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बजट 2018 : बाजार में बड़ी गिरावट का खतरा

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  February 06, 2018

इस सरकार के अंतिम पूर्ण बजट को लेकर बाजार की प्रतिक्रिया नकारात्मक रही है। बजट भाषण के बाद बॉन्ड बाजार में प्राप्तियों में उछाल आ गई। शेयर बाजार में गुरुवार को मामूली बढ़त के बाद शुक्रवार को भारी गिरावट आई। बजट ऐसे वक्त आया, जब अमेरिकी बाजारों में भी तेज बिकवाली हो रही थी। इससे निवेशकों पर और दबाव बढ़ सकता है।  दस साल की अवधि वाला यूएस ट्रेजरी बॉन्ड वैश्विक डेट और विदेशी मुद्रा बाजारों की सेहत के लिए सबसे लोकप्रिय वैश्विक बेंचमार्क है। डाऊ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज जैसे अमेरिका के शेयर बाजार सूचकांक वैश्विक शेयर बाजारों की सेहत के लिए वैश्विक बेंचमार्क हैं। लेकिन अमेरिका से अच्छे संकेत नहीं आ रहे हैं। शुक्रवार को अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्ड की प्राप्तियां बढ़ीं, जबकि डाऊ जोंस में गिरावट रही। महंगाई की चिंता भी है और इस बात का डर है कि फेडरल रिजर्व दरों में बढ़ोतरी की रफ्तार तेज कर सकता है। 

 
बजट में कई ऐसी घोषणाएं की गई हैं, जिनसे विभिन्न श्रेणियों के निवेशकों की परेशानी बढ़ी है। पहला, राजकोषीय घाटे को 2017-18 के लक्षित स्तर के मुकाबले बढ़ाया गया है और संशोधित अनुमानों में इसमें और बढ़ोतरी हो सकती है। यह 2018-19 में उम्मीद से अधिक और बजट के दावों से भी ज्यादा रहेगा। दूसरा, बजट में ऊंचे सीमा शुल्क का सिलसिला शुरू किया गया है।  तीसरा, व्यक्तिगत आय कर दरों और स्लैब में उस तरह से बदलाव नहीं किया गया, जिससे औसत कर दाता को राहत मिलती। चौथा, अब शेयरों से होने वाले दीर्घावधि पूंजीगत लाभ पर कर लगेगा। इनमें इंडेक्सेशन का लाभ भी नहीं मिलेगा। प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) या लाभांश वितरण कर में कोई राहत नहीं मुहैया कराई गई है। कॉरपोरेट टैक्स की दरों को घटाकर 25 फीसदी करने का फायदा केवल छोटी कंपनियों को मिलेगा। 
 
जीएसटी की दरों और प्रक्रियाओं में लगातार बदलाव किए जा रहे हैं, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि 2018-19 के कर अनुमान वित्त वर्ष 2017-18 के कर अनुमानों से ज्यादा वास्तविक हैं। बजट में यह माना गया है कि जीएसटी के मासिक संग्रह में करीब 30 फीसदी बढ़ोतरी होगी। ईंधन के मोर्चे पर भी चिंता बढ़ सकती है क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई हैं और अगले वित्त वर्ष के दौरान भी इनमें बढ़ोतरी के आसार हैं।  करों के कम संग्रह और कच्चे तेल की ज्यादा लागत से राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। बजट में राजकोषीय घाटा 2017-18 में जीडीपी का 3.5 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है, जो 3.3 फीसदी के लक्ष्य से काफी ज्यादा है। वित्त वर्ष 2018-19 का लक्ष्य जीडीपी का 3.3 फीसदी तय किया गया है। लेकिन इसमें पीएसयू बैंकों के लिए 800 अरब रुपये के पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के मसले की अनदेखी की गई है। 
 
सरकारी उधारी ज्यादा रहने की संभावनाओं को लेकर बॉन्ड की प्रतिक्रिया नकारात्मक रही है क्योंकि ज्यादा सरकारी उधारी का मतलब है कि घाटा ज्यादा होगा। बॉन्ड बाजार इस बात से भी नाखुश है कि कंपनियों को अपनी जरूरत की ज्यादातर पूंजी बॉन्डों से जुटाने को कहा गया है और निवेश ग्रेड की रेटिंग के नियमों में ढील दी गई है।  भारत का द्वितीयक बॉन्ड बाजार बहुत अधिक तरल नहीं है यानी इसमें बॉन्डों को आसानी से बेचना मुश्किल है। लेकिन बेंचमार्क 10 साल के बॉन्ड की प्राप्तियां बढ़ी हैं क्योंकि बिकवाली से कीमतें नीचे आई हैं। अब बॉन्ड बाजार आगामी कई महीनों तक कमजोर नजर आ रहा है और आम तौर पर ऊंची प्राप्तियां संभावित मंदे शेयर बाजार की संकेतक होती हैं। खाद्यान्नों के ऊंचे एमएसपी की घोषणा की गई है, जिससे महंगाई में बढ़ोतरी के आसार हैं। 
 
बॉन्ड बाजार के रुख, खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी की संभावनाओं और तेल की ऊंची कीमतों को देखते हुए रिजर्व बैंक के आगामी समीक्षा में दरों में कोई बदलाव नहीं किए जाने के आसार हैं या दरों में कटौती के बजाय बढ़ोतरी के ज्यादा आसार हैं।   डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले काफी समय से मजबूती के बाद पिछले दो कारोबारी सत्रों में कमजोर हुआ है। रुझान में इस पलटाव के बाद अमेरिकी डॉलर के आगे भी मजबूत होने के आसार हैं। यह एक बड़ा कदम साबित हो सकता है, विशेष रूप से अगर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) अपनी रुपये वाली आस्तियों को बेचना शुरू कर देते हैं। ऐसा लगता है कि कारोबारी भी यूरो और येन की मजबूती पर दांव लगा रहे हैं। 
 
बाजार खंडों के लिहाज से गौर करने वाली बात यह है कि आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल की पीएमएस इकाई अपनी दो योजनाएं बंद कर रही हैं। ये योजनाएं स्मॉल कैप खंड की थीं। योजनाओं को बंद करने और निवेशकों की धनराशि लौटाने का फैसला बजट से पहले लिया गया था। उस समय निफ्टी स्मॉल कैप 250 सूचकांक 70 से अधिक पीई पर बना हुआ था। अब संस्थागत समर्थन के अभाव में इस खंड में और गिरावट आ सकती है।  वॉल स्ट्रीट में गिरावट से दलाल स्ट्रीट सहित दुनियाभर के बाजारों में कमजोर रुझान बनने के प्रबल आसार हैं। रोचक बात यह है कि घरेलू संस्थानों ने बजट के बाद बिकवाली की है, जबकि एफपीआई ने अपनी पोजिशन बनाए रखी हैं। अमेरिकी शेयरों में गिरावट से एफपीआई कुछ बिकवाली कर सकते हैं। 
 
निफ्टी पहले ही करीब 11,170 के अपने अब तक के सर्वोच्च स्तर से 3-4 फीसदी नीचे आ चुका है। आगे यह और गिर सकता है और इसे मध्यम अवधि में 10,500 पर समर्थन मिल सकता है। दीर्घकालिक सेहत के लिए बेंचमार्क माना जाने वाला 200 दिन की घटत-बढ़त का औसत करीब 10,000 पर बना हुआ है। अगर निफ्टी इस स्तर से भी नीचे आया तो हमें बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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