बिजनेस स्टैंडर्ड - सोयाबीन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी
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सोयाबीन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली January 31, 2018

सोयाबीन के अनुमान से कम उत्पादन की अटकलों के कारण इसके दाम मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में 1 जनवरी से तेजी से बढ़े हैं। हालांकि किसानों के बड़े वर्ग को इसका फायदा नहीं मिलने के आसार हैं क्योंकि वे अपनी 70 से 80 फीसदी उपज पहले ही बेच चुके हैं।  मध्य प्रदेश सरकार की 'भावांतर भुगतान योजना' की समयावधि दिसंबर में खत्म होने के महज कुछ सप्ताह बाद ही सोयाबीन की कीमतों में यह बढ़ोतरी हुई है। इससे यह चर्चाएं तेज हुई हैं कि अपने फायदे के लिए योजना का दोहन करने वाले कारोबारी अब अपने स्टॉक को बेचने के लिए कीमतों में तेजी को बढ़ावा दे रहे हैं। 
 
विभिन्न एजेंसियों के आंकड़े दर्शाते हैं कि मध्य प्रदेश की मंडियों में सोयाबीन के दाम 1 जनवरी से 14 से 25 फीसदी बढ़ गए हैं, जबकि ये महाराष्ट्र की प्रमुख मंडियों में करीब 30 से 35 फीसदी बढ़े हैं। पिछले साल की इसी अवधि में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में मुश्किल से ही सोयाबीन की कीमतों में कोई हलचल थी। हालांकि आलोच्य अवधि में मंडियों में आवक घटी है, लेकिन आवक में इतनी कमी नहीं आई है कि उससे कीमतों में इतनी तेजी आ जाए।  सूत्रों ने कहा कि बाजार में ये अटकलें हैं कि सरकार सोयाबीन के उत्पादन के अनुमान में भारी कटौती कर सकती है, जिससे सभी कारोबारी या सटोरिये कीमतों को बढ़ावा दे रहे हैं। सूत्रों ने कहा, 'भावांतर योजना के दौरान गैर-पंजीकृत किसानों से सोयाबीन खरीदने वाले स्टॉकिस्ट भी इन कीमत अटकलों को हवा दे रहे हैं।' 
 
हरदा (मध्य प्रदेश) स्थित एके गैर-राजनीतिक किसान संगठन आम किसान यूनियन के संस्थापक सदस्य केदार सिरोही ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'अब मध्य प्रदेश में ज्यादातर जगहों पर सोयाबीन करीब 3,800 से 4,400 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है। अच्छी सोयाबीन के दाम 4,400 रुपये प्रति क्विंटल बोले जा रहे हैं। लेकिन ऐसा कोई अंतरराष्ट्रीय कारण नहीं है, जिसकी वजह से कीमतों में इतनी भारी बढ़ोतरी हो। इससे साफ पता चलता है कि कीमतों को नीचे लाकर योजना का फायदा उठाने वाले कारोबारी अब कृत्रिम रूप से कीमतें बढ़ा रहे हैं।'
 
शुरुआती आंकड़ों से पता चलता है कि 2017-18 के खरीफ सीजन में मध्य प्रदेश में करीब 50 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन की बुआई हुई, जो पिछले साल की तुलना में करीब 4 लाख हेक्टेयर कम थी। उत्पादन 69 लाख टन रहने का अनुमान है। इसका मतलब है कि प्रति हेक्टेयर उत्पादकता करीब 1,385 किलोग्राम रह सकती है, जो पिछले साल से करीब 6 फीसदी अधिक है।  अक्टूबर से दिसंबर (इन तीन महीनों में भावांतर भुगतान योजना चालू थी) के दौरान आवक बढ़कर 21.6 लाख टन पर पहुंच गई थी, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 43 फीसदी अधिक थी। लेकिन अब सोयाबीन उत्पादन के अनुमान वास्तविक नजर नहीं आ रहे हैं। यह करीब 53 लाख टन रह सकता है, जबकि पहले 69 लाख टन अनुमानित था। लेकिन उद्योग के सूत्रों ने कहा कि उत्पादन में इतनी गिरावट नहीं आई है कि कीमतें एक महीने में इतनी बढ़ जाएं। 
 
उन्होंने कहा कि 60 लाख टन सोयाखली के उत्पादन के लिए करीब 75 लाख टन सोयाबीन की जरूरत है। भारत के फसल वर्ष 2017-18 में 60 लाख टन खली के निर्यात का अनुमान है। उत्पादन अनुमानों में कमी के बावजूद उत्पादन 104 लाख टन रहने का अनुमान है, इसलिए साफ तौर पर कोई किल्लत नहीं है। सोपा ने देश में 2017-18 में 91 लाख टन सोयाबीन के उत्पादन का अनुमान जताया है। यह भी जरूरत से अधिक है।  इंदौर स्थित सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के कार्यकारी निदेशक डी एन पाठक ने आश्चर्य जताया, 'हमारे कम अनुमान के हिसाब से भी सोयाबीन की कोई कमी नहीं है, लेकिन कुछ लोग ये अटकलें लगा रहे हैं। मांग और आपूर्ति की वर्तमान स्थिति में भी सरप्लस है। इसलिए कीमतें इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही हैं।' फंडामेंटल कीमतों में बढ़ोतरी के पक्ष में नहीं हैं, इसलिए ये चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि कारोबारी और आढ़तिये कम उत्पादन की अटकलों के जरिये कृत्रिम रूप से कीमतों को बढ़ा रहे हैं और उद्योग को संकट में डाल रहे हैं। 
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