बिजनेस स्टैंडर्ड - पेट्रोल-डीजल वाहन संयंत्र बंद करने की मंशा नहीं
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पेट्रोल-डीजल वाहन संयंत्र बंद करने की मंशा नहीं

मेघा मनचंदा और ज्योति मुकुल /  02 07, 2018

बीएस बातचीत

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कुछ महीने पहले वर्ष 2030 तक भारत को पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहन बाजार बनाने की बात कहकर भूचाल खड़ा कर दिया था। मेघा मनचंदा और ज्योति मुकुल के साथ साक्षात्कार में गडकरी ने इलेक्ट्रिक वाहनों, मेट्रिनो और हाइपरलूप जैसी अत्याधुनिक परिवहन सेवा के बारे में बात की। पेश है संपादित अंश:

केंद्रीय सड़क कोष अब सड़क एवं बुनियादी ढांचा कोष बन गया है और इसका आवंटन कई क्षेत्रों में फैल गया है। आप यह सुनिश्चित कैसे करेंगे कि सड़क क्षेत्र को पर्याप्त कोष मिले?

इस कोष में जमा राजस्व को संबंधित क्षेत्रों में बांटा जाएगा। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की पिछली सरकार के समय जब मैं महाराष्ट्र में मंत्री था तो मैंने राज्य में कुछ सड़कें बनाने के लिए केंद्र से संपर्क किया था। उस समय उन परियोजनाओं के वित्तपोषण का सवाल उठा और तब यह फैसला हुआ कि केंद्र पेट्रोल और डीजल पर उपकर लगाएगा। इसके तहत जमा राजस्व सड़क मंत्रालय और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को दिया जाएगा ताकि वे अपनी परियोजनाओं को आगे बढ़ा सकें। बाद में रेलवे और राज्यों को भी इसके लाभार्थियों में शामिल किया गया और उपकर में हर क्षेत्र के लिए राशि तय कर दी गई। वित्त मंत्री की अगुआई में एक समिति केंद्रीय सड़क एवं बुनियादी ढांचा कोष से आवंटन के बारे में फैसला करेगी। उम्मीद है कि उन परियोजनाओं के लिए धन मिलता रहेगा जिन पर काम शुरू हो चुका है।

वित्त मंत्री ने एनएचएआई की सड़क परियोजनाओं के लिए एक विशेष कंपनी बनाने की घोषणा की थी। इसका स्वरूप कैसा होगा?

हमारे पास 105 राजमार्ग अनुबंध हैं जिन्हें भुनाकर 1,250 अरब रुपये जुटाए जा सकते हैं। इस राशि को विशेष कंपनी में निवेश किया जा सकता है जो एनएचएआई परियोजनाओं की देखरेख करेगी। 

आप सड़क निर्माण की रफ्तार बढ़ाने में कितने सफल हुए हैं? अगले साल का लक्ष्य क्या है?

हम मार्च के अंत तक रोजाना 28 किलोमीटर सड़क निर्माण का लक्ष्य हासिल कर लेंगे। अगले साल हम इसे 40 किमी करना चाहते हैं और मुझे उम्मीद है कि हम इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल होंगे। 

क्या भूमि अधिग्रहण अब भी चुनौती है?

हमने भूमि अधिग्रहण पर 680 अरब रुपये खर्च किए हैं और किसानों को अच्छा भुगतान कर रहे हैं। इसलिए भूमि अधिग्रहण अब कोई समस्या नहीं है। 

क्या ई-वाहनों को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए?

अगर लोगों के लिए सफर का खर्च कम होता है तो मुझे इस विचार के मार्केटिंग की जरूरत नहीं है। भारत में वाहन निर्माण बड़ा कारोबार है और यहां से भारी संख्या में वाहनों का निर्यात होता है। हम पेट्रोल और डीजल वाहन बनाने वाली इकाइयों को बंद नहीं करना चाहते हैं। लेकिन हम नई तकनीक लाते हैं तो हमें स्थायी परिवहन व्यवस्था मिलेगी और हमारा निर्यात और बढ़ेगा। 

आप इलेक्ट्रिक वाहनों की कीमत कम कैसे करेंगे?

एक इलेक्ट्रिक बस की कीमत एक करोड़ रुपये है। पहले सौर ऊर्जा की कीमत 16.5 रुपये प्रति यूनिट थी और अब यह 2.55 रुपये है। जब संख्या बढ़ेगी तो लागत में कमी आएगी।

सड़क मंत्रालय ने सार्वजनिक परिवहन में सुधार और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए बजट में अतिरिक्त 250 अरब रुपये की मांग की थी। लेकिन बजट में इसका कोई जिक्र नहीं है। 

बजट में हमें 710 अरब रुपये आवंटित किए गए हैं। इसका एक हिस्सा परिवहन व्यवस्था और सेवाओं के आधुनिकीकरण पर खर्च किया जाएगा। हम हवाई अड्डïों की तर्ज पर बस अड्डे विकसित करना चाहते हैं। अधिकांश बड़े शहरों में बस अड्डे हैं। व्यावसायिक जमीन का इस्तेमाल कर हम वातानुकूलित बस अड्डे बना सकते हैं जिनमें होटल, पार्किंग के अलावा बाकी सभी सुविधाएं होंगी। ये परियोजनाएं व्यावहारिकता के आधार पर ईपीसी (इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण) या सार्वजनिक-निजी साझेदारी के तहत बनाए जा सकते हैं। 

सार्वजनिक परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक बसों का इस्तेमाल करने की योजना की क्या स्थिति है?

हम इलेक्ट्रिक बसें और एथेनॉल, बायोडीजल औ मेथेनॉल से चलने वाली बसें चाहते हैं। इससे बड़े शहरों में वायु प्रदूषण की समस्या को हल करने में मदद मिलेगी। इससे कचरे से पैसा बनाया जा सकेगा। इसके लिए हम लंदन की परिवहन व्यवस्था को अपनाना चाहते हैं जो एक क्रांतिकारी विचार है। लंदन में नौ ऑपरेटरों कंपनियों और नगर निगम ने प्रति किमी के आधार पर एक निविदा जारी की है। इसके तहत परिचालक निगम या फिर सरकार का और चालक ऑपरेटर कंपनी का होगा। दोनों की पोशाक एक ही तरह की होगी। इसके लिए ऑपरेटर कंपनियां निवेश करेंगी। नागपुर में बस को पूरी तरह एथेनॉल पर चलाने का खर्च प्रति किमी 79 रुपये है जबकि बिजली से चलने वाली बस पर प्रति किमी 50 रुपये खर्च आता है। इस तरह हम किराये को कम कर सकते हैं। इसके पीछे यह विचार है कि लोगों को बेहतर सार्वजनिक परिवहन सेवाएं दी जाएं और व्यक्तिगत वाहनों का इस्तेमाल हतोत्साहित किया जाए।

मेट्रिनो और हाइपरलूप जैसे अत्याधुनिक परिवहन विकल्पों की क्या प्रगति है? विशेषज्ञों का कहना है कि हवाई यात्रा हाइपरलूप से सस्ती है...

जहां तक परिवहन के गैर परंपरागत तरीकों का संबंध है तो दिल्ली में धौला कुआं से लेकर हरियाणा के मानेसर तक मेट्रिनो या पॉड टैक्सी परियोजना जल्दी शुरू हो जाएगी। इसके लिए निविदा जारी हो चुकी है और हमें संभावित कंपनियों से बोली का इंतजार है। हमें उम्मीद है कि कंपनियां इन परियोजनाओं में निवेश करेगी। जहां तक हाइपरलूप का संबंध है तो भारत एक बड़ा देश है और इसलिए परिवहन के विभिन्न माध्यमों पर शोध होना चाहिए और तकनीकी उन्नयन के साथ इन्हें अपनाया जाना चाहिए। हम साथ ही जल परिवहन परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं जो न केवल वित्तीय रूप से व्यावहारिक हैं बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं। दिसंबर 2018 तक वाराणसी से हल्दिया के बीच देश का पहला जलमार्ग शुरू हो जाएगा। हम इलाहाबाद से वाराणसी के बीच सार्वजनिक परिवहन सेवा शुरू करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

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