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आरबीआई का संकेत

संपादकीय /  February 07, 2018

सामान्य तौर पर देखा जाए तो भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने वही किया जिसकी अधिकांश पर्यवेक्षक अपेक्षा कर रहे थे। उसने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी टाल दी। बाजार ने भी अपेक्षा के अनुरूप ही प्रतिक्रिया दी और नीति की घोषणा के बाद उसमें कोई हलचल नजर नहीं आई। बैंकिंग क्षेत्र के कुछ शेयर अवश्य प्रभावित हुए। ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि आरबीआई ने मानक दर निर्धारण के तरीके को सुसंगत बनाने के निर्णय की भी घोषणा की। इसके तहत आधार दर को फंड की सीमांत कोष लागत पर आधारित उधारी दर (एमसीएलआर) से जोड़ा जाएगा। 

 
इस कदम का उद्देश्य जहां मौद्रिक नीति के पारेषण में सुधार लाना है, वहीं इसका असर बैंकों के मार्जिन पर भी पड़ सकता है। इस समय वैसे भी आधार दरों पर आरोही दबाव है। मध्यम, छोटे और सूक्ष्म उद्यमों को भी कुछ राहत प्रदान की गई जो वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के आगमन के बाद मची उथलपुथल के बीच बैंकों का बकाया चुकाने में संघर्ष कर रहे हैं। बहरहाल, इन घोषणाओं से इतर आरबीआई ने अपने नीतिगत दस्तावेज में जो कुछ कहा उसे बारीकी से देखने पर काफी कुछ सामने आता है। नीति की घोषणा के बाद हुए संवाददाता सम्मेलन ने भी काफी चीजें स्पष्ट कीं।
 
आरबीआई ने सकल मूल्यवर्धन के अपने अनुमान में मामूली ही सही कमी की है। चालू वित्त वर्ष के लिए अब उसका अनुमान 6.6 फीसदी का है। इससे पहले अपने दोमाही नीतिगत आकलन में उसने इसके 6.7 फीसदी रहने का अनुमान जताया था। हालांकि सकल मूल्यवर्धन का यह स्तर भी केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जताए गए अनुमान की तुलना में कहीं बेहतर जीडीपी वृद्धि हासिल करने में मदद करेगा। मुद्रास्फीति अभी भी बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। खुदरा महंगाई में दिसंबर में लगातार छठे महीने इजाफा हुआ। इसके लिए काफी हद तक प्रतिकूल आधार प्रभाव उत्तरदायी रहा। परंतु आरबीआई के घरेलू सर्वेक्षण पर आधारित घरेलू मुद्रास्फीति के अनुमान की बात करें तो वह तीन महीने और अगले पूरे एक साल के दोनों ही अनुमानों में बढ़ा हुआ नजर आता है। समस्या यह है कि मुद्रास्फीति बढ़ाने वाले तमाम कारक हैं। कच्चे तेल की कीमत में संभावित इजाफे के अलावा आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल ने विशेष तौर पर सीमा शुल्क में बढ़ोतरी से उपजी चुनौती और विभिन्न फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में किए जाने वाले संभावित इजाफे का जिक्र किया है। बॉन्ड प्रतिफल में बढ़ोतरी पर पटेल ने ऐसे समय में राजकोषीय चूक का जिक्र किया जबकि सुधार की प्रक्रिया के चलते वित्तीय पूंजी की मांग बढ़ रही है। यह राजकोषीय चूक इस वर्ष के बाद अगले वर्ष भी रह सकती है।
 
गवर्नर ने अपनी नाखुशी केवल राजकोषीय चूक तक सीमित नहीं रखी बल्कि अर्थव्यवस्था में निवेश और जीडीपी अनुपात में ठहराव से जुड़े एक प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि देश में पूंजी पर कई कर लगाए जा रहे हैं जिनमें कॉर्पोरेट कर, लाभांश वितरण कर, प्रतिभूति लेनदेन कर और पूंजीगत लाभ कर आदि शामिल हैं। जाहिर सी बात है कि आरबीआई केवल पहले ही घोषित राजकोषीय फिसलन से ही नाराज नहीं है बल्कि वह उच्च एमएसपी के कारण भविष्य में और चूक को लेकर भी चिंतित है। आरबीआई ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उसकी प्राथमिक चिंता अभी भी कीमतों को नियंत्रण में रखना ही है। ऐसे में कहा जा सकता है कि आरबीआई ने अपना निरपेक्ष रुख भले ही नहीं बदला है लेकिन उसने सरकार को यह जता दिया है कि राजकोषीय मोर्चे पर जवाबदेही का परिचय नहीं दिया गया तो वह उचित प्रतिक्रिया जताने से नहीं चूकेगा।
Keyword: RBI, rate, bank, MPC,,
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