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मजबूत कारोबारी साझेदार की छवि विदेशी निवेश के लिए बहुत जरूरी

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  January 25, 2018

भारत को वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 4,400 करोड़ डॉलर का रिकॉर्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) हासिल हुआ। माना गया कि यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार के कारोबारियों के अनुरूप झुकाव की बदौलत हुआ है। सोमवार को दावोस में एक बार पुन: प्रधानमंत्री ने इस पर जोर दिया। यह विचार करने वाली बात है कि सन 1991 के बाद से अब तक की सभी भारत सरकारों ने खुद को एक मजबूूत 'कारोबारी साझेदार' के रूप में प्रस्तुत किया होता तो एफडीआई का यह आंकड़ा कितना ऊंचा रहता। 

 
इन बीते वर्षों के दौरान टूटे वायदों, अप्रत्याशित नीतिगत बदलावों और वर्ष 2008 के बाद निवेशकों को आश्वस्त करने के लिए अनुबंध तैयार करने में अनाड़ीपन के अनेक उदाहरण हमारे सामने आए हैं। आसपास नजर डालें तो आदर्श एफडीआई मेगा प्रोजेक्ट्स के बहुत कम उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां तत्कालीन सरकार की एकतरफा रचनात्मक भूमिका बताई जा सकती हो।  बीते छह महीनों में दो प्रमुख घटनाएं ऐसी हुई हैं जो देश में किसी विदेशी निवेशक के साथ जुड़े अप्रत्याशित जोखिम को सामने लाते हैं। उदाहरण के लिए सितंबर में भारतीय रेल और अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिकल्स की 260 करोड़ डॉलर की लागत वाली डीजल रेल इंजन निर्माण परियोजना अधर में लटक गई क्योंकि बिजली मंत्रालय से रेल मंत्रालय में आए मंत्री ने कहा कि सरकारी स्वामित्व वाले परिवहन नेटवर्क को पूरी तरह बिजली चालित किया जाएगा। ऐसे में डीजल इंजन की जरूरत ही नहीं रह गई। 
 
यह वक्तव्य उस समय सामने आया जब जीई ने अपना पहला मॉडल लोकोमोटिव भारत भेजा ही था। जीई की ओर से झुंझलाहट भरा वक्तव्य दिया जिसमें भविष्य की संभावनाओं को लेकर आशंका सामने थी। इसके तत्काल बाद चिंतित मंत्री की ओर से एक स्पष्टïीकरण जारी किया गया जिसमें कहा गया कि अनुबंध का मान रखा जाएगा।  दिसंबर में निसान ने भारत सरकार के खिलाफ मध्यस्थता प्रक्रिया की शुरुआत की क्योंकि उसे वर्ष 2008 में तमिलनाडु में एक कार निर्माण संयंत्र स्थापित करने के लिए जिस 77 करोड़ डॉलर की प्रोत्साहन राशि का वादा किया गया था वह नहीं चुकाई जा रही थी। यह कदम सरकार के लिए चौंकाने वाला नहीं होना चाहिए था। कंपनी ने प्रधानमंत्री को वर्ष 2016 में एक कानूनी नोटिस भेजा था और केंद्र तथा राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ भी लंबे समय से बातचीत चल रही थी। 
 
इससे पहले वोडाफोन और केयर्न के मामले मध्यस्थता के लिए पहुंचे। इसके अलावा भी दर्जनों ऐसे मामले हैं जो अतीत की तिथि से लागू कर के दावों और रद्द किए गए अनुबंधों से ताल्लुक रखते हैं। इन सब बातों से अनुबंध का पालन करने के मामले में भारत की छवि कमजोर ही हुई है जबकि एक मजबूत निवेश परिदृश्य के लिए यह उचित नहीं है।  ये दिक्कतें अपने आप में बहुत कुछ कहती हैं। गत वर्ष 50 से अधिक देशों के साथ निवेश संधियां रद्द हुईं ताकि भारत के साथ बेहतर शर्तों के बारे में बात हो सके। मौजूदा सरकार के लिए यह सब चिंता की बात है क्योंकि इससे पुरानी शर्तों पर उस समय बातचीत हुई थी जब एफडीआई के मामले में भारत निवेदक हुआ करता था। यह समझना मुश्किल है हालात में इतना महत्त्वपूर्ण बदलाव कैसे आया? खबरों के मुताबिक सरकार ने जिस आदर्श समझौते पर काम किया है वह भविष्य में कर दावों से जुड़ी निवेशकों की आशंकाओं को दूर करने में शायद ही कामयाब हो सके। भारतीय विधि व्यवस्था की विवाद निपटाने की क्षमताओं पर भी यही बात लागू होती है। 
 
अनियमित और अप्रत्याशित नीतिगत बदलावों से शायद यह समझा जा सकता है कि हाल ही में वैश्विक दिग्गज कंपनियों ने तेल एवं गैस खनन के लिए खुली लाइसेंसिंग नीति में बहुत अधिक रुचि नहीं ली। सन 1990 के दशक में तेल एवं गैस खनन के क्षेत्र के प्रतिभागियों ने अचानक पाया कि नवीनीकरण के लिए आए अनुबंध बदले हुए हैं। मार्च 2016 में उनसे कहा गया कि अनुबंधों को विस्तार देने के लिए कंपनियों को मुनाफे में सरकार की हिस्सेदारी में 10 फीसदी का इजाफा करना होगा। इसके अलावा उनको उपकर और रॉयल्टी आदि में हिस्सेदारी भी वहन करनी होगी। 
 
इनमें से पहला बदलाव तो उचित है लेकिन दूसरे बदलाव ने इन अनुबंधों की प्रकृति पूरी तरह बदल दी। ऐसा इसलिए क्योंकि मूल अनुबंध की शर्त के अधीन उपकर और रॉयल्टी का बोझ सरकारी कंपनी ओएनजीसी अथवा ओआईएल को उठाना था। यह विचित्र प्रावधान इस क्षेत्र में एफडीआई को बढ़ावा देने के लिए लाया गया। वेदांत इस विचित्र बदलाव की शुरुआती शिकार बनी जब उसने केयर्न को खरीदा। वेदांत के प्रवर्तक अनिल अग्रवाल ने उस शर्त को स्वीकार तो किया जो बाड़मेर में प्रमुख खनन क्षेत्र को प्रभावित कर रही थी लेकिन इससे पहले इस मामले ने खूब अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं।
 
अग्रवाल को ऐसे अनुबंधों के मामले में खूब जानकारी है। आखिरकार भारत एल्युमीनियम कंपनी और हिंदुस्तान जिंक के मामले में उन्हें नियंत्रक हिस्सेदारी हासिल करने के बावजूद पूरा नियंत्रण हासिल करने के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा था।  राज्य स्तर पर भी ऐसा ही भ्रम निर्मित है। ओडिशा से लेकर झारखंड तक तमाम राज्य सरकारों ने अत्यंत कमजोर क्षतिपूर्ति व्यवस्था कायम की और जमीन का अधिग्रहण ऐसी जटिल समस्या बन गया कि आखिरकार पोस्को को एक दशक के प्रयास के बाद अपनी कोशिश छोडऩी पड़ी। इस बीच महाराष्ट्र में ताइवान की दिग्गज कंपनी फॉक्सकॉन द्वारा किया जाने वाला भारी भरकम निवेश अटक सकता है क्योंकि भारत और चीन के बीच डोकलाम में तनाव लगातार बना हुआ है। 
Keyword: india, FDI, business, trade,,
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