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गैरकानूनी कौन... प्रदूषण झेल रहे इलाके या वहां के उद्योग

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  January 29, 2018

मैं एक अधूरी कहानी बयां करने जा रही हूं। दिल्ली के पूर्वी छोर पर बसी कॉलोनी शिव विहार में ऐसी औद्योगिक गतिविधियां चल रही हैं जो इलाके के लिए तय भूमि-उपयोग से अलग हैं। कुछ महीने पहले एक प्रमुख समाचारपत्र ने इस इलाके में कैंसर के अधिक मामलों का खुलासा किया था। समाचारपत्र की पड़ताल में पता चला था कि वहां जींस रंगने वाली छोटी इकाइयों के सक्रिय होने से काफी प्रदूषण हो रहा है। वहां का पानी भी नीला हो चुका है। दिल्ली उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए जांच करने को कहा था।

 
जांच इन मुद्दों पर केंद्रित है। पहला, एक आवासीय कॉलोनी में इस तरह की औद्योगिक गतिविधि चलने की इजाजत देने के जिम्मेदार कौन लोग हैं जबकि ऐसा करना पूरी तरह प्रतिबंधित है? न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो को प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ कर उन अधिकारियों की पहचान करने को कहा है जिन्होंने ऐसे गैरकानूनी काम की इजाजत दी। दूसरा, प्रदूषित पानी की चपेट में आए लोगों को जरूरी स्वास्थ्य उपचार देने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं? दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण को सरकारी एजेंसियों के साथ संपर्क साधकर पीडि़तों को मदद मुहैया कराने का निर्देश दिया गया है। तीसरा, प्रभावित इलाके में दूषित भूमिगत जल को स्वच्छ करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं? न्यायालय ने मुझे भी इस मसले के समाधान में मदद करने को कहा है।
 
हालांकि कोई समाधान सुझाने के पहले हमें कुछ मुश्किल सवालों का सामना करना है। वहां पर प्रदूषण की स्थिति क्या है और पानी कितना दूषित हो चुका है? इसका जवाब मिलने पर ही सुधार की योजना बनाई जा सकती है। जल अधिनियम 1974 के तहत केवल अधिकृत एजेंसियां ही पानी के नमूने ले सकती हैं और अधिकृत प्रयोगशालाओं में ही प्रदूषण स्तर की जांच की जा सकती है। इस मामले में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) ने एक एजेंसी को नमूने एकत्र करने और उसके विश्लेषण का दायित्व सौंपा। नमूनों की जांच रिपोर्ट से पता चला कि उस इलाके का पानी दूषित ही नहीं है।
 
शिव विहार से एकत्र 42 नमूनों के परीक्षण से पता चला कि वहां पर नगण्य प्रदूषण है और पानी को दूषित करने वाले तत्त्व नदारद हैं। ऐसा होने पर मैंने इन जांचों का क्रोमैटोग्राम मुहैया कराने को कहा ताकि स्थिति को गहराई से समझा जा सके। क्रोमैटोग्राम पर गौर करने पर कुछ अशुद्धता नजर आई लेकिन किसी नतीजे पर पहुंच पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। इसके बाद मैंने इस बारे में कुछ और जानकारी मांगी है।  लेकिन मुख्य मुद्दा यह है कि ऐसे अधिकांश मामलों में हमें प्रदूषित जगह के बारे में पता होते हुए भी प्रदूषण को साबित नहीं किया जा सकता है। नमूना एकत्र करने की प्रक्रिया, परीक्षण के तरीके या फिर पूरी सटीकता से परीक्षण नहीं किए जाने के चलते भी यह समस्या हो सकती है। समस्या यह भी है कि इस तरह का परीक्षण कर पाने वाली प्रयोगशालाएं भी काफी कम हैं। लेकिन फॉरेंसिक साइंस के गुणवत्तापरक उपयोग के बगैर कोई भी सबूत नहीं मिल सकता है लिहाजा किसी को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता है।
 
यह सवाल भी खड़ा होता है कि शिव विहार का पानी इस कदर कैसे दूषित हुआ? किन संस्थाओं और नियामकीय इकाइयों की नाकामी के चलते इतना प्रदूषण फैला? सच तो यह है कि दिल्ली के मास्टर प्लान 2021 में शिव विहार को अनधिकृत/ अनियोजित कॉलोनी की श्रेणी में रखा गया है यानी यह इलाका अनियोजित होते हुए भी आवासीय ही है। इस तरह यहां औद्योगिक गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जा सकती है। केवल घरेलू उद्योग के रूप में स्वीकृत उद्योगों को ही इस इलाके में ही चलाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2004 में ऐसे गैर-अधिसूचित इलाकों में चलने वाली सभी गैर-अनुमेय औद्योगिक गतिविधियों को बंद करने का फरमान सुनाया था। उसने निर्देश दिए थे कि इन इकाइयों को बिजली एवं पानी की आपूर्ति बंद कर दी जाए और अगर फिर भी वहां गैरकानूनी काम चलता है तो उसे सील कर दिया जाए। कपड़ा रंगने की भी अनुमति नहीं थी, लिहाजा उन इकाइयों को बंद कर दिया जाना चाहिए।
 
न्यायालय के इस दिशानिर्देश को मास्टर प्लान 2021 में दोहराया गया। सबसे पहले यह मास्टर प्लान 2007 में आया था जिसे 2008 और फिर 2009 में संशोधित किया गया। इसमें उन औद्योगिक गतिविधियों का जिक्र है जो रिहायशी इलाकों में चल सकते हैं। वैसे इस सूची में कपड़ा रंगने का काम शामिल नहीं है।  इसमें पेच यह है कि किसी को यह मालूम ही नहीं है कि बिना अनुमति वाले उद्योगों पर लगाम कसने का काम कौन करेगा? इसके साथ डीपीसीसी का यह भी मानना है कि जब किसी इलाके में अमुक उद्योग चलाने की इजाजत ही नहीं है तो वह अपने आप में गैरकानूनी है और उसका प्रदूषण फैलाना या न फैलाना कोई कारक नहीं है। ऐसे में यह उस इलाके के निगम का दायित्व है कि उसे बंद करवाए। 
 
पहेली अब भी उलझी हुई है। अगर निगम इन इकाइयों को दुरुपयोग के नाम पर बंद करता है तो अदालत में उन पर केवल छह हजार रुपये का जुर्माना लगेगा। ऐसे में तो वे मामूली जुर्माना देकर बच जाएंगी। लेकिन इन इकाइयों के फैलाए प्रदूषण पर लगाम लगाने का कोई जरिया नहीं है।  गंभीर सवाल यह है कि अगर इस गैरकानूनी काम को जारी रहने दिया जाता है तो प्रदूषण पर लगाम लगाने की तमाम कानूनी कोशिशें नाकाम साबित होंगी। शिव विहार का मामला व्यापक असर वाले कई सवाल खड़े करता है। क्या देश में आगे कोई और शिव विहार नहीं पैदा होगा? या प्रदूषण का सारा खेल ऐसे ही चलता रहेगा? इस मामले का नतीजा हमें इस सवाल का जवाब देगा और मैं आपको इसके बारे में बताती रहूंगी।
Keyword: environment, india, pollution, industry,,
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