजूदा बजट में कम फंडिंग की नहीं बल्कि भविष्य में भारी भरकम व्यय की प्रतिबद्धता की है। यह योजना आगे चलकर राजकोषीय सुदृढ़ीकरण और राजकोषीय विवेक के लिए भारी दिक्कत खड़ी करेगी। व्यय आवंटन के मोर्चे पर एक अन्य चिंता रक्षा क्षेत्र के कम आवंटन की है। इस क्षेत्र के लिए जीडीपी के 1.6 फीसदी से भी कम आवंटन किया गया है। जैसा कि टीएन नाइनन ने भी लिखा है कि इस समय उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर तो चुनौती मिल ही रही है, हिंद महासागर में भी भारी खतरा है। ऐसे में यह कम आवंटन समझ से परे है।
 
आर्थिक सुधार 
 
यह अपेक्षा करना सही नहीं होगा कि आम चुनाव के ऐन पहले वाले बजट में बड़े सुधारों की घोषणा की जाए लेकिन सभी क्षेत्रों में तय अवधि के रोजगार बढ़ाने से देश में रोजगार के भारी संकट को कम करने में मदद मिल सकती है। इसी तरह उस मौजूदा योजना को अगले तीन साल तक जारी रखने की बात भी काबिले तारीफ है जिसके तहत सरकार कपड़ा, चमड़ा और जूते-चप्पल आदि के कर्मचारियों की भविष्य निधि में 12 फीसदी का योगदान करती है। जहां तक बजट के वृहद आर्थिक प्रभाव की बात है तो यह अल्पावधि में वृद्धि का सहयोग करने वाला हो सकता है लेकिन इसकी कीमत हमें उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर राजकोषीय तथा बाहरी संतुलन के रूप में चुकानी होगी।
Keyword: budget, arun jaitley, rural, agriculture, health, GDP, RBI, share market, infra,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या नीरव-चोकसी की सभी संपत्तियां जब्त करे सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.