बिजनेस स्टैंडर्ड - चुनाव पर रही नजर मगर छेड़छाड़ से किया परहेज
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, June 21, 2018 07:15 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

चुनाव पर रही नजर मगर छेड़छाड़ से किया परहेज

आकाश प्रकाश /  February 02, 2018

वर्ष 2018-19 के बजट में कई बिंदुओं को साधने की कोशिश की गई है। इसमें ग्रामीण भारत पर विशेष ध्यान देने के साथ कंपनी जगत के लिए भी इंतजाम किए गए हैं। बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक बेहद कार्यकुशल बजट पेश किया है जो न तो नई जमीन तैयार करता है और न ही बड़े बदलाव की बात करता है। हालांकि इनमें से किसी भी वजह से कोई नुकसान होता नहीं दिख रहा है। बाजार जल्द ही बजट की घोषणाओं के आघात से उबर जाएंगे और एक बार फिर आय, तरलता और ब्याज दर जैसे अधिक बुनियादी मुद्दों पर गौर करेंगे। हमारे बाजारों को नियंत्रित करने वाला अगला अवयव आय का मोर्चा होगा।  सबसे पहले, दूसरों के उलट मेरा मानना है कि बजट का गणित काफी तर्कसंगत है और राजकोषीय घाटे पर अनुमान भी ईमानदार  है। राजस्व संग्रह को लेकर कई लोगों को शिकायत है। मेरी राय में आयकर संग्रह में 20 फीसदी तेजी अजीब नहीं है। हमने नए कर जमा में उछाल देखी है और आयकर विभाग द्वारा तमाम नोटिस भेजे जाने के फायदे नजर आने अभी बाकी हैं। वित्त मंत्री ने आयकर संग्रह में 1.9 से लेकर 2.1 फीसदी तक तेजी की बात कही है और अगले वित्त वर्ष में नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 11.5 फीसदी रहने का भी अनुमान जताया है। कॉर्पोरेट टैक्स के मामले में 10 फीसदी वृद्धि का अनुमान वास्तव में रूढि़वादी ही माना जाएगा। अधिकांश बाजार पर्यवेक्षक 2018-19 में सूचीबद्ध कंपनियों की आय में 20 फीसदी बढ़ोतरी का अनुमान जता रहे हैं और इन्हीं कंपनियों का हमारे कॉर्पोरेट टैक्स में बड़ा योगदान होता है। अगर सूचीबद्ध कंपनियों की आय अच्छी बढ़ती है तो हमें कॉर्पोरेट टैक्स संग्रह का लक्ष्य जरूर हासिल कर लेना चाहिए।
 
विनिवेश प्राप्तियों के 80,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान भी वास्तविकता के करीब है। इस दौरान एयर इंडिया की बिक्री होने के साथ तीन साधारण बीमा कंपनियों को भी विलय के बाद सूचीबद्ध करना है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में विनिवेश से 1 लाख करोड़ रुपये जुटाने के बाद भी अगले वर्ष के लिए लक्ष्य तय करने में अतिवादी रवैया नहीं अपनाया है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के मद में हरेक महीने 60,000 करोड़ रुपये का संग्रह लक्ष्य रखा गया है जो हासिल भी किया जा सकता है। ई-वे बिल की शुरुआत हो जाने और अर्थव्यवस्था के 7.5 फीसदी से विकास करने की सूरत में जीएसटी राजस्व का लक्ष्य हकीकत बन सकता है।
 
ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री को स्पेक्ट्रम नीलामी से बहुत अधिक उम्मीदें नहीं हैं और न ही उन्हें रिजर्व बैंक से मिलने वाले लाभ अधिशेष से ही अधिक आस है। असल में बजट गैर-कर राजस्व में केवल 4 फीसदी बढ़ोतरी की बात करता है। उन्हें इससे आगे निकल जाना चाहिए। व्यय के मामले में वित्त मंत्री ने 10 फीसदी वृद्धि का प्रावधान रखा है जिसमें पूंजीगत व्यय एवं राजस्व व्यय दोनों के लिए समान लक्ष्य हैं। वैसे निराशाजनक पहलू यह है कि 2018-19 के लिए पूंजीगत व्यय 10 फीसदी बढऩे के बावजूद 3 लाख करोड़ रुपये ही रहने का जिक्र है। वैसे अधिक उदारवादी नजरिये से देखें तो भी पूंजीगत व्यय में चार फीसदी की ही बढ़ोतरी का जिक्र है। 2017-18 के बजट में आवंटित राशि से भी 600 करोड़ रुपये अधिक देने के बाद सरकार पूंजीगत व्यय के मोर्चे पर दो अंकों वाली वृद्धि दर से परहेज करती दिख रही है।
 
शुक्र है कि सरकार ने लोकलुभावन बजट की राह नहीं पकड़ी। तमाम जुबानी घोषणाओं के बावजूद सरकारी खर्च में तगड़ी वृद्धि नहीं दिखी है। व्यय के दो मद काफी तेजी से बढ़ रहे हैं। खाद्य सब्सिडी में 20 फीसदी यानी 30,000 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है और ब्याज भुगतान 45,000 करोड़ रुपये बढ़ा है। हमने बजट में कोई भी मुफ्त वितरण नहीं देखा है। ग्रामीण भारत पर एक घंटे बोलने के बाद भी जेटली ने बैंकों को दिवालिया नहीं होने दिया। शुद्ध बाजार उधारी के 4.8 लाख करोड़ रुपये से घटकर 4.07 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। हालांकि इस कटौती के बावजूद बॉन्ड प्रतिफल 10 आधार अंक बढ़कर 7.5 फीसदी रहा है। ऐसा राजकोषीय घाटे के 2017-18 में बढ़कर 3.5 फीसदी और 2018-19 में 3.3 फीसदी रहने की निराशा के चलते भी हो सकता है। 
 
बजट में पेश आंकड़ों पर भरोसे की कमी दिख रही है लेकिन मैं ऐसे लोगों में नहीं हूं। मेरा मानना है कि चुनाव की आहट के बीच पेश बजट में इस तरह का राजकोषीय विचलन कोई बड़ी चिंता की बात नहीं है। हालांकि मैं इससे सहमत हूं कि 3.5 फीसदी राजकोषीय घाटा अनुमान से अधिक है लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस वित्त वर्ष में केवल 11 महीने का जीएसटी राजस्व ही आना है। इसी तरह 2018-19 के लिए भी 3.3 फीसदी घाटे का लक्ष्य पूर्वानुमान से अधिक होते हुए भी असलियत के करीब है। वित्त मंत्री राजकोषीय घाटा तीन फीसदी तय करने का विधायी प्रावधान करने के लिए भी प्रतिबद्ध नजर आते हैं। 
 
बजट में कुछ संरचनात्मक उपाय भी हैं। 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपये तक का कवर देने वाली स्वास्थ्य बीमा योजना का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार बड़े पैमाने पर फसल बीमा योजना लागू करने में सफल रही है और उम्मीद है कि स्वास्थ्य बीमा के मामले में भी वह ऐसा कर पाएगी। किसानों को फसलों का अतिरिक्त समर्थन मूल्य देने की जरूरत को भी स्वीकार किया गया है। वैसे अधिकांश किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाता है। अधिक कृषि मंडियों को आधुनिक बनाने और ई-नाम से जोडऩे की भी बात कही गई है ताकि किसान सीधे खरीदारों को अपने उत्पाद बेच सकें।
 
रोजगार को लेकर काफी बातें की जा रही थीं। ऐसे में सरकार का नए कर्मचारियों की भविष्य निधि में अपनी तरफ से 12 फीसदी अंशदान करने का कदम स्वागतयोग्य है। इसी के साथ महिला कर्मचारियों के पीएफ अंशदान में कमी करने और सुनिश्चित अवधि वाले रोजगार को सभी क्षेत्रों में लागू करने का भी जिक्र है। भविष्य निधि और बीमा कंपनियों को इकलौता ए रेटिंग बॉन्ड खरीदने की इजाजत देने से बॉन्ड बाजार को मजबूती मिलेगी। रिजर्व बैंक और सेबी कंपनियों को अपनी उधारी का 25 फीसदी हिस्सा बॉन्ड बाजार से उगाहने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। इससे बॉन्ड बाजार को मजबूती मिलेगी लेकिन क्या यह सेबी का काम है? क्या आप कंपनियों को इसके लिए बाध्य कर सकते हैं?
 
वित्त मंत्री ने राज्यों में वसूले जाने वाले स्टांप शुल्क को समेकित कर जीएसटी के दायरे में लाने की भी बात कही है। यह रियल एस्टेट में होने वाले लेनदेन से संबंधित अड़चनों को काफी हद तक दूर कर सकता है। न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) में भी कुछ बदलाव किए गए हैं ताकि दिवालिया एवं ऋणशोधन संहिता के तहत कंपनियों का अधिग्रहण आसान हो जाए। वैसे दिवालिया प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना है। कंपनियों की तरफ से किया जाने वाला कर भुगतान चिंता का विषय है। भले ही 99 फीसदी कंपनियां अब 25 फीसदी कर दे रही हैं लेकिन कुल कॉर्पोरेट टैक्स में इन कंपनियों का अंशदान पांच फीसदी ही है। बड़ी कंपनियों के लिए तो उपकर की वजह से कर बोझ बढ़ ही गया है। 
 
जहां तक लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ पर कर लगाने का सवाल है तो मुझे इससे अचरज नहीं हुआ। यह एक राजनीतिक कदम है और इससे 20,000 करोड़ रुपये नहीं जुटाए जा सकेंगे। इसके अलावा पूंजीगत लाभ कर और प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) दोनों ही वसूलना अनुचित है लेकिन यह चुनावी साल जो है। फिर भी वित्त मंत्री ने पूंंजीगत लाभ की गणना के लिए 31 जनवरी 2018 को समयसीमा बनाकर थोड़ी राहत दी है। कुल मिलाकर चुनाव को ध्यान में रखते हुए पेश किया गया बजट उतना बुरा नहीं है। इससे भी खराब बजट देखे गए हैं। बाजार जल्द ही अपनी रफ्तार से चलने लगेगा। हमें ब्याज दरों, आय और तेल कीमतों पर चिंता करने की जरूरत है। शुक्र है, अब बजट की गहमागहमी खत्म हो चुकी है। 
 
(लेखक अमांसा कैपिटल से जुड़े हुए हैं। लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं)
Keyword: budget, arun jaitley, rural, agriculture, health, GDP, RBI, share market, infra,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या पीएनबी धोखाधड़ी मामले की जांच में आएगा नया मोड़?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.