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आरबीआई सख्त, दरें यथावत

अनूप रॉय / मुंबई 02 07, 2018

रीपो दर 6 फीसदी पर बरकरार

वृद्धि दर अनुमान घटाया मगर मुद्रास्फीति का बढ़ाया
राजकोषीय घाटा, मुद्रास्फीति और कच्चे तेल में तेजी से बॉन्ड यील्ड बढ़ने की आशंका
पूंजी पर पांच अलग तरह के शुल्क लगते हैं, जिससे निवेश और बचत प्रभावित होती है
चौथी तिमाही के लिए वृद्धि दर अनुमान 6.6 फीसदी किया

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी बैठक में नीतिगत दरों को आज अपरिवर्तित रखा। आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल ने परोक्ष संकेत दिए कि बॉन्ड प्रतिफल में हाल में आई तेजी का एक कारण सरकार का राजकोषीय व्यय बढ़ाने तथा विकसित देशों में दरों में  बढ़ोतरी हो सकता है। यह केंद्रीय बैंक के नियंत्रण से बाहर की चीज है। पटेल का नीतिगत बयान भविष्य में दरें किस दिशा में जाएंगी, इसका संकेत देता है, खासतौर पर तब जब डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा कि केंद्रीय बैंक का काम बॉन्ड की कीमतों का प्रबंध करने के लिए तरलता मुहैया कराना नहीं है। बॉन्ड डीलरों के अनुसार बयान से संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक बॉन्ड की प्राप्तियों का अब और प्रबंध करने के मूड में नहीं है और सरकार को बाजार की बात सुननी होगी। इसका मतलब यह हुआ कि बॉन्ड की प्राप्तियां बढ़ेंगी जिससे बैंक भी अपनी कर्ज दर बढ़ा देंगे। यह ऐसे समय हो रहा है जब केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को बाजार से ज्यादा संचालित मानदंडों से जोड़ने पर विचार कर रहा है।

आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज प्राइमरी डीलरशिप में मुख्य अर्थशास्त्री ए प्रसन्ना ने कहा कि अब केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि अप्रैल में जब नई उधारी की शुरुआत होती है तब बाजार को ही अपना स्तर देखना होगा। सरकार को बाजार के मूल्य को स्वीकार करना होगा। छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति में से पांच सदस्य दरें न बदलने के पक्ष में थे जबकि रिजर्व बैंक में कार्यकारी निदेशक माइकल पात्र 25 आधार अंक की बढ़ोतरी चाहते थे। समिति के अन्य सदस्य रवीन्द्र ढोलकिया ने दरों में विराम के पक्ष में वोट दिया। 

नीति का रुझान थोड़ा सा सख्त था। केंद्रीय बैंक ने अगले साल के लिए मुद्रास्फीति के प्रति अपना नजरिया थोड़ा सा बढ़ा दिया जबकि विकास के अनुमानों को 0.1 फीसदी घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया। रिजर्व बैंक ने मार्च तिमाही के लिए मुद्रास्फीति अनुमान संशोधित कर 5.1 फीसदी कर दिया। यह वर्ष 2017-18 के लिए पहले अनुमानित 4.3 से 4.7 फीसदी के बीच रहने से ज्यादा है। अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही के लिए उसने खुदरा मुद्रास्फीति का अनुमान 5.1 से 5.6 फीसदी के बीच रखा है। लेकिन उसका मानना है कि दूसरी छमाही में यह 4.5 से 4.6 फीसदी के बीच रह सकती है। 

नीतिगत बयान में कहा गया है कि कई अनिश्चितताओं के कारण मुद्रास्फीति के अनुमान में बढ़ोतरी की गई है। विभिन्न राज्य सरकारों ने मकान किराया भत्तों में धीरे-धीरे इजाफा किया है जिससे मुख्य महंगाई का आंकड़ा बढ़ सकता है और इसका असर दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी चुनौती हैं। फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन कीमतों को सहारा देने से भी दाम में इजाफा हो सकता है। हालांकि इसका कितना असर होगा, फिलहाल यह अनुमान लगाना संभव नहीं है। सीमा शुल्क में बढ़ोतरी भी एक जोखिम है जबकि राजकोषीय मोर्चे पर सरकार की चूक के व्यापक वित्तीय  नतीजे हो सकते हैं, खासतौर पर उधारी की लागत में। इससे मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। 

घरेलू स्तर पर राजकोषीय घटनाक्रम और दूसरे प्रमुख देशों द्वारा नीति को सामान्य बनाने का भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है और बाहरी निवेशकों का भरोसा कमजोर हो सकता है। लिहाजा आगामी महीनों में मुद्रास्फीति के बढ़ते परिदृश्य के प्रति सतर्कता की जरूरत है। लेकिन कुछ राहत भरे कारक भी हैं और तेल की कीमतों में नरमी के आसार हैं। पटेल ने बाद में कहा कि हमारे अनुमानों से संकेत मिलता है कि इस तिमाही में महंगाई में थोड़ी सी बढ़ोतरी हो सकती है लेकिन 2018-19 के दौरान यह करीब 4.5 फीसदी रह सकती है। यही कारण है कि इस वक्त मौद्रिक नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।

अगले 3-4 महीनों के दौरान जिस तरह के आंकड़े हमें मिलेंगे, उसी हिसाब से हम फैसला लेंगे। अर्थशास्त्रियों की नजर में केंद्रीय बैंक का यह बयान थोड़ा सख्त लगता है जो कि बाजार की उम्मीद से कम सख्त है। इंडसइंड बैंक में मुख्य अर्थशास्त्री गौरव कपूर ने कहा कि भले ही मौद्रिक नीति समिति ने लंबे विराम का संकेत दिया हो लेकिन वर्ष 2018 में दरों में बढ़ोतरी के आसार और मजबूत हो गए हैं।

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