बिजनेस स्टैंडर्ड - दावोस में मोदी और भारत की स्थिति
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, May 27, 2018 10:52 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

दावोस में मोदी और भारत की स्थिति

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 28, 2018

वर्ष 2006 में 'इंडिया एवरीवेयर' और 2011 में 'इंडिया इनक्लुसिव' के बाद इस वर्ष तीसरा मौका था जब भारत ने दावोस में शिरकत की। अंतर यह था कि पहले दो अवसरों के विपरीत इस बार भारतीय प्रधानमंत्री दावोस पहुंचे थे। उनसे पहले सन 1997 में देवेगौड़ा बतौर भारतीय प्रधानमंत्री वहां गए थे और किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया था। नरेंद्र मोदी एक कद्दावर नेता हैं। संसद में उन्हें पूर्ण बहुमत हासिल है। उनकी पार्टी और उसके गठबंधन साझेदार 19 राज्यों में सत्ता में हैं। वह अपनी पार्टी पर ऐसा नियंत्रण रखते हैं जैसा इंदिरा गांधी के बाद किसी ने नहीं किया। हमें यह भी ध्यान रखना होगा दुनिया के किसी अन्य बड़े लोकतांत्रिक देश में ऐसा नेता नहीं है। मोदी को यात्राएं पसंद हैं। उनकी तुलना दुनिया के शीर्ष नेताओं के साथ होती है और उन्होंने अपनी अलग शैली विकसित की है। साथी नेताओं को आलिंगनबद्घ करने की उनकी शैली चर्चित है। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के आयोजन में उनकी मौजूदगी इस आयोजन और आयोजक क्लॉस श्वाब के लिए किसी उपलब्धि से कम न थी। 

 
मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब का भी डब्ल्यूईएफ से जुड़ा एक किस्सा है। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद जल्दी ही वह डब्ल्यूईएफ से जुड़ गए और दालियान में सन 2007 में आयोजित समर दावोस में भी उन्होंने हिस्सा लिया था। बल्कि मैंने वहां एक पैनल का संचालन भी किया था। मुझे याद है घरेलू राजनीति को लेकर कई सवाल पूछे जाने के बावजूद उन्होंने कड़ाई से कहा था कि वह वहां किसी पार्टी की पैरोकारी करने नहीं आए हैं और घरेलू मुद्दों पर चर्चा नहीं करेंगे। इस बात ने हमें प्रभावित किया। बहरहाल भारतीय उद्योग जगत के साथ उनकी लोकप्रियता में इजाफा हुआ और इस बड़े वैश्विक आयोजन में उनकी मांग बढऩे लगी, इसके साथ ही घरेलू राजनीति वहां तक पहुंच गई। संप्रग सरकार ने डब्ल्यूईएफ को यह जता दिया कि उसे मोदी को आमंत्रित किया जाना पसंद नहीं। मोदी का यह मानना सही था कि उनका न्योता राजनीतिक दबाव में वापस लिया गया। यही वजह है कि बीते तीन सालों के दौरान उनकी सरकार दावोस को लेकर गर्मजोशी नहीं दिखा रही थी। 
 
डब्ल्यूईएफ ने सुधार की हरसंभव कोशिश की। उन्हें आयोजन में आरंभिक भाषण देने का अवसर दिया गया जो गत वर्ष चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने दिया था। इस वर्ष तो इस के लिए प्रतिस्पर्धा और कड़ी थी क्योंकि दुनिया के दिग्गज नेता ट्रंप, मैकरॉन, ट्रूडो, टरीजा मे, नेतन्याहू और एंगेला मर्केल सामने थे। मोदी के भाषण में हॉल खचाखच भरा हुआ था। उन्होंने ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका, शी चिनफिंग के चीन के बारे में अहम बातें कीं। उन्होंने डेटा के महत्त्व पर भी बात की। उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति और बुद्घिमता के बारे में कई बातें कहीं। उनका भाषण चर्चा का विषय बना रहा लेकिन इसमें भी एक पेच है। उनके भाषण के बाद तीन-चार दिनों तक हर भारतीय यही सवाल पूछता दिखा कि आप प्रधानमंत्री के भाषण के बारे में क्या सोचते हैं? और इससे पहले कि आप जवाब दें सामने वाला आपको अपना नजरिया बताने लगेगा। पेच यह है कि शायद ही किसी गैर भारतीय ने यह प्रश्न किया हो। 
 
इसी तरह अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने मोदी की मौजूदगी को कोई बहुत अधिक तवज्जो नहीं दी। भारतीय समूह के कई लोगों ने इस पर निराशा प्रकट करते हुए कहा कि यह पश्चिमी मीडिया का पूर्वग्रह है। हालांकि सच इससे अलग है। पश्चिमी देश और वैश्विक कारोबारी समुदाय के मन में खीझ चीन को लेकर है। वे सभी चाहते हैं कि भारत चीन का सफल प्रतिद्वंद्वी बने और उनकी पूंजी को पनाह दे। भारत को लेकर दुनिया के देशों का लगाव इसलिए बढ़ा है क्योंकि चीन में कारोबारियों को दिक्कत हो रही है। दुनिया भारत को सफल देखना चाहती है। दुनिया के अन्य देशों की एक चिंता यह भी है कि भारत वादे तो बढ़चढ़कर करता है लेकिन उन पर खरा नहीं उतरता। मोदी के उभार के साथ दुनिया को ज्यादा बड़े सुधारों और आर्थिक और सामरिक स्थायित्व की उम्मीद थी।
 
बीते कई सालों में पहली बार दावोस में इतनी व्यस्तता और आशावाद देखने को मिली। वैश्विक वृद्घि दर 3.9 फीसदी की दर से साथ गतिशील है। ऐसे में तमाम सौदे देखने को मिलेंगे। दावोस में भले ही दुनिया में सुधार की बात होती हो लेकिन यह एक ऐसा समूह भी है जहां सब अपनी संभावनाएं तलाशते हैं। विनम्रता में शायद कहा न जाए लेकिन सच यही है कि यहां उपदेश के लिए वक्त नहीं है चाहे वह कितना भी प्राचीन और ज्ञान से भरा हो। यह ऐसा मंच नहीं है जहां स्वामी विवेकानंद की तरह भाषण दिया जा सके। दावोस में भारत की बहुपक्षीय मौजूदगी रही। भारत सरकार और सीआईआई के अलावा चंद्रबाबू नायडू का आंध्र प्रदेश, देवेंद्र फडणवीस का महाराष्ट्र, टीसीएस, इन्फोसिस और विप्रो सबके लाउंज और मौजूदगी देखने को मिली। परंतु इन सबके साथ प्रधानमंत्री तथा कुछ अहम कैबिनेट मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी का प्रतिफल बहुत सीमित है। 
 
शायद ऐसा इसलिए क्योंकि संदेश चाहे जितना अच्छा हो लेकिन आखिर में बात यही आती है कि आप कौन सा उत्पाद बेच रहे हैं। सात फीसदी के आसपास की वृद्घि दर अच्छी है लेकिन अगर आपकी अर्थव्यवस्था का आकार चीन के पांचवें हिस्से के बराबर हो और आबादी लगभग बराबर हो तो इसकी अपनी सीमाएं होती हैं। दुनिया क्रूर है और आपसे कुछ सख्त सवाल भी हो सकते हैं। मसलन अगर आपकी सरकार वाकई मजबूत है तो अब तक वोडाफोन मामले में पुरानी तिथि से लागू संशोधन हटाया क्यों नहीं गया? 
 
एक दशक पहले जब भारत ने यहां पहला बड़ा आयोजन किया था तब पुराने फॉर्मूले के मुताबिक वृद्घि दर 9 फीसदी के पार थी। प्रौद्योगिकी कंपनियां फल-फूल रही थीं और आउटसोर्सिंग के चलते बेंगलूरु नई सिलिकन वैली बन रहा था। मनमोहन सिंह जैसे 'नियुक्त' प्रधानमंत्री जो वाक कला में मोदी के पासंग भी नहीं थे वह भी कुछ चर्चा पैदा कर लेते थे कि वह तो आना चाहते थे लेकिन वैश्वीकरण विरोधी वाम दलों के कारण वह नहीं आ सके क्योंकि उन्होंने वॉक आउट (जैसा कि राहुल बजाज ने मीडिया को बताया था) करने की धमकी दे दी। आज हमारे पास वैश्विक कद वाला नेता है जिसे पता है कि कौन सा संदेश कैसे देना है। परंतु उनकी पेशकश को लेकर उत्साह नहीं है। वर्ष 2006 से 2011 और 2018 तक भारत की भूमिका सॉफ्ट पॉवर की बनी हुई है: खाना, बॉलीवुड, कलाएं, आध्यात्मिकता और अब योग। परंतु देश की सामरिक आकांक्षाओं और लक्ष्यों के मामले में इनकी सीमा है। 
 
यह सब थाईलैंड जैसे देशों के लिए कारगर है जहां पिछले साल 3.6 करोड़ पर्यटक आए जबकि भारत में केवल 1.02 करोड़। थाईलैंड मेडिकल टूरिज्म का गढ़ बन गया है। बाईपास से लेकर अंग प्रत्यारोपण और सौंदर्य से जुड़ी चिकित्सा और नशामुक्ति तक वहां काफी कुछ है। जबकि भारत अपने ही विरोधाभास में उलझा हुआ है। अब दुनिया भारत को सख्त स्वरूप में देखना चाहती है। चूंकि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट चाहता है तो उसे ऐसे मंचों पर सामरिक मसलों पर आक्रामक ढंग से बात रखनी चाहिए। वह राष्ट्रों की संप्रभुता, समुद्री और क्षेत्रीय अधिकार, वैश्विक न्याय व्यवस्था आदि के बारे में खुलकर बात कर सकता है। ऐसी चंद बातें भारत और भारतीय प्रधानमंत्री को वाजिब सुर्खियां दिला सकती थीं। अच्छी बात यह है कि इस वर्ष दावोस और गणतंत्र दिवस में 10 आसियान नेताओं की मौजूदगी में भारत अपनी नरम और सख्त दोनों छवियां प्रस्तुत करने में कामयाब रहा। समुद्री व्यवस्था के नियमों और संप्रभुता के सम्मान जैसी कुछ बातें भारत की पूर्वी नीति के अनुरूप होतीं। साथ ही दावोस का संदेश हमारी गणतंत्र दिवस की कूटनीति से भी मेल खाता। यहां भारत चूक गया। 
 
बाहरी लोगों को लग सकता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े वादों और कमजोर प्रदर्शन के बाद भारत यहां भी चूक गया। कड़ी हकीकत यह है कि भारत अभी भी दावोस में एक अहम परीक्षा में विफल है। भारत के सत्र में अभी भी भारतीय ही ज्यादा नजर आते हैं। दस साल पहले भी यही नजारा होता था। जब तक इनमें शामिल होने के लिए दुनिया के अन्य देश सामने नहीं आते, भारत वैश्विक परिदृश्य पर नजर नहीं आएगा। हम खुद अपनी चाहे जितनी तारीफ कर लें। 
Keyword: republic day, narendra modi,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या वैश्विक अनिश्चितता की आग में भारत से और निकलेगा निवेश?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.