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यथार्थवादी होनी चाहिए राजकोषीय योजना

अरूप रायचौधरी और इंदिवजल धस्माना /  01 30, 2018

बीएस बातचीत

आर्थिक समीक्षा के एक दिन बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने अरूप रायचौधरी और इंदिवजल धस्माना को बताया कि राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पुरानी बात हो चुकी है और अब ज्यादा दूरदर्शी तथा यथार्थवादी राजकोषीय योजना की जरूरत है। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश :

अगले वित्त वर्ष में सरकार की कार्य योजना क्या होनी चाहिए?

कोई लोकलुभावन घोषणा नहीं होगी। सरकार का रुख इस बारे में एकदम स्पष्ट है। पहले हमें मौजूदा सुधारों को पूरा करना है। इस समय जीएसटी, दोहरी बैलेंस शीट का मुद्दा, एयर इंडिया का निजीकरण और कृषि सुधार जैसे मामलों को आगे बढ़ाया जा रहा है। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि तेल की कीमतों सहित व्यापक आर्थिक स्थिति हमें फिर से परेशान न करे। केंद्र सरकार के लिए चुनावी वर्ष में ये सुधार अहम होंगे।

तो आप कह रहे हैं कि राजकोषीय घाटा नहीं बढ़ना चाहिए?

तीन वर्षों के दौरान जब हमारे पास गुंजाइश थी तो मैंने सरकार को खर्च करने का सुझाव दिया था। लेकिन अब स्थिति अलग है। ऐसा लगता है कि विकास दर पटरी पर लौट आई है, महंगाई फिर से बढऩे लगी है। उभरते बाजारों में शेयर बाजारों की तेजी अचानक रुक गई है। अगर हमने सावधानी नहीं दिखाई तो घरेलू बाजार में भी इसका असर दिख सकता है। तब मौद्रिक नीति को सख्त बनाना होगा और फिर स्थायित्व बनाम विकास का धर्मसंकट पैदा हो जाएगा। इसलिए सरकार को लोकलुभावन घोषणाओं से बचना चाहिए।

लेकिन राजकोषीय स्थिति को लेकर बॉन्ड बाजारों में चिंता है?

सरकार इससे वाकिफ है। यह दूरदर्शी सोच का समय है क्योंकि व्यापक आर्थिक माहौल बदल चुका है।

तो इसका मतलब यह है कि वित्त मंत्री को 3 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखना पड़ सकता है जिसकी सिफारिश एफआरबीएम पैनल ने की है?

बहुत कुछ शुरुआती बिंदु पर निर्भर करता है। मैं इसमें नहीं जाना चाहता हूं कि पैनल ने क्या सिफारिश की है क्योंकि उसने 2017-18 के लिए भी 3 फीसदी का सुझाव दिया था। राजकोषीय घाटे का लक्ष्य अब पुरानी बात हो चुकी है। अब ज्यादा दूरदर्शी तथा यथार्थवादी राजकोषीय योजना की जरूरत है।आपने बढ़े हुए शेयर कीमतों का जिक्र करते हुए सतर्क रहने की सलाह दी है। 

क्या यह बुलबुला है और सतर्कता बढ़ाने के लिए सरकार और बाजार नियामक क्या कर सकते हैं?

किसी ने भी आज तक बुलबुला शब्द का इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि यह नकारात्मक शब्द है और आप इन चीजों का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते हैं। इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब शेयरों की कीमतें कुछ तय स्तर तक पहुंची हैं और उसके बाद उनमें तेजी से गिरावट आई है। उनका उभार जितना अभूतपूर्व होंगी, हमें उतना ही सतर्क रहने की जरूरत होगी। जहां तक कदम उठाने की जरूरत है, तो आप मौद्रिक या राजकोषीय दोनों मोर्चों पर आक्रामक कार्रवाई नहीं कर सकते हैं क्योंकि बाजारों को इसकी भनक लग जाएगी। मुझे लगता है कि विवेकपूर्ण नियमन की जरूरत है और मुझे पक्का विश्वास है कि सेबी जरूरी कदम उठा रहा है। अगर अचानक गतिरोध पैदा होता है तो इससे घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमारे पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है। आपने कहा कि बाजार केंद्र और राज्यों की ज्यादा उधारी को गलत समझ रहे हैं। 

लेकिन क्या ज्यादा उधारी का मतलब ज्यादा राजकोषीय घाटा नहीं है?

राज्य अपने घाटे को पाटने के लिए उधारी नहीं ले रहे हैं लेकिन नैशनल स्मॉल सेविंग्स फंड (एनएसएसएफ) जैसी दूसरी उधारियों को बदलने के लिए नई उधारी ले रहे हैं। 500-600 अरब रुपये अंतरनिहित घाटे को नहीं दर्शाते हैं। लोग इस मुद्दे को सही ढंग से नहीं समझ पा रहे हैं। केंद्र की 200 अरब रुपये की अतिरिक्त उधारी में आपको देखना होगा कि कितना घाटे को पाटने में जा रहा है और कितना एनएसएसएफ को फाइनैंस करने में जा रहा है।

क्या आपको लगता है कि सरकार ने बॉन्ड बाजार को भ्रम में डाल दिया है। पहले उसने कहा कि वह बाजार से 500 अरब रुपये अतिरिक्त उधार लेगी लेकिन फिर उसने इसे घटाकर 200 अरब रुपये कर दिया? 

ऐसे मामलों में हमेशा उत्तरदायित्व का तत्व होता है। वित्त मंत्री ने अधिक से अधिक पारदर्शी बनने की कोशिश की है। लेकिन परिस्थितियां अहम हैं। आपको उनके मुताबिक चलना पड़ता है।

लेकिन बैंक तो दो मुसीबतों के बीच फंस गए हैं?

इनमें से कुछ चीजें आपके नियंत्रण में नहीं हैं और आपको उनका जवाब देना पड़ता है। 

आपने जीएसटी में स्थायित्व की बात की। क्या आपको लगता है कि राजस्व और दरों के संदर्भ में अनिश्चितता से स्थायित्व की प्रक्रिया प्रभावित हुई है?

जीएसटी ने इस साल अच्छा प्रदर्शन किया है और अभी शुरुआती दौर है। मुझे उम्मीद है कि अगले वर्ष यह स्थिर हो जाएगा। बदलाव के दौर का बहुत क्रेडिट बाकी था। इसलिए केंद्रीय जीएसटी और राज्य जीएसटी का राजस्व अलग-अलग था। अन्यथा दोनों बराबर होने चाहिए थे। और फिर आईजीएसटी भी है। निश्चित रूप से राजस्व में ज्यादा स्थिरता आएगी।

लेकिन जीएसटी राजस्व को लेकर आपकी गणना वित्त मंत्री अरुण जेटली से बहुत अलग है। उनका कहना है कि इस वर्ष जीएसटी संग्रह का लक्ष्य प्रतिमाह 910 अरब रुपए था जो बजट अनुमान पर आधारित था। 6 में से 4 महीने राजस्व इससे कम रहा?

आप विस्तार में जा रहे हैं। मुआवजे और आईजीएसटी को भूल जाइए, कुल राजस्व पर ध्यान दीजिए। हम हर महीने औसतन 870 अरब रुपए का संग्रह कर रहे हैं। जहां से हमने शुरुआत की थी, उसकी तुलना में यह वाजिब वृद्धि दर है। 
Keyword: आर्थिक समीक्षा, अरविंद सुब्रमण्यन, राजकोषीय घाटा, योजना, अर्थव्‍यवस्‍था, बजट,
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