बिजनेस स्टैंडर्ड - तर्क पर आधारित हो कर निर्धारण
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तर्क पर आधारित हो कर निर्धारण

देवाशिष बसु /  February 07, 2018

बजट 2018 में सरकार ने दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ पर 10 फीसदी का कर लगाया है। यह मुख्य तौर पर इक्विटी फंड और 1 फरवरी, 2018 के बाद हुई शेयर खरीद पर लगाया गया। विस्तार से बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
लगभग दो सप्ताह पहले मैंने लिखा था कि शेयरों से हासिल होने वाले दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ पर कर लगाया जाए अथवा नहीं, यह प्रश्न सार्वजनिक वित्त के सिद्घांतों पर आधारित होना चाहिए, सुस्पïष्टï होना चाहिए और इस विषय पर सार्वजनिक बहस भी होनी चाहिए। मैं इसमें यह जोडऩा भूल गया था कि देश में कराधान और कर दरों के निर्धारण के कई अन्य तरीके भी हैं। इनमें नैतिक विचार, व्यक्तिगत आग्रह या फिर आंकड़ों के गलत निष्कर्ष जैसी बातें भी शामिल हो सकती हैं।  केंद्र सरकार ने 1 फरवरी को इक्विटी फंड और शेयर खरीद से होने वाले दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ पर 10 फीसदी कर लगा दिया। कुछ हद तक पुरानी खरीद को भी इसके दायरे में ला दिया गया। जैसा कि ऐसे अधिकांश निर्णयों के साथ होता है, इसके पीछे के स्पष्टïीकरण अथवा सिद्घांत के बारे में विस्तृत जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए सुव्याख्यायित श्वेत पत्र की मदद नहीं ली गई बल्कि प्रसार माध्यमों पर इनके बारे में बोलकर जानकारी दी गई। जब वित्त सचिव हसमुख अढिया ने मीडिया के साथ अपनी बात साझा की तो यह एकदम स्पष्टï हो गया। आइए उनके कुछ विचारों पर नजर डालते हैं। मेरी टिप्पणी के बाद आप चाहें तो उन्हें 'सिद्घांत' भी कह सकते हैं: 
 
हम किसी एक तरह के पूंजीगत लाभ को दूसरे से एकदम अलग करते हुए उसके लिए पूरी तरह अलग और सुमधुर व्यवस्था नहीं कर सकते हैं। अगर ऐसा किया जाता है तो निवेश प्रभावित होगा और लोग उस विकल्प को ही चुनेंगे जहां उन्हें कर नहीं देना होगा।  सहज ज्ञान के आधार पर यह दलील सही है लेकिन व्यावहारिक आधार पर यह गलत है। वर्ष 2014 में बंबई स्टॉक एक्सचेंज के प्रबंध निदेशक और और मुख्य कार्याधिकारी आशिष कुमार चौहान ने कहा था कि केवल 1 फीसदी भारतीय ही शेयरों में निवेश करते हैं और बीते दो दशकों से यह आंकड़ा यहीं पर रुका हुआ है। बहरहाल, चौहान शेयरों से हासिल होने वाले दीर्घावधि के लाभ पर कर लगाने के हिमायती रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014 तक औसत भारतीय परिवारों की 77 फीसदी परिसंपत्ति अचल संपत्ति में, 11 फीसदी सोने में, 7 फीसदी टिकाऊ वस्तुओं मसलन वाहन या दुकान का माल और पांच फीसदी वित्तीय परिसंपत्तियों में है। करीब 5 फीसदी हिस्सा बैंकों और डाकघर की सावधि जमा योजनाओं तथा भविष्य निधि योजना में रखा गया था। साफ जाहिर होता है कि सन 2005 से शेयरों की कर मुक्त प्रकृति कभी भी इस बात की निर्धारक नहीं रही कि लोग इसमें अपनी बचत निवेश करें या नहीं। 
 
इसे समझने के लिए कई आलेखों की आवश्यकता होगी और इस दौरान व्यवहार विज्ञान की पड़ताल भी करनी होगी। इससे यही सबक निकलता है कि नीति निर्माता विशेष जानकारी और ज्ञान प्राप्त करें और अपनी आंतरिक भावनाओं पर निर्भर रहकर काम न करें। वित्त मंत्री ने गत वर्ष 3.67 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत लाभ का जिक्र किया था। मान लिया जाए कि यह लोगों के वेतन से होने वाली आय होती तो इस पर 20 से 30 फीसदी की दर से कर लगाया जाता। यह एक ऐसा लाभ है जो किसी प्रयास से नहीं हासिल होता। यह बस निवेश से हासिल होने वाला लाभ है। 
 
यहां दो बातें हैं। पहली बात, वित्त सचिव 3.67 लाख करोड़ रुपये की राशि में से एक हिस्सा पाने को लेकर अत्यंत उत्साहित हैं। वित्त मंत्री ने वर्ष 2018-19 के लिए दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ की राशि के 20,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान जताया है। परंतु यह लाभ केवल तभी हासिल होगा जबकि अधिकांश शेयर 31 जनवरी के अपने स्तर से ऊपर के स्तर पर बंद हुए हों। अढिया के साक्षात्कार यह सुनिश्चित करेंगे कि बहुत अधिक कर लगाने के लिए ज्यादा लाभ सामने न हो। 
 
दूसरा मुद्दा है उनका यह कहना कि निवेश से होने वाला लाभ किसी प्रयास की बदौलत नहीं होता है। इस टिप्पणी ने लोगों में चिढ़ पैदा कर दी और उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना नजरिया पेश करना शुरू कर दिया। राज्य सभा के सदस्य राजीव चंद्रशेखर ने इस बारे में इशारा करते हुए कहा कि यह कहना गलत है कि लंबी अवधि के निवेश में कोई प्रयास नहीं लगता। उन्होंने कहा कि सटोरिया कारोबार और लंबी अवधि के निवेश में अंतर है। दीर्घावधि के निवेश में काफी प्रयास लगते हैं। इन्फोसिस के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी और मोदी सरकार की नीतियों के कट्टïर समर्थक टी मोहनदास पई ने लिखा, 'बीते दो सालों के दौरान लाखों खुदरा निवेशकों ने म्युचुअल फंड का रुख किया है...इस कर से उन्हें ही सबसे अधिक नुकसान होगा। लोगों में इसे लेकर भारी निराशा है। कृपया इस पर दोबार विचार करें। कृपया खुदरा निवेशकों से बात करें। बहुत निराश हूं।'
 
शेयरों से पैसे कमाने के लिए निवेशकों को कारोबार को समझना होता है, प्रबंधन गुणवत्ता का आकलन करना होता है, वृद्घि को लेकर कुछ अनुमान लगाने होते हैं, तार्किक मूल्यांकन  होता है और तब जाकर आखिरकार अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए वे कारोबार करते हैं क्योंकि शेयर और इक्विटी फंड अस्थिर हैं और हम मनुष्य होने के नाते अस्थिरता से नहीं निपट पाते। यह एक बड़ा और जटिल प्रयास है। आश्चर्य नहीं कि अधिकांश खुदरा निवेशकों को अपने बल पर शेयरों से कमाई करना कतई आसान नहीं लगता। यही वजह है कि वे अपनी इच्छा से सबस्क्रिप्शन शुल्क, किताबों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और व्याख्यानों आदि पर समय और पैसा खर्च करते हैं। लोग दुनिया के दिग्गज निवेशक और बर्कशर हैथवे के वॉरेन बफेट से ज्ञान प्राप्त करने के लिए ओमाहा भी जाते हैं क्योंकि जो चीजें हमें बहुत कठिन लगती हैं उन्हें वे बेहद आसान बना देते हैं। ऐसे में यह कहना कि शेयरों से होने वाला पूंजीगत लाभ बिना किसी प्रयास के हासिल होता है, यह दिखाता है कि निवेश परिदृश्य को लेकर कितनी कम समझ है। 
 
जैसे ही हम तमाम परिसंपत्ति वर्ग में दीर्घावधि और अल्पावधि को समान बना देते हैं, कहने को कुछ रह नहीं जाएगा। हमें उस दिशा में प्रयास करना चाहिए ताकि आपका निवेश कर निरपेक्ष बन सके, आपका निवेश चयन कर निरपेक्ष बन सके। यह नीतिगत रुख आकर्षक प्रतीत होता है लेकिन इसमें खामी है। अढिया इसका क्रियान्वयन करें उसके पहले क्या वह यह समझाएंगे कि आखिर क्यों लोग अपनी अधिकांश बचत सोने, बैंक जमा, अचल संपत्ति और बीमा आदि में रखते आए हैं जबकि उन्हें शेयरों से 'बिना किसी प्रयास' के प्रतिफल प्राप्त होता और कर भी नहीं लगता?
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