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राजकोषीय चिंता बढ़ा सकती है बजट की कुछ घोषणाएं

अजय शाह /  February 01, 2018

किसी भी चुनाव से पहले पेश किया जाने वाला आखिरी बजट राजकोषीय दबावों का वक्त होता है। पहली नजर में इस बजट के आंकड़े आश्वस्त करते हैं। प्राथमिक घाटे में गिरावट का अनुमान है। कुल व्यय में भी 10.1 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है जो असल में पिछले साल की 12.3 फीसदी तेजी से कम ही है। लेकिन गहरी नजर डालें तो हमें चिंता के कुछ बिंदु दिखते हैं। बैंक पुनर्पूंजीकरण पर होने वाले खर्च का बजट में कोई जिक्र नहीं है। पिछले साल 13.4 फीसदी रहने वाली सकल कर राजस्व वृद्धि के  16.7 फीसदी हो जाने का अनुमान है जो परेशान करने वाली बात है। निजीकरण की राह में उठाए जाने वाले कदमों की हालत तो और भी बुरी है।

 
बजट भाषण का बड़ा हिस्सा लोकलुभावन खर्चों पर केंद्रित रहा। हमें उम्मीद है कि इन मोर्चों पर उठाए जाने वाले वास्तविक कदम घोषणाओं से कहीं अलग होंगे। बजट अनुमान भले ही चिंताजनक नहीं हैं लेकिन भाषण से चिंता जरूर होती है। सार्वजनिक व्यय से संबंधित विभिन्न कदमों के राजकोषीय असर का अंदाजा लगाने के पहले हमें कुछ और सूचनाओं एवं उनके विश्लेषण की जरूरत है। इसी से पता चल पाएगा कि भाषण में कही गई बातें अनुमानों से मेल खाती हैं या नहीं। खासकर सार्वभौम स्वास्थ्य देखभाल योजना की बात मुझे चिंतित कर रही है। इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए कल्याण कार्यक्रम लागू करने में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक व्यय भी होगा। मसलन, 2001 में शायद ही किसी को अहसास था कि कर्मचारियों के पेंशन मद में होने वाले व्यय का शुद्ध वर्तमान मूल्य (एनपीवी) जीडीपी के 60 फीसदी से भी अधिक था। 
 
उस पेंशन कार्यक्रम की जद में पूरी आबादी नहीं होने के बाद भी वह काफी महंगा था। उस पेंशन योजना की तुलना में 'वन रैंक वन पेंशन' में तो अप्रत्यक्ष ऋण को तिगुना या चौगुना करने की सामथ्र्य है। इन समस्याओं पर सोचने के लिए व्यावहारिक बुद्धि खास मददगार नहीं साबित होगी। एक राजमार्ग या हवाईअड्डïा बनाना नियंत्रित खर्च है लेकिन देश की बड़ी आबादी के लिए कल्याण योजना लाने से सार्वजनिक व्यय काबू से बाहर हो सकता है। कई देशों में सार्वजनिक वित्त की हालत व्यय पर ध्यान न देने से खराब हो चुकी है। 
 
भारत भी पहले वन रैंक वन पेंशन के मामले में ऐसी गलती कर चुका है। ऐसे में हमारी कोशिश होनी चाहिए कि वैसी गलती न दोहराएं। इसका मतलब है कि हमें सार्वभौम स्वास्थ्य योजना के बारे में किए गए वादों को लेकर काफी सतर्कता बरतनी होगी। इस दिशा में कोई भी कदम बढ़ाने के पहले राजकोषीय स्थिति का गहन विश्लेषण किया जाना चाहिए। दिसंबर 2002 में नैशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस) लागू होते समय ऐसी गणना की गई थी लेकिन वन रैंक वन पेंशन को लेकर ऐसी चर्चा नहीं हुई थी।
 
राजकोषीय दायरे से अलग हटकर देखें तो सार्वभौम स्वास्थ्य योजना बेहद ही जटिल पहेली है जिसमें स्वास्थ्य प्रणाली के डिजाइन, निजी क्षेत्र के दखल और राज्य की तरफ से उठाए जा सकने वाले कदमों का ब्योरा भी शामिल है। स्वास्थ्य सेवा में सुधारों के लिए रणनीति तैयार करने और राज्य की क्षमता बढ़ाने में संजीदा नीतिगत सोच अपनाने की जरूरत है। फिलहाल नीतिगत स्तर पर कोई तैयारी ही नहीं है। हरेक बजट भाषण में वित्तीय, राजकोषीय एवं मौद्रिक संस्थाओं के निर्माण का ब्योरा दिया जाता है। बजट में वित्त मंत्रालय आगामी वित्त वर्ष में किए जाने वाले कार्यों की भी जानकारी देता है। बजट में व्यापक नीतिगत विमर्श की जरूरत होती है और उसके चलते साल-दर-साल नई संस्थाओं की नींव रखी जाती रही है। लेकिन इस साल की घोषणाएं निराशाजनक हैं। व्यापक आर्थिक और वित्तीय सुधारों की दिशा में शायद ही कोई कदम उठाया गया है। पिछले कुछ वर्षों में दिवालिया संहिता और फेमा कानून संशोधन जैसे बड़े कदम उठाए गए थे लेकिन इस बार सुधारों की दिशा में आगे न बढऩा अचरज पैदा करता है। 
 
भाषण में जिक्र है कि सेबी कंपनियों पर कॉर्पोरेट बॉन्ड के जरिये अपना चौथाई फंड जुटाने का दबाव डालने की सोच रहा है। यह एक बड़ी गलती होगी। ऐसा होने से हम फिर केंद्रीय नियोजन के दौर में पहुंच जाएंगे जब सरकार ही निजी क्षेत्र का रास्ता तय करती थी। कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार के बारे में सोचने का यह गलत तरीका है। हमें बुनियादी सुधार करने की जरूरत है ताकि भारत का बॉन्ड बाजार सशक्त हो सके। बॉन्ड बाजार का प्रदर्शन बेहतर होते ही निजी क्षेत्र उसका इस्तेमाल करने लगेगा। दबाव डालने का तरीका सही नहीं है।
 
बजट घोषणाएं आगामी वर्ष में व्यापक आर्थिक परिदृश्य को किस तरह प्रभावित करती हैं? वर्ष 2012 के बाद से ही अर्थव्यवस्था को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। वैसे संकेत हैं कि 2017 के अंतिम महीनों में हालात थोड़े सुधरे हैं। अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही में कुछ सूचीबद्ध कंपनियों का प्रदर्शन सुधरा है। सीएमआईई ने भी सितंबर-दिसंबर में श्रम बाजार की हालत सुधरने की बात कही है। इस स्थिति में हमें कुछ मुश्किल सवालों से गुजरना होगा। वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ रही हैं जिससे मुद्रास्फीति एवं ब्याज दर दोनों पर ही दबाव पड़ेगा। चुनाव नजदीक आने पर कुछ और ऐलान भी हो सकते हैं। ऐसे में बैंक पुनर्पूंजीकरण और राजकोषीय फिसलन के चलते राजकोषीय घाटा अनुमान से अधिक रह सकता है। इसका असर शुद्ध बचत पर पड़ेगा और चालू खाते का घाटा भी बढ़ जाएगा जो अंतत: विनिमय दर एवं महंगाई को प्रभावित करेगी। बड़ी संख्या में बॉन्ड जारी होने से बॉन्ड बाजार भी दबाव में आ सकता है। इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ तनाव का भी एक दिलचस्प मेल नजर आ रहा है।
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