बिजनेस स्टैंडर्ड - समर्थन मूल्य से ज्यादा बाजार से जोडऩे का इरादा
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समर्थन मूल्य से ज्यादा बाजार से जोडऩे का इरादा

अभिषेक वाघमारे / नई दिल्ली February 08, 2018

बजट में कृषि क्षेत्र के लिए की गई घोषणाओं को लेकर लोगों की भौहें तन गई हैं खासकर फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को उत्पादन लागत का डेढ़ गुना सुनिश्चित करने के वादे के संदर्भ में। स्वामीनाथन आयोग ने 2006 में इसकी सिफारिश की थी।  विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों में इस बात को लेकर बहस चल रही है कि खेतीबाड़ी की लागत की गणना किस प्रकार की जाए। फिलहाल इस बात पर आम राय नहीं बनती दिख रही है कि एमएसपी की गणना के लिए कृषि लागत के 'ए2 प्लस एफएल' फॉर्मूले पर गौर किया जाए अथवा इससे कहीं अधिक व्यापक लागत वाले 'सी2' फॉर्मूले पर। 'ए2 प्लस एफएल' लागत के तहत नकदी में वास्तविक खर्च के साथ-साथ भूमि का पट्टा किराया और पारिवारिक श्रम मूल्य को भी शामिल किया जाता है। जबकि 'सी2' लागत के तहत खुद की भूमि के लिए गए किराये के साथ-साथ खुद की पूंजी पर ब्याज और पारिवारिक श्रम मूल्य पर भी गौर किया जाता है। 
 
सरकारी अधिकारियों ने पूछे जाने पर स्पष्टï किया कि बजट घोषणा में निहित लागत के तौर पर विचार के लिए 'ए2 प्लस एफएल' पर विचार किया गया है। अधिकतर फसलों का एमएसपी उत्पादन लागत के मुकाबले करीब 30 फीसदी अधिक पहले से ही है लेकिन विश्लेषकों और किसान नेताओं का कहना है कि एमएसपी प्रतिबद्धता अधिक मायने नहीं रखेगी। बजट 2018-19 में संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र के लिए उत्पाद मूल्य में सुधार के उद्देश्य से न केवल फसलों के लिए बल्कि पशुपालन एवं मत्स्यपालन के लिए भी कृषि बाजार बुनियादी ढांचे में सुधार पर जोर दिया गया है। ग्रामीण कृषि बाजार (ग्राम) के तौर पर एक समग्र केंद्र के रूप में ग्रामीण प्राथमिक बाजार को गति दी गई जो किसानों की आय दोगुनी करने पर गठित समिति (डीएफआई समिति) के सुझावों पर अमल करने की ओर उठाया गया एक कदम है। 
 
एमएसपी की प्रभावकारिता पर बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत करते हुए सांसद एवं महाराष्ट्र के एक किसान संगठन (शेतकरी संगठन) के नेता राजू शेट्टïी ने कहा कि वित्त मंत्री द्वारा की गई घोषणा कुछ और नहीं बल्कि हमारे किसानों को गुमराह करने वाली है। उन्होंने कहा, 'इसका तभी कोई मायने दिखता है जब सी2 लागत के मुकाबले 1.5 गुना अधिक एमएसपी की महज घोषणा के बजाय सभी किसानों को उसकी गारंटी दी जाए।' एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य वह न्यूनतम मूल्य है जिसे बाजार मूल्य में गिरावट के समय किसानों की मदद के लिए निर्धारित किया जाता है और किसानों की आय में सुधार से सीधे तौर पर उसका कोई संबंध नहीं होता। लेकिन कृषि विभाग के आर्थिक एवं सांख्यिकीय प्रभाग के अधिकारियों ने बताया कि एमएसपी की गणना के लिए इस्तेमाल होने वाली उत्पादन लागत तारीखी होती है और वास्तविक समय के आधार पर उसकी सटीक गणना के लिए कोई तंत्र मौजूद नहीं है।  महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र से शेतकरी संगठन के एक जिला अध्यक्ष मनोज तायडे ने कहा, 'उत्पादन लागत की गणना करने का तरीका दशकों पुराना है। उदाहरण के लिए, उर्वरकों का छिड़काव करने वाले नोजल की लागत 2016 में 50 रुपये थी जो बढ़कर 2017 में दोगुना यानी 100 रुपये हो चुकी है। इस लागत का ध्यान कौन रखता है?'
 
कृषि सत्र 2017-18 के लिए बीस प्रमुख फसलों (14 खरीफ एवं 6 रबी) में से 12 फसलों के लिए एमएसपी उत्पादन लागत के मुकाबले 30 फीसदी अधिक है। डीएफआई समिति की रिपोर्ट के अनुसार, यह साल 2016-17 में यह उत्पादन लागत के मुकाबले 40 फीसदी अधिक था। दूसरा, प्रमुख फसलों के लिए दो अवधि यानी 2009-10 से 2011-12 और 2012-13 से 2014-15 के दौरान उत्पादन लागत के मुकाबले सकल रिटर्न- उत्पादन का सकल मूल्य 'ए2 प्लस एफएल' लात से कम- आमतौर पर 50 फीसदी अधिक रहा। हरियाणा में धान के लिए यह करीब 172 फीसदी और मध्य प्रदेश में अरहर के लिए करीब 114 फीसदी अधिक रहा। जबकि महाराष्ट्र में बाजरे के लिए यह 8 फीसदी कम और उड़द के लिए 1 फीसदी कम रहा।
 
कृषि विभाग के एक अतिरिक्त सचिव ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, 'एमएसपी एक समर्थन मूल्य है लेकिन बाजार से कृषि उत्पादों के लिए बेहतर मूल्य मिलना चाहिए। एमएसपी से कम बाजार मूल्य की मुख्य वजह आमतौर पर कटाई के तत्काल बाद एपीएमसी मंडियों में आपूर्ति संबंधी बाधाएं होती हैं।' जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य बाजार भाव में गिरावट के समय किसानों की मदद के लिए आवश्यक न्यूनतम मूल्य है। किसानों की आय में सुधार से सीधे तौर पर इसका कोई संबंध नहीं होता बल्कि यह महज उसका एक हिस्सा है। 
 
सरकार के खुद के सर्वेक्षणों (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा 2003 और 2013 में किए गए किसान परिवारों की स्थिति के आकलन) से पता चलता है कि 2003 से 2013 के दौरान खेतीबारी से होने वाली आय में 35 फीसदी की वृद्धि हुई है जबकि पशुपालन से होने वाली आय में इस दौरान 200 फीसदी की वृद्धि हुई।  नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद द्वारा तैयार एक पत्र के अनुसार, वर्ष 2004-05 से 2011-12 के दौरान प्रति किसान वास्तविक आय में 66 फीसदी की वृद्धि हुई जबकि वर्ष 2012-13 से 2015-16 के दौरान यह लगभग स्थिर रही। वर्ष 2016 में नीति आयोग के एक अन्य अध्ययन में कहा गया है कि अध्ययन नमूने में शामिल महज 21 फीसदी किसानों ने इसके कार्यान्वयन को लेकर संतोष जताया। कृषि बाजार बुनियादी ढांचे के लिए वित्त पोषण और किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) को 100 फीसदी कर लाभ देने के साथ ही वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा बजट 2018-19 में कृषि पर ध्यान केंद्रित किए जाने से पता चलता है कि सरकार एमएसपी ढांचे के बजाय बाजार के जरिये बेहतर लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने पर जोर रही है। 
 
सचिव ने कहा, 'आपूर्ति संबंधी बाधाओं के कारण मूल्य में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए तत्काल भंडारण व्यवस्था और एकत्रीकरण केंद्र आवश्यक हैं।' ऐसे में कृषि उपज के लिए बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने के लिए बाजार बुनियादी ढांचा काफी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। डीएफआई समिति की रिपोर्ट में इसकी एक व्यापक तस्वीर दिखती है और बजट में जीआरएएम स्थापित करने के लिए की गई घोषणा उसकी रूपरेखा तैयार करती है। शीतगृह विकास के लिए राष्ट्रीय केंद्र के मुख्य कार्याधिकारी पी कोहली ने कहा, 'भौतिक मूल्य का प्रवाह जब उपभोक्ता से किसानों की ओर होता है तो भौतिक बुनियादी ढांचा की भूमिका काफी अहम हो जाती है।' कोहली ने जोर देकर कहा कि डीएफआई रिपोर्ट में एक प्रमुख योगदानकर्ता के तौर पर जीआरएएम जैसे एकत्रीकरण केंद्र कृषि उपज का मूल्य बेहतर करने में मददगार साबित होंगे क्योंकि आमतौर पर इसे अधिक विनियमित जिला मंडियों में मांग एवं आपूर्ति में उतार-चढ़ाव पर छोड़ दिया जाता है।
 
डीएफआई समिति ने देश में 10 गांवों के बीच कम से कम एक ग्राम के साथ करीब 70,000 ग्राम स्थापित करने का सुझाव दिया है। जबकि बाजार में ऐसे 22,000 बाजार स्थापित करने और उन्हें सड़क, बिजली एवं इंटरनेट से जोडऩे की घोषणा की गई है। हालांकि 2016-17 के दौरान अच्छे मॉनसून के कारण कृषि उत्पादन मूल्य में 2013-14 की तरह 5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। जबकि बुनियादी ढांचा एवं कृषि मशीनीकरण में निवेश 2012-13 के 14.1 फीसदी और 2013-14 में 13.7 फीसदी से घटकर 2016-17 में 11.9 फीसदी रह गया।
 
बेहतर कृषि आय सुनिश्चित करने के लिए बाजार बुनियादी ढांचे के महत्व को रेखांकित करते हुए कोहली ने कहा, 'खेतों के आकार में बिखराव कम कृषि आय का कारण नहीं है लेकिन कृषि उत्पादन में बिखड़ाव है। ग्राम उत्पादन में इस बिखराव को रोकेगा और उपभोक्ता से लेकर बाजार बुद्धिमत्ता यानी दिल्ली के फल विक्रेता से महाराष्ट्र के जालना के अनार किसानों तक के लिए एक माध्यम बनेगा।' चंद के एक हालिया अध्ययन में शिवेंद्र श्रीवास्तव और जसपाल सिंह ने यह साबित किया है कि 1971 से लेकर 2011 के बीच 40 वर्षों के दौरान ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी दो तिहाई से घटकर एक तिहाई रह गई है। कृषि अर्थव्यवस्था के एक प्रोफेसर श्रीवास्तव ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, 'उत्पादन लागत में श्रम हिस्सेदारी की रफ्तार 2007 के बाद कृषि में हुए मूल्यवद्र्धन में वृद्धि के मुकाबले कहीं अधिक तेजी से बढ़ी है। मशीनीकरण से श्रम लागत पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं दिखा है।' उन्होंने कहा कि एमएसपी आवश्यक है लेकिन किसानों की दोगुनी आय सुनिश्चित करने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, 'पशुधन और फसल विविधीकरण होने वाली आय के साथ-साथ व्यापार के लिहाज से किसानों की दशा में सुधार भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं।'
 
हाल में मध्य प्रदेश में भावांतर भुगतान योजना और तेलंगाना में लागत सब्सिडी योजना का प्रयोग किया गया। इन दोनों योजनाओं को 2017 में शुरू लागू किया गया लेकिन किसी उल्लेखनीय परिणाम के लिहाज से ये अभी नई हैं। किसानों के लिए एमएसपी का ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी नीति आयोग को दी गई है।
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